लोहड़ी की आग जलते ही ढोल-ताशे बज उठते हैं. इनकी धुन पर भांगड़ा और गिद्दा सजते हैं. इसके साथ ही एक सुर-एक आवाज में पंजाबी बोलियों गीतों का सिलसिला शुरू हो जाता है. लोहड़ी की रंगत में सजे ये गीत सदियों से लोक कथाओं और लोक परंपराओं को शब्दों में पिरोकर पीढ़ियों तक पहुंचा रहे हैं. लोहड़ी का सबसे प्रचलित और प्रसिद्ध गीत है
सुन्दर मुंदरिये
तेरा कौन विचारा
दुल्ला भट्टीवाला
दुल्ले दी धी व्याही
सेर शक्कर पायी
कुड़ी दा लाल पताका
कुड़ी दा सालू पाटा
सालू कौन समेटे...
ये गीत यहीं खत्म नहीं होता है. इसके आगे के शब्दों में एक दौर की पूरी कहानी सिमटी हुई है. क्या आप यकीन करेंगे कि पंजाबी समुदाय या सिख धर्म के प्रमुख त्योहार के इस प्रसिद्ध गीत का कनेक्शन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से है? इससे भी बड़ा आश्चर्य ये कि ये गीत एक मुसलमान की शान में गाया जाता है.
अकबर के दौर का विद्रोही नायक
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के लाहौर में एक कस्बा है मियानी साहिब. बंटवारे से पहले के दौर की तमाम यादों को खंडहर की शक्ल में समेटे इस कस्बे में राय अब्दुल्ला दुल्ला भट्टी की मजार है. ऐतिहासिक पंजाबी दस्तावेजों और लोक नाटकों में दर्ज है कि यह राजपूत मुस्लिम लड़ाका मुगल बादशाह अकबर के समय का था.
अकबर की कर प्रणाली से विद्रोही हुए हुए दुल्ला भाटी की इमेज किस्सों-कहानियों और नाटकों में 'रॉबिन हुड' वाली है. सिखों और मुगलों में रहे बैर के बावजूद लोहड़ी ऐसा त्योहार बन चुका है जिसके गीत अनजाने ही मिली-जुली तहजीब का उदाहरण बन जाते हैं. आखिर लोहड़ी के गीतों में एक मुस्लिम लड़ाके का जिक्र इतनी जोर-शोर से क्यों होता है और पाकिस्तान से इसका क्या कनेक्शन है?
इस कनेक्शन को समझने के लिए लगभग 500 साल पहले के उसी दौर में चलते हैं. पहली बात तो ये कि 'दुल्ला भाटी' कोई कल्पना नहीं है, हालांकि इस किरदार को गढ़े जाने में जरूर किस्सों में कुछ क्रिएटिव लिबर्टी ली गई होगी, लेकिन कई लेखकों ने दुल्ला भाटी को अकबर, सिख गुरु रहे गुरु अर्जन देव और शाह हुसैन के दौर का बताया है. दुल्ला भट्टी का गांव, पिंडी था, जो लाहौर से काबुल जाने वाले राजमार्ग पर लगभग 12 कोस की दूरी पर था.
ज़ब्त व्यवस्था और पंजाब की उथल-पुथल
दुल्ला के वालिद (पिता) थे फ़रीद भट्टी और बाबा थे बीजली, जिनका नाम कहीं-कहीं सांडल भी लिया गया है. शासन से टकराव, विद्रोह और फिर शहादत दुल्ला को विरासत में मिली थी. दुल्ला के दादा और उसके वालिद दोनों ने अकबर की भूमि-राजस्व नीति के खिलाफ विद्रोह कर दिया था. इसलिए दोनों को गिरफ्तार कर लाहौर लाया गया और उनका सिर कलम कर दिया गया. उनके कटे हुए सिर शहर के मुख्य द्वार पर टांग कर शवों में भूसा भर दिया गया.
