ज्वैलरी कारोबारियों की हड़ताल के पीछे ये है असली पेच!

अगर आप 1 लाख रुपये के जेवरात खरीदते हैं तो 1 हजार रुपये ज्यादा देने होंगे. गहनों के दाम में इतना उतार-चढ़ाव तो रोज आता रहता है. इतने भर से लोग गहने खरीदना बंद भी नहीं करते. जहां तक कारोबारी का सवाल है वो टैक्स के ये पैसे ग्राहकों से ही वसूलेंगे.

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दो हफ्ते से ज्यादा हुए हड़ताल को दो हफ्ते से ज्यादा हुए हड़ताल को

लव रघुवंशी / चंद्र प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 19 मार्च 2016,
  • अपडेटेड 1:57 PM IST

देशभर के ज्वैलरी कारोबारियों की हड़ताल को दो हफ्ते से ज्यादा का समय हो चुका है, अब तक शायद कम लोगों को ही इस हड़ताल की असल वजह समझ में आई होगी. कहा जा रहा है कि ज्वैलरी बिजनेस पर 1% एक्साइज ड्यूटी लगने से कारोबारी नाराज हैं. लेकिन 1% टैक्स इतना ज्यादा भी नहीं है कि इससे कारोबार पर कोई खास फर्क पड़ता हो.

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अगर आप 1 लाख रुपये के जेवरात खरीदते हैं तो 1 हजार रुपये ज्यादा देने होंगे. गहनों के दाम में इतना उतार-चढ़ाव तो रोज आता रहता है. इतने भर से लोग गहने खरीदना बंद भी नहीं करते. जहां तक कारोबारी का सवाल है वो टैक्स के ये पैसे ग्राहकों से ही वसूलेंगे.

क्या है हड़ताल का असली कारण?
दरअसल वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट में कुछ ऐसे कदमों का ऐलान कर दिया है, जिससे अरबों के कारोबार वाला यह बिजनेस टैक्स के दायरे में आ जाएगा. देश में जिन कारोबारों में सबसे ज्यादा ब्लैकमनी लगी है, सर्राफा कारोबार उनमें से एक माना जाता है. इसे रोकने की नीयत से वित्तमंत्री ने जेवरात के लगाया है. यह टैक्स भी उन्हीं सर्राफा कारोबारियों पर लागू होगा, जिनका सालाना कारोबार 12 करोड़ रुपये से ज्यादा है. अगले साल से यह लिमिट 6 करोड़ रुपये कर दी जाएगी.

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वित्त मंत्री ने संसद में भरोसा दिया है कि कारोबारियों के यहां कोई इंस्पेक्टर नहीं जाएगा और उन्हें परेशान नहीं होना पड़ेगा. लेकिन कारोबारी इतने भरोसे के बावजूद खुश नहीं हैं, क्योंकि वो देना ही नहीं चाहते. शायद उन्हें पता है कि ज्वैलरी कारोबार एक बार टैक्स के दायरे में आ गया तो ब्लैक मनी का पूरा काम बंद हो जाएगा.

पहले भी हो चुकी है कोशिश
इससे पहले यूपीए सरकार के वक्त में तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी सर्राफा कारोबार को एक्साइज ड्यूटी के दायरे में लाने की कोशिश की थी. तब 21 दिन चली हड़ताल के बाद उन्हें झुकना पड़ा था. सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम्स ने जेवरात के कारोबार पर 1% टैक्स को यह कहते हुए सही ठहराया था कि अगर देश में कालेधन को वापस लाना है तो यह कदम बेहद जरूरी है. हर साल लाखों अरबों रुपये का काला धन इस कारोबार में लगाया जा रहा है.

कारोबारियों की क्या है दलील?
का कहना है कि नया टैक्स लगने से उन्हें हिसाब-किताब रखने में दिक्कत आएगी. ज्यादातर कारीगर पढ़े-लिखे नहीं हैं, जिससे वो अपना हिसाब-किताब नहीं रख पाएंगे. यह तर्क अजीब है क्योंकि दूसरे कारोबार करने वाले अनपढ़ लोगों को भी अपने काम पर टैक्स देना पड़ता है. दूसरी बात ये कि खुद वित्तमंत्री कह चुके हैं कि कारीगरों पर यह टैक्स लागू नहीं है. कारोबारी एक्साइज ड्यूटी हटाने के अलावा 2 लाख से अधिक के गहनों की खरीद पर पैन कार्ड जरूरी करने से भी नाराज हैं. माना जा रहा है कि हड़ताल के पीछे कहीं न कहीं असली कारण यही है.

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