होली से पहले आठ दिन का होलाष्टक लग जाता है, जिसमें मंगलकार्य नहीं होते हैं. इसकी वजह का पता भी शिवपुराण से मिलता है. कहानी के अनुसार राक्षस तारकासुर को वरदान था कि उसका वध शिव पुत्र के हाथों से ही होगा. दक्ष यज्ञ में सती के जल जाने के बाद देवताओं में शिवपुत्र के जन्म की उम्मीद भी खत्म हो गई थी.
हालांकि बाद में महादेव का माता पार्वती से विवाह हुआ तो एक बार फिर देवताओं को तारकासुर के वध होने की आस जाग गई. दूसरी ओर तारकासुर, जिसके अत्याचार काफी बढ़ गए थे उसने भी अपना जीवन बचाने के लिए कई चालें चलनी शुरू कर दी थीं.
इन सबसे अलग महादेव, देवी पार्वती से विवाह होते ही एक बार फिर ध्यान अवस्था में चले गए. इससे देवताओं को निराशा होने लगी. तब उन्होंने कामदेव को इसलिए भेजा कि वह वसंत ऋतु के बाण लेकर जाएं और देवी रति के साथ सम्मोहन नृत्य करके महादेव को जगाएं. ध्यान से बाहर लाएं.
कामदेव ने वसंत के कई बाण मारे जिनमें से एक तीर महादेव के त्रिनेत्र पर लगा. उनकी तीसरी आंख खुल गई और उससे निकली ज्वाला में कामदेव तुरंत भस्म हो गए. कहते हैं कि कामदेव ने लगातार आठ दिन तक महादेव की समाधि तोड़ने की कोशिश की थी. इसलिए इन आठ दिनों को बिल्कुल भी शुभ नहीं माना जाता है.
शिवजी ने मली थी कामदेव की राख
कहानी में आगे ये भी शामिल है कि शिवजी ने कामदेव को मुक्ति और अभय देते हुए उसे जीवित कर दिया, लेकिन उसका कोई शरीर नहीं रह गया था. वह सिर्फ आत्मा के रूप में जीवित हुआ. इसलिए तब से कामदेव को अनंग कहा जाता है. तब शिवजी ये समझ गए कि कामदेव की मंशा गलत नहीं थी और वह सिर्फ धर्म की स्थापना के लिए प्रयास कर रहा था, ताकि शिवजी को समाधि से जगाया जा सके.
तब शिवजी ने कामदेव को सम्मान देने के लिए उनके शरीर की राख को खुद पर मल लिया. इस तरह शिव चिता भस्म रमाने वाले योगी बन गए. कामदेव का जल जाना, संसार से प्रेम का जल जाना था, इसलिए होली से पहले के आठ दिन अशुभ माने जाते हैं.
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