स्वाद, संस्कार और समरसता का भारतीय प्रतीक... वेदमंत्रों से मुहावरों तक फैला है खिचड़ी का साम्राज्य

खिचड़ी भारत की सांस्कृतिक और पाक परंपरा का एक अनमोल हिस्सा है, जिसका इतिहास वैदिक काल से शुरू होता है. यह सरल, पौष्टिक और सुपाच्य भोजन है जो हर भारतीय के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है,

Advertisement
खिचड़ी का इतिहास, भारत की प्राचीनता और विविधता का साक्षी है खिचड़ी का इतिहास, भारत की प्राचीनता और विविधता का साक्षी है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:54 AM IST

दाल में चावल मिले, हल्दी-नमक, मिर्च जैसे बेसिक मसाले डाले और उन्हें उबाल दिया... खिचड़ी बनाने का ये सबसे आसान तरीका है. आप चाहें तो इसमें जो चाहें वो मिलाते जाइए और जैसे चाहें वैसे बनाते जाइए, ये रहेगी खिचड़ी ही. हर भारतीय जो इस देश की परंपरा में पला-बढ़ा है, खिचड़ी का थाली से उसका सामना हुआ ही होगा. उत्तर से दक्षिण तक आप तमाम-तमाम व्यंजनों के नाम लीजिए तो हो सकता है लोगों ने उन्हें चखा भी न हो, लेकिन सभी ने किसी न किसी तरीके से और कभी न कभी खिचड़ी जरूर खाई होगी.  

Advertisement

खिचड़ी को आप चाहें तो पसंद कर सकते हैं या फिर इसे नकार भी सकते हैं, लेकिन किसी भी रसोई से खिचड़ी को अलग नहीं कर सकते हैं. जिंदगी आपकी चाहे जितनी लंबी हो, उसमें एक निवाला खिचड़ी तो शामिल रहेगी ही. खिचड़ी समाज में ऐसी रची बसी है कि घर से लेकर बाजार और राह से लेकर राजनीति तक इसकी जगह बनी हुई है.

क्या वैदिक युग में खिचड़ी थी?
आलम ये है कि जितनी लोग, उतनी बातें और उतनी ही तरह की खिचड़ी. तीज से त्योहार तक और रस्म से रिवाज तक खिचड़ी हर जगह है. खिचड़ी वैसी है जैसे हरि अनंत और हरि कथा अनंता और इसका बखान कर इसके आदि-मध्य और अंत को समझा पाना मुश्किल ही है. फिर भी इतिहास खंगाले और वैदिक काल में जाकर देखें तो ऋग्वेद में 'कृषर' नाम से एक व्यंजन मिलता है, जो अलग-अलग अनाजों को एक साथ मिलाकर और उबालकर बनाया जाता है.

Advertisement

ऋग्वेद में जौ का प्रयोग बहुत हुआ. इसका आटा और दलिया भोजन परंपरा में सबसे प्राचीन हैं. दलिया भी एक तरीके से खिचड़ी ही है. तो इस तरह कह सकते हैं कि वैदिक काल का आदमी खिचड़ी बनाने-खाने लगा था और इसके महत्व को समझ रहा था. 

सेल्यूकस जब भारत आया (305-303 ईसा पूर्व) तब इस दौरान उसने भी दाल और चावल के मिले हुए व्यंजन का स्वाद चखा था. खिचड़ी गृहस्थी के प्रमुख भोजन में शामिल हो चुकी थी और भारतीय रसोई के चूल्हों में लगभग रोज ही पक रही थी. मोरक्को का यात्री इब्न बतूता भी जब 1350 के आसपास भारत आता है तो उसने इस देश की लंबी यात्राओं में कई बार खिचड़ी खाने का जिक्र किया है. वह लिखता है कि भारतीयों के लिए भोजन की व्यवस्था करना चुटकी का खेल है. वो चावल और मूंग दाल को नमक के साथ उबाल लेते हैं और बड़े चाव से खाते हैं. 

