जब खिचड़ी ने करा दिया एक 'क्रूर साम्राज्य' का अंत... नंदवंश के विनाश और मौर्य साम्राज्य के उदय की कहानी

मकर संक्रांति के पर्व पर खिचड़ी बनाना और बांटना एक प्राचीन परंपरा है जो स्वास्थ्य और औषधि के रूप में मानी जाती है. बिहार के मगध साम्राज्य के इतिहास में खिचड़ी का विशेष स्थान है, जहां यह साम्राज्य के अंत और नए साम्राज्य के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

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खिचड़ी सिर्फ भोजन नहीं बल्कि इतिहास है खिचड़ी सिर्फ भोजन नहीं बल्कि इतिहास है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 14 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:52 PM IST

मकर संक्रांति के पर्व पर खिचड़ी बनाना, बांटना और खाना...  ये रिवाज लगभग उतना ही पुराना है, जितना कि शायद सभ्यताओं का भोजन करना. खिचड़ी को आरोग्य का भोजन बताया गया है यानी यह सिर्फ थाली में परोसा गया, भूख मिटाने वाला भोजन नहीं है, यह औषधि है. कहते हैं कि मनुष्य इतना भाग्यवान है कि उसके नसीब में खिचड़ी है. यह भोजन तो स्वर्ग के देवताओं को भी नहीं मिलता है. उन्हें तो सिर्फ घी और अग्नि में दिए गए होम से ही भूख शांत करनी होती है.

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खिचड़ी का इतिहास से वास्ता
खिचड़ी की बात होती है तो मामला इतिहास तक चला जाता है. बिहार में मकर संक्रांति का पर्व बहुत खास है और बिहार में स्थापित रहे मगध साम्राज्य के इतिहास से जुड़ी लोककथाओं में खिचड़ी भी एक किरदार की तरह है. बल्कि इसने एक क्रूर साम्राज्य के अंत और एक नए साम्राज्य के उदय में बड़ी भूमिका निभाई थी.

चंद्रगुप्त और चाणक्य नीति से जुडी है खिचड़ी
किस्सा तबका है जब मगध में नंदवंश का शासन था. नंदवंश का आखिरी शासक था घनानंद और सम्राट घनानंद बहुत क्रूर था. जब आचार्य चाणक्य मगध के दरबार में घनानंद से उसकी सहायता मांगने पहुंचे कि वह विदेशी आक्रमणों के खिलाफ अभियान की तैयारी करे तो मद में चूर घनानंद ने चाणक्य का अपमान कर दिया. इस अपमान से नाराज चाणक्य ने अपनी शिखा खोल ली और घनानंद के सर्वनाश की सौगंध खा ली. 

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उन्होंने इसके लिए घनानंद का ही एक सैनिक चंद्रगुप्त मिल गया, जिसे घनानंद ने प्रशिक्षित किया. इसके बाद गुरु-शिष्य दोनों ही मगध की नींव हिलाने निकल पड़े. चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घुड़सवारों की छोटी-सी सेना बना ली थी. सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया. चाणक्य, धनानंद की सेना और किलेबंदी का आकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया.

खिचड़ी खाकर बनी रणनीति 
उस रोज चंद्रगुप्त को जान बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा. चंद्रगुप्त-चाणक्य वेश बदलकर घूम रहे थे और बिखरी हुई शक्ति को फिर से एक करने में जुटे हुए थे. वह किसी भी जगह पर एक रात से अधिक नहीं ठहरते थे. वेश बदलने के साथ ही भोजन-पानी के लिए भिक्षा का सहारा ले रखा था. इसी क्रम में वे गांव के बाहर एक वृद्धा के घर रुके हुए थे. बूढ़ी माता ने अतिथियों का स्वागत किया और भोजन के लिए खिचड़ी बनाई. थाली के बीच गड्ढा कर उन्होंने घी डाल दिया और गरमा गर्म खिचड़ी चंद्रगुप्त और चाणक्य के सामने परोस दी. 

घी को मिलाने के लिए चंद्रगुप्त ने जैसे ही थाली के बीच हाथ डाला, तो उनकी उंगलियां जल गईं. बूढ़ी मां ने बालक समझकर चंद्रगुप्त को डपट दिया- मूर्ख हो क्या, खिचड़ी गर्म है, पहले किनारे से खाओ, फिर बीच तक पहुंचना. चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया और चाणक्य समझ गए कि आगे भी ऐसा ही करना है. उन्होंने चंद्रगुप्त से कहा- समझ गए गलती कहां हुई? हमें सीधे पाटलिपुत्र पर आक्रमण नहीं करना है, बल्कि पहले किनारों को जीतना है. चाणक्य और चंद्रगुप्त ने वृद्धा को गुरु मानकर उनके पैर छुए और फिर पाटलिपुत्र के किनारे वाले राज्यों को जीतना शुरू किया. 

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मौर्य साम्राज्य की स्थापना में प्रमुख किरदार बन गई खिचड़ी
इतिहास कहता है कि चंद्रगुप्त ने मगध पर आक्रमण के छह युद्ध हारे थे, लेकिन सातवें युद्ध से उसकी जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह कभी नहीं रुका. चंद्रगुप्त हर युद्ध जीतता रहा और फिर उसने मगध के निरंकुश शासक का नाश कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की. खिचड़ी का ही प्रभाव था कि चद्रगुप्त ने विदेशी आतताइयों को भी खदेड़ा.

सिकंदर और सेल्यूकस को हराने वाले चंद्रगुप्त के राज्य में मकर संक्राति का पर्व धूमधाम से मनाया जाता था. कुल मिलाकर बात ये है कि खिचड़ी ऐसा दिव्य भोजन है जो साम्राज्यों के निर्माण भी कर सकती है और उनका अंत भी. बस इसे सही तरीके से समझने और अपनाने की जरूरत है.

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