हुआ यूं कि अकबर के मंत्री और खजाने की देखरेख करने वाले राजा टोडरमल ने ज़ब्त भू-राजस्व व्यवस्था लागू की था. इसकी वजह से कर वसूली सीधे मुगल अफसरों के हाथ में चली गई और जमींदारों का नियंत्रण खत्म हो गया. दिल्ली की नजर में इस व्यवस्था को शासन की मजबूती के तौर पर देखा गया, लेकिन पंजाब में इसकी वजह से उथल-पुथल की स्थिति बन गई. पंजाब में पहले से प्रभावशाली कई राजपूत और जमींदार इस सिस्टम से हाशिए पर चले गए. दुल्ला भट्टी का परिवार भी इन्हीं में से एक था. सत्ता छिनने के बाद भट्टी परिवार ने मुगलों के खिलाफ विद्रोह किया, लेकिन यह विद्रोह कुचल दिया गया. दुल्ला के पिता और दादा दोनों को फांसी दे दी गई.
जब दुल्ला के पिता फरीद भट्टी को फांसी दी गई, उस समय उनकी पत्नी लाधी गर्भवती थीं. दुल्ला का जन्म पिता की मौत के चार महीने बाद हुआ. बेटे के जन्म के बाद लाधी हमेशा इस कोशिश में रही कि दुल्ला बागी न बने, लेकिन होता वही है जो होना होता है.
कहते हैं कि जिस दिन दुल्ला का जन्म हुआ, उसी दिन सम्राट अकबर के यहां भी पुत्र पैदा हुआ शेखू, जो आगे चलकर जहांगीर बना. ज्योतिषियों ने अकबर से कहा कि अगर राजकुमार को उसी दिन पुत्र-जन्म देने वाली किसी राजपूत महिला का दूध पिलाया जाए, तो वह वीर और विजयी बनेगा. बहुत खोजबीन और सोच-समझ के बाद लाधी को ही इस काम के लिए चुना गया. एक खास हवेली बनवाी गई. शेखू को लाधी के गांव भेजा गया. इस तरह बादशाह अकबर के जरिए मारे गए विद्रोही फरीद भट्टी की पत्नी ने दुल्ला और शाही राजकुमार दोनों को पाल-पोस कर बड़ा किया.
पाकिस्तान में मशहूर उर्दू-पंजाबी लेखक नज्म हुसैन सैयद इस कहानी को कुछ इस तरह दर्ज करते हैं. उनके मुताबिक अकबर को दुल्ला के जन्म के साथ ही ये लग गया था कि इसके जरिये बगावत फिर सिर उठा सकती है. इसलिए उसने इसे रोकने के लिए बचपन से ही कवायद करनी शुरू कर दी थी. इसलिए उसने शेखू को लाधी के पास भेजकर ऐसा तरीका अपनाया ताकि विद्रोह की धार कुंद की जा सके. शाही सम्मान और सुविधाओं के जरिए लाधी और दुल्ला को सिस्टम में शामिल कर लेने की योजना थी.
टकराव और बगावत की शुरुआत
शेखू के साथ दुल्ला के लिए भी शिक्षा की व्यवस्था की गई. वह पढ़ने भेजा गया लेकिन काजी साहब से उसका टकराव हो गया. काजी ने दुल्ला को मारा और अपनी जिद और धुन के पक्के दुल्ला ने पढ़ने जाना ही छोड़ दिया. ये उसकी बगावत की शुरुआत थी.
दुल्ला बचपन की दहलीज छोड़ अब किशोर हो रहा था. ये उम्र यूं भी बगावती होती ही है, तिस पर दुल्ला था तो खाली ही. उसने एक बढ़ई से बढ़िया गुलेल बनवाई और यही दुल्ला का पहला हथियार बन गया. एक दिन दुल्ला अपनी चौकड़ी के साथ कुएं पर पानी भरने आईं महिलाओं के मटके गुलेल मार-मार कर तोड़ रहा था. इससे तंग आकर एक महिला ने उसे ताना मारा- 'अगर निशाने का इतना ही पक्का है तो जाकर बाप-दादा की मौत का बदला क्यों नहीं ले लेता. मुगलों ने जिनके सिर काट दिए और जिनके शरीर आज भी शाही दरवाजों पर टंगे हैं. तू औरतों के घड़ों पर पत्थर चला रहा है.'
दुल्ला को बात लग गई. वह घर भागा और मां को सच बताने पर मजबूर कर दिया. बेटे की जिद के आगे लाधी ने उसे पूरा सच बता दिया. अब दु्ल्ला के पास एक मकसद था और यहीं से सामने आया बगावत का दूसरा नाम दुल्ला भाटी. यह सिर्फ निजी बदले की बात नहीं थी. यह अकबर की सत्ता के खिलाफ तीन पीढ़ियों बीजली, फ़रीद और दुल्ला का संघर्ष था. लाधी ने पुश्तैनी हथियारों का भंडार खोल दिया. दुल्ला ने हथियार बांटे और अपने साथियों की एक टोली बनाकर डाकू-विद्रोही बन गया.