15वीं सदी में जब रूसी व्यापारी अफानासी निकितिन भारत आया तो उसने भी यहां के इस हल्के भोजन का स्वाद चखा. भारत मसालेदार खाने का भी गढ़ था और सादे-सिंपल, सात्विक भोजन का भी. निकितन अपने दस्तावेजों में जिक्र करता है कि मुगलों ने भारतीय भोजन में बदलाव कर अपने हिसाब से उसमें स्वाद भरा, लेकिन उनका मन भी खिचड़ी ने जीत लिया था. इसलिए खिचड़ी तमाम हो रहे बदलावों के बीच भी जस की तस रही. इसके भी कई रूप बने, बदले और संवरे, लेकिन इसकी सादगी कभी नहीं बदली.

Advertisement

खिचड़ी मध्यकालीन भारत के शाही मेन्यू में भी शामिल रही और बादशाह अकबर के दौर में उनकी रसोई में हर दिन 30 मन खिचड़ी पकती थी. अकबर की बात हो रही है तो आपने 'बीरबल की खिचड़ी' वाली कहानी तो सुनी होगी. ये कहानी भी बताती है कि कम से कम खिचड़ी का इतिहास अभी से 500 साल पुराना तो है ही.

मुगल दरबार में खिचड़ी
अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी शाही रसोई की खिचड़ी के बारे में लिखा है कि इसे केसर और कुछ गर्म मसालों और सूखे मेवे के साथ पकाया गया. हालांकि भोज विशेषज्ञ और कुछ इतिहासकार यह नहीं मानते कि आइने अकबरी असल में खिचड़ी की बात कर रही थी. यह चावलों के पुलाव सरीखे किसी व्यंजन का वर्णन है. भारतीय घरों में चावल और विभिन्न सब्जियों के साथ, सुगंधित मसाले मिलाकर तेहरी बड़े शौक से खाई जाती है. क्या इसे खिचड़ी कह सकते हैं? क्यों कहें, जब इसका नाम तेहरी है तो है. 

भारतीय सनातनी परंपरा में भोजन को बहुत ही आदर और सम्मान के साथ देखा गया है. गीता में भोजन को ही ब्रह्म स्वरूप बताया गया है जो प्राणियों में चेतना भरने का काम करता है. इसलिए भोजन सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं बल्कि प्रसाद है और देवताओं की कृपा है. प्रसाद की बात हो रही है तो खिचड़ी यहां भी अव्वल है, क्योंकि लड्डू के बाद खिचड़ी ही वह भोजन है जो भारत के मंदिरों में प्रसाद के तौर पर अपनाया गया है. 

Advertisement

छप्पन भोग छोड़कर खिचड़ी खाने चले गए थे जगन्नाथजी
खिचड़ी के प्रसाद की बात आई है तो बता दें कि भगवान जगन्नाथ धाम के में खिचड़ी ही प्रसाद है. कहते हैं कि एक बूढ़ी माई रोज भगवान को खिचड़ी का भोग लगाती थीं. माई उठती, खिचड़ी बनातीं, परोसती और कहतीं कि- आओ गोपाल जी खा लो. भगवान मंदिर छोड़ कर चले आते. एक दिन किसी ने माई से कह दिया कि गोपाल जी को भोग लगाती हो तो नहा तो लिया करो, आंगन तो साफ कर लिया करो. माता जी को बात सही लगी.

उन्होंने अगले दिन आंगन बुहार कर- नहा कर खिचड़ी बनाई और गोपाल जी को भोग दिया, लेकिन इन सबमें देर हो गई. जैसे ही गोपाल जी ने दो कौर खाए तैसे ही मंदिर में पुजारी जी ने भोग का घंटा बजाया. भगवान भागकर उधर भी गए, लेकिन मुंह में जूठन लगी रह गई. पुजारी जी बड़े चकित. अगले दिन छुपकर देखा कि क्या माजरा है तो सब समझ गए. बूढ़ी माई की गोद में भगवान खुद उनके हाथ से खिचड़ी खा रहे थे और श्री मंदिर में मोहन भोग यूं ही रखा रहता था. तबसे पुरी में खिचड़ी का प्रसाद प्रचलित हो गया. 

