वाराणसी का प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट इन दिनों चर्चा में है. बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद ‘महाश्मशान’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस घाट को भी व्यवस्थित करने की ज़रूरत महसूस की गई, लेकिन इसके लिए किए जा रहे हालिया बदलावों ने लोगों के एक वर्ग को नाराज़ कर दिया है.
मणिकर्णिका घाट का इतिहास केवल वर्तमान विवाद तक सीमित नहीं है. इसकी परतों में चिताओं की धधकती आग, मनों-टनों जलती लकड़ियों से उठता धुआं और राख के ढेरों के बीच दबी सदियों पुरानी उथल-पुथल भरी कहानियां छिपी हैं.
इन कहानियों में पौराणिक मान्यताएं हैं, ऐतिहासिक हमले हैं और फिर उनसे उबरने के लिए बार-बार कराए गए जीर्णोद्धार भी. आमतौर पर मणिकर्णिका के पुनर्निर्माण की चर्चा होते ही मालवा की शासिका महारानी अहिल्याबाई होल्कर का नाम सामने आता है. उन्होंने देशभर में कई टूटे मंदिरों और तीर्थ स्थलों का जीर्णोद्धार कराया, जिनमें बाबा विश्वनाथ धाम के साथ-साथ मणिकर्णिका श्मशान घाट भी शामिल था.
लेकिन मणिकर्णिका का इतिहास केवल अहिल्याबाई तक सीमित नहीं है. उनसे पहले और बाद में भी कई शासकों, संतों और दानदाताओं ने इस घाट के निर्माण और संरक्षण में भूमिका निभाई.
पुराणों में मणिकर्णिका की महिमा
महाश्मशान के इतिहास का सिरा पौराणिक मान्यताओं तक जाता है. स्कंद पुराण के काशी खंड में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु ने यहां एक कुंड का निर्माण किया था. इसी तथ्य का उल्लेख मत्स्य पुराण में भी है, जहां मणिकर्णिका को पांच पवित्र जल-स्थलों में से एक बताया गया है.
यह तीर्थ शैव और वैष्णव परंपराओं के संगम का प्रतीक रहा है. घाट क्षेत्र में स्थित विष्णु चरणपादुका मंदिर इसी समन्वय को रेखांकित करता है, जहां संगमरमर की शिला पर भगवान विष्णु के चरणचिह्न अंकित हैं.
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां लगभग पांच लाख वर्षों तक खड़े होकर तपस्या की थी. तपस्या से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और विष्णु द्वारा मांगे गए वरदान के कारण यहीं निवास करने लगे. इसी वजह से इस क्षेत्र में उत्तर की ओर विष्णु क्षेत्र और दक्षिण की ओर शिव क्षेत्र को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है.
काशी खंड (अध्याय 26, श्लोक 119 से 122) में मणिकर्णिका घाट का विस्तार से वर्णन मिलता है.
ऐतिहासिक प्रमाण और शुरुआती निर्माण
पौराणिक ग्रंथों के अलावा ऐतिहासिक अभिलेखों में भी मणिकर्णिका का उल्लेख मिलता है. पांचवीं शताब्दी के गुप्तकालीन अभिलेखों में इस घाट का जिक्र आता है.
घाट की पत्थर की सीढ़ियां 1303 ईस्वी में बनाई गई थीं, हालांकि इन्हें किसने बनवाया, इसका स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध नहीं है. मुगल काल में भी स्थानीय राजा, शासक और जमींदार अपने गुप्त दान और सहयोग से बाबा विश्वनाथ मंदिर और मणिकर्णिका घाट का रखरखाव कराते रहे.
आक्रांताओं का दौर और हमले
जब बाहरी आक्रांताओं के हमलों की आंच देशभर के तीर्थ स्थलों तक पहुंची, तो वाराणसी भी इससे अछूती नहीं रही. यहां भी हमले हुए, जिनमें सबसे उल्लेखनीय हमला 1664 ईस्वी का माना जाता है.
इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने अपनी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ दशनामी नागा संन्यासी’ में जिक्र किया है कि इस दौरान नागा संन्यासियों ने मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना का डटकर सामना किया. यह संघर्ष सुबह से शाम तक चला और अंततः मुगल सैनिकों को पीछे हटना पड़ा.
लेखक जेम्स जी. लोचटेफेल्ड की किताब ‘द इलस्ट्रेटेड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिंदूइज्म’ में भी औरंगजेब के वाराणसी पर हमले और नागा साधुओं के प्रतिरोध का उल्लेख मिलता है. इन संघर्षों में वाराणसी के कई धार्मिक प्रतीकों के साथ-साथ मणिकर्णिका घाट को भी नुकसान पहुंचा.
मराठा काल में भी हुआ निर्माण
1730 ईस्वी में बाजीराव पेशवा के संरक्षण में मणिकर्णिका घाट और इसकी सीढ़ियों का पुनर्निर्माण कराया गया. काशी में शिव के तीन प्रमुख स्थलों - ज्ञानवापी, विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र और केदार घाट- से जुड़े तारकेश्वर स्वरूप की परंपरा भी इसी काल में मजबूत हुई.
बाजीराव पेशवा ने लगभग 1735 ईस्वी में पास के घाट का निर्माण शुरू कराया, लेकिन आधार को कुछ मीटर ऊंचा करने के बाद भारी पत्थर संरचना के भार से भूस्खलन हो गया. पूरी संरचना ढह गई और निर्माण कार्य अधूरा छोड़ना पड़ा. उस अधूरे मुखौटे और घाट का एक हिस्सा आज भी दिखाई देता है. असल में, निर्माण के कुछ वर्षों बाद पूरी संरचना कई मीटर तक धंस चुकी थी.
अहिल्याबाई होल्कर ने महाश्मशान को दिया नया स्वरूप
इसके बाद 1791 ईस्वी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पूरे मणिकर्णिका घाट का व्यापक जीर्णोद्धार कराया. उन्होंने कई नए निर्माण कराए और घाट को व्यवस्थित स्वरूप दिया.
1795 ईस्वी में उन्होंने यहां तारकेश्वर मंदिर का निर्माण कराया, जिसे ‘उद्धार के स्वामी’ के रूप में जाना जाता है. आयताकार संरचना वाले इस मंदिर में छह स्तंभ हैं. प्रवेश द्वार पर गणेश प्रतिमा स्थापित है और गर्भगृह में पात्र के भीतर चार मुखों वाला शिवलिंग स्थित है.
बनारस शैली के पंचायतन मंदिर की तरह इसके चारों कोनों में सूर्य, दुर्गा, गणेश और विष्णु की प्रतिमाएं हैं. मान्यता है कि यही शिव स्वरूप मृत आत्मा के कानों में तारक मंत्र का उपदेश देकर मोक्ष प्रदान करता है. दाह संस्कार पूर्ण होने के बाद तारकेश्वर की पूजा की परंपरा आज भी निभाई जाती है.
1830 ईस्वी में ग्वालियर की रानी बैजाबाई ने घाट की मरम्मत कर आंशिक पुनर्निर्माण कराया. 1872 में पूरे महाश्मशान क्षेत्र की फिर से मरम्मत हुई. 1895 में अलवर रियासत के महाराजा मंगल सिंह ने मनोकामेश्वर मंदिर का निर्माण कराया, जो आज भी घाट की पहचान है.
1965 ईस्वी में उत्तर प्रदेश सरकार ने मणिकर्णिका घाट की मरम्मत कराई, जिसके बाद यह लंबे समय तक अपने वर्तमान स्वरूप में रहा. अब एक बार फिर यहां नवीनीकरण का काम चल रहा है, जिस पर सवाल भी उठ रहे हैं.
इतिहास गवाह है कि मणिकर्णिका घाट कभी स्थिर नहीं रहा. यह समय, सत्ता और समाज के साथ बार-बार बदला है. सवाल सिर्फ इतना है कि बदलाव की इस नई कड़ी में आस्था और परंपरा का संतुलन कैसे साधा जाएगा.
विकास पोरवाल