वाराणसी के मणिकर्णिका घाट को सिर्फ एक श्मशान का इलाका नहीं समझना चाहिए. ये वो ब्लर लाइन है जिसको गहराई से देखें तो जिंदगी और मौत के बीच का फर्क समझा जा सकता है. हम आम जिंदगी में अपने ऊपर कितना बोझ लादे फिरते हैं न. धनी होने का बोझ, एलीट होने का भार, स्पेशल होने का गुमान, काम का बोझ, कर्जे की चिंता, लग्जरी और लैविश लाइफ का घमंड भी. मणिकर्णिका के एंट्री पॉइंट पर पांव रखते ही ऐसा हर तरह का बोझ शरीर से छूट-छूटकर बहने लगता है.