भूख से व्याकुल जगन्नाथजी ने जंगल में खाई खिचड़ी
पुरी में ही एक लोककथा और प्रचलित है. एक बार देवी लक्ष्मी किसी निम्न जाति की महिला के घर प्रसन्न होकर चली गईं. भगवान ने ऊंच-नीच का भेद मिटाने के लिए लीला रची. बलभद्र ने श्रीमंदिर से लक्ष्मी को निकाल दिया, तब देवी लक्ष्मी ने श्राप दिया कि आप दोनों को 12 वर्ष तक भोजन न मिले और जब तक किसी निम्न जाति से प्रसाद न मिले श्राप भी न हटे. इधर-उधर भटकते-भटकते बलभद्र और श्याम जी बहुत थक गए. जब पेट ने असली भूख पहचानी तो जंगल में पशु चराने निकले गड़ेरियों ने मिलकर आस-पास जो भी उपलब्ध हुआ उससे खिचड़ी बनाई और भगवान को खिलाया. 

Advertisement

इंस्टेंट फूड है खिचड़ी
खिचड़ी भूख मिटाने के लिए सबसे जल्दी उपलब्ध और आसान साधन है. यह आपातकालीन परिस्थिति में भी सहायता कर सकती है. पुराण कथाओं में दर्ज है कि एक बार अकाल पड़ने पर ऋषि गौतम ने 7 वर्ष तक खिचड़ी खिलाकर लोगों का भरण-पोषण किया था. पुराण गवाह हैं कि जब-जब आदमी को तेज भूख लगी है, तब-तब खिचड़ी तुरंत तैयार भोजन के तौर पर सामने आई है. कहते हैं कि खिचड़ी दिव्य भोजन है लेकिन यह देवताओं को भी नसीब नहीं है. इसे ऋषि भोज भी कहा जाता है, क्योंकि सादगी से तैयार होने के कारण खिचड़ी में तामसिक असर नहीं था और यह ऋषियों की साधना में सहायक बन जाती थी. 

कहते हैं कि बिहार के कहलगांव में ऋषि दुर्वासा का तपस्थल रहा है. ऋषि दुर्वासा ने एक बार युद्ध में थके हुए देवताओं के लिए तुरंत ही अनाजों और सब्जी को सिर्फ जल में उबालकर खाने योग्य बनाया. इस तरह खिचड़ी तैयार हुई है. 

महाभारत में खिचड़ी- भीम ने गुस्से में बनाई थी
बात जब पौराणिक कथाओं की हो रही है तो बता दें कि महाभारत में भी खिचड़ी बनाने का जिक्र मिलता है. कहते हैं कि एक दिन द्रौपदी को हस्तिनापुर का अपमान याद आ गया और फिर उनका युधिष्ठिर से कुछ विवाद हो गया. इसके बाद किसी ने भोजन नहीं किया. भीम ने दोनों छोटे भाइयों को भूखा देखा तो वो भी बहुत नाराज हो गए.

Advertisement

गुस्से में उन्होंने पकाने के बर्तन में सारे अनाज और सब्जियां एक साथ ही डाल दिए. इस तरह खिचड़ी बन कर सामने आई. कहते हैं कि जब ऋषि दुर्वासा अचानक ही जंगल में पांडवों के पास भोजन करने पहुंचे थे, तब द्रौपदी की रसोई में सिर्फ एक कण चावल ही बचा था. उन्होंने कृष्ण को पुकारा. कृष्ण आए और बरतन में से चावल का एक कण बचा था वही खाकर वहां आराम करने लगे. भगवान का पेट भर गया तो सारे संसार का पेट भर गया.

खिचड़ी समाज में एकता का प्रतीक
खिचड़ी समाज में एकता और बराबर सम्मान का भी प्रतीक है. बात समरसता की हो तो महात्मा बाबा कबीर याद आते हैं. मगहर में मकर संक्रांति के मौके पर उनकी समाधि पर खिचड़ी जरूर चढ़ाई जाती है और खिचड़ी भोज किया जाता है. यह परंपरा जगन्नाथपुरी से जुड़ी है. बताते हैं कि जगन्नाथपुरी के समागम में कबीर दास और रहीम दास के पास बैठकर पंडितों व अन्य लोगों ने भोजन करने से मना कर दिया था. वजह निकली उनकी जाति. एक थे जुलाहा और दूसरे हरिजन. चमत्कार हुआ कि अगले ही पल हर किसी को अपने बगल में कबीर व रहीम दिखाई देने लगे. उसी समय से कबीर पंथ में खिचड़ी खाने व अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है. 

