दाल ऐसे बन गई है मोदी सरकार के लिए जी का जंजाल, पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट

सरकारी गोदामों की इतनी दाल जब बाजार में उतरेगी तो कीमतें और भी कम हो जाएंगी. केन्द्र सरकार के लिए किसानों की दाल खरीदना घाटे का सौदा हो गया है क्योंकि कई जगहों पर बाजार में दाल की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम हो चुकी हैं. गोदामों का दाल खपाने के लिए केन्द्र सरकार को घाटे में दाल बेचना होगा.

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अरहर सस्ती होने और बफर स्टॉक से बड़ी मुश्किलें अरहर सस्ती होने और बफर स्टॉक से बड़ी मुश्किलें

बालकृष्ण

  • नई दिल्ली,
  • 05 अक्टूबर 2017,
  • अपडेटेड 7:18 AM IST

आने वाले दिनों में दाल की कीमतें और कम होने जा रही हैं और आम तौर पर सबसे महंगी बिकने वाली तूर यानी अरहर की दाल की कीमत गिरकर 50 रूपए प्रति किलो पर पहुंच जाएगी. लेकिन लोगों के लिए ये अच्छी खबर, मोदी सरकार के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बन गयी है. दाल की कीमतों का कभी आसमान छूना और कभी बिल्कुल गिर जाना केन्द्र सरकार के लिए ऐसी मुसीबत बन गयी है जिससे निपटने में सरकार को पसीने छूट रहे हैं.

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इस वक्त सरकार के सामने चुनौती ये कि दाल की कीमतें बाजार में पहले से ही बहुत नीचे जा चुकी हैं और तूर दाल शहरों में 75 से 80 रूपए किलो बिक रही है. लेकिन सरकार के पास 18 लाख टन दाल का स्टॉक पड़ा है जिसे अगर जल्दी से जल्दी नहीं खपाया गया तो ये खराब हो जाएगा. दाल को एक डेढ़ साल से ज्यादा स्टोर नहीं किया जा सकता. इसलिए सरकार की मजबूरी है कि वो दाल को जल्द से स्टोर से निकाल कर बाजार में उतारे और राज्य सरकारों को बांटे.

उधर खरीफ की फसल की दाल कुछ ही दिनों में बाजारों में आ जाएगी और सरकार के गोदामों में और दाल भर जाएगी. सरकारी गोदाम भले ही भरे क्यों न हों लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य पर दाल खरीदना सरकार की मजबूरी है.

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दाल का स्टॉक खपाने का तरीका तय किया जा चुका है. चार लाख टन दाल सरकारी गोदामों से निकाल कर खुले बाजार में बेचा जाएगा. साढ़े तीन लाख टन दाल दक्षिण भारत के राज्यों और गुजरात को दिया जाएगा जो राशन की दुकानों में बांटा जाएगा. इसके अलावा पुरानी दाल को गोदाम से निकाल कर खपाने के लिए सरकार 2 लाख टन दाल अलग-अलग सरकारी विभागों को देगी.

अब दिक्कत ये है कि सरकारी गोदामों की इतनी दाल जब बाजार में उतरेगी तो कीमतें और भी कम हो जाएंगी. केन्द्र सरकार के लिए किसानों की दाल खरीदना घाटे का सौदा हो गया है क्योंकि कई जगहों पर बाजार में दाल की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम हो चुकी हैं. गोदामों का दाल खपाने के लिए केन्द्र सरकार को घाटे में दाल बेचनी होगी.

सिर्फ दो साल पहले तूर दाल की कीमत 200 रूपए प्रति किलो तक पहुंच गयी थी. तब इस बात को लेकर इतना हंगामा मचा कि सरकार को दाल की कीमत नीचे लाने के लिए दुनिया भर से दाल आयात करना पडा. म्यांमार से लेकर अफ्रीका तक से दाल मंगाई गई. दाल की कीमतों को लेकर इतना बवाल मचा की सरकार ने कीमतों पर काबू पाने के लिए और आगे स्थिति को काबू करने के लिए 20 लाख टन दाल के आयात का बफर स्टॉक बनाने का फैसला किया. लेकिन इसके बाद पिछले साल दाल की बंपर पैदावार हुई. दाल की आसमान छूती हुई कीमतों को देखकर पूरे भारत में किसानों ने दाल की फसल खूब लगाई. नतीजा यह हुआ कि दाल की पैदावार रिकॉर्ड तोड़ हुई और पहली बार ऐसा हुआ की दाल के लिए विदेश से आयात पर निर्भर भारत में आयात पूरी तरह से रोकना पड़ा. यही नहीं कुछ दाल निर्यात भी करनी पड़ी.

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सरकार के लिए अब दाल के 20 लाख टन का बफर स्टॉक बनाना भारी पड़ रहा है. अब दाल की कीमतें नीचे जा रही हैं सरकार अगर बाजार में और दाल उतारती है तो कीमती और नीचे जाएंगी. कीमतें अगर बहुत कम हो गई तो दाल उगाने वाले किसान बेहाल हो जाएंगे और अगले साल के लिए दाल की बुवाई कम करेंगे. लेकिन अगर दाल गोदाम से नहीं निकली तो रखे-रेखे खराब हो जाएगी.

हिसाब कुछ इस तरह से गड़बड़ है कि आमतौर पर सबसे महंगी बिकने वाली अरहर दाल सस्ती हो गई है और सबसे सस्ती रहने वाली चने दाल की कीमत अरहर से भी ज्यादा हो गई है. इसकी वजह यह है कि इस बार अरहर की पैदावार चना से ज्यादा हुई है. कुल मिलाकर बात यह है की दाल की सप्लाई और मांग में तालमेल बिठाना मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित हो रहा है.

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