कहते हैं कि दुल्ला ने अकबर को इतना तंग कर दिया था कि लाहौर 20 साल तक छावनी बना रहा और मुगल सल्तनत की राजधानी भी रहा. खैर, दुल्ला गिरफ्तार हुआ और अकबर ने उसे भी फांसी चढ़ाने का हुक्म दिया. ये फांसी लाहौर के नखास (आज का लांडा बाज़ार) में दी जानी थी, ताकि लोग उसे मरते देखें और इसे देखकर बगावत करने वालों को सबक मिले.
सुंदरी-मुंदरी की लोककथा
दुल्ला का विद्रोह लूट-पाट के लिए नहीं था, बल्कि वो एक सामाजिक डाकू (Social Banditry) का रूप था. इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम कहते हैं कि सामाजिक डाकू में एक नैतिकता होती है. वह सिर्फ इसलिए डाकू होता है ताकि उनकी मदद कर सके जो वंचित हैं, निचले पायदान पर हैं और जहां तक हुकूमत की निगाह कभी पहुंचती ही नहीं है. वह जो अमीरों से लेकर गरीबों को देता है.
पंजाबी लोककथा सुंदरी-मुंदरी इसी का उदाहरण है. एक गरीब ब्राह्मण की दो बेटियां थीं सुंदरी और मुंदरी. जमींदार उन्हें जबरन ब्याहना चाहता था. दुल्ला ने उनकी शादी उनके तय दूल्हों से करवाई और लोककथा में वह उनका धर्मपिता कहलाया. लोहड़ी पर गाया जाने वाला गीत सुंदरी-मुंदरी दरअसल दुल्ला भट्टी को श्रद्धांजलि है. इसीलिए कहा जाता है. दुल्ला भट्टी आज भी जीवित है और लोगों की याद में हमेशा ही जिंदा रहेगा.
फांसी के दिन उस दौर के प्रसिद्ध सूफी संत शाह हुसैन भी भीड़ में मौजूद थे. कोतवाल मलिक अली ने उन्हें उनके भी गिरफ़्तार किया और अपमानित किया. शाह हुसैन ने कहा, 'जो तुम मेरे साथ करने वाले हो, वही तुम्हारे साथ होगा.' कहा जाता है कि दुल्ला की फांसी के बाद मलिक अली भी राजा की नाराज़गी का शिकार होकर फांसी चढ़ा. शाह हुसैन और दुल्ला के बीच सीधा संबंध हो या न हो, लेकिन एक मुस्लिम राजपूत विद्रोही और एक सूफी फकीर की यह मौजूदगी ऐतिहासिक गठजोड़ की ओर इशारा करती है.
नज्म हुसैन सैयद ने अपने नाटक ‘तख़्त लाहौर’ में शाह हुसैन को दुल्ला का सबसे करीबी साथी दिखाते हैं. उनकी लिखी ‘दुल्ले दी कहानी’ और ‘भंजर तख़्त लाहौर’ में शाह हुसैन को मुगल साम्राज्यवाद के भीतर से उस पर प्रहार करने वाला माना गया है.
अपनी बगावत, डकैतियों और लूटपाट के बावजूद दुल्ला भट्टी पंजाबी लोकस्मृति में अमर है. वह पंजाब का रॉबिन हुड बनकर उभरा. जो मुगल कर वसूली को लूटकर गरीबों में बांट देता था और लड़कियों को जबरन उठाए जाने से बचाता था. लोहड़ी के अवसर पर बच्चों का घर-घर जाकर ‘सुंदर मुंदरिये’ गाना और बदले में पैसे व मिठाइयां पाना, दुल्ला भट्टी की इसी उदारता की याद दिलाता है. लोहड़ी के अलाव के साथ गाया जाने वाला यह गीत सिर्फ एक लोकधुन नहीं, बल्कि पंजाब के प्रतिरोध, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की एक जीवित कहानी है, जो आजतक जिंदा है और आगे भी रहेगी.
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