Advertisement

गोरखनाथ मंदिर की खिचड़ी
खिचड़ी की बात हो और खिचड़ी मेले को भूल जाएं, ऐसा कैसे? कहते हैं कि बाबा गोरखनाथ हिमाचल में मां ज्वाला धाम पहुंचे. मां ने पुत्र के लिए भोजन बनाने के लिए पानी गर्म होने रखा. बाबा ने कहा, मैं खिचड़ी मांग कर लाता हूं. खिचड़ी मांगते-मांगते वह गोरक्षपुरी आए और यहां खप्पर जमाकर बैठ गए. खप्पर आज तक नहीं भरा है. वहां हिमाचल के ज्वाला जी में स्थित गोरखडिब्बी में पानी आज तक गर्म हो रहा है. गोरखनाथ में पहली खिचड़ी नेपाल नरेश की चढ़ने की परंपरा रही है.

समरसता के इस प्रतीक भोजन की कथा नाथ संप्रदाय से तो सीधे तौर पर जुड़ी है. कहते हैं कि खिलजी ने जब आक्रमण किया तो उस समय नाथ योगियों ने उसका सामना किया. अपने सैन्य योगियों के झटपट भोजन के लिए ही बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एकसाथ पकाने के लिए कहा, ताकि समय भी कम लगे और पोषण भी भरपूर मिले. खिचड़ी इसका सटीक उपाय बनकर सामने आई. 

खिचड़ी खाना- मुहावरा भी
वैसे अकबर की बीरबल के साथ प्रसिद्ध कहानी में खिचड़ी एक किरदार की तरह है और आज बीरबल की खिचड़ी एक प्रसिद्ध मुहावरा है. मुहावरों की बात निकल आई है तो बता देना चाहिए कि खिचड़ी का यहां भी जलवा है. कहीं कोई कुछ 'खिचड़ी पकाता' मिलेगा, तो कोई 'डेढ़ चावल की खिचड़ी' अलग ही पका रहा होगा और तो और 'अपनी खिचड़ी अलग पकाने'' वाले भी कम नहीं हैं, वहीं 'नौ चूल्हे की खिचड़ी' (अस्थिर विचार) पकाने वाले भी खूब मिलेंगे. किसी के 'बाल खिचड़ी' हो गए हैं, तो कोई ऐसा है कि उसे 'एक कलछी खिचड़ी' भी न नसीब हो. हिंदी खिचड़ी से बने ऐसे ही कई मुहावरों से खूब समृद्ध है. 

जनकवि घाघ की 'खिचड़ी'
समृद्धि की बात के साथ सेहत की बात करना भी जरूरी हो जाता है. सेहत का राज ये है कि खिचड़ी एक पौष्टिक आहार है. यह सुपाच्य है और इसे ऋतु परिवर्तन का उचित भोजन माना गया है. एक लोकोत्ति है कि माघ महीना खिच्चड़ खाय. यानी कि माघ के महीने में खिचड़ी खाना उत्तम रहता है. इसी बात को जन कवि घाघ इस तरह कहते हैं. ''माघ मास घिउ खिचड़ी खाए, फागुन उठकै प्रात: नहाए'' यानि की माघ मास में घी खिचड़ी का सेवन करना चाहिए और फाल्गुन में सूर्योदय से पूर्व स्नान करना चाहिए. यह सेहत के लिए अच्छा होता है. इसे वह एक और उक्ति में कहते हैं. 

बे माघे खिचड़ी खाये, बे महरी ससुरारि जाये।
बे भादों पेन्हाई पव्वा, कहें घाघ ये तीनों कव्वा।।

यानी जो लोग माघ छोड़कर दूसरों महीनों यानी कभी भी खिचड़ी खाये, जो व्यक्ति पत्नी के मरने के बाद ससुराल जाए और भादों के अलावा दूसरी ऋतु में झूला झूले. कवि घाघ कहते हैं ये तीनों प्राणी मूर्ख ही हैं.

कुल मिलाकर यह जीवन खिचड़ीमय है. आप इससे बच नहीं सकते हैं. इसलिए एक ही विकल्प है. दाल-चावल को साथ उबालिए, हींग-जीरे का तड़का लगाइ. थाली में परोसिए बीच में घी डालिए. साथ में दही रखिए, और अचार-पापड़ के चटकारे लेते हुए मन से खाइए.परिवार, दोस्त, भाई-बंधु साथ हों तो क्या बात हो, आखिर खिचड़ी खाने का आनंद सबके साथ जो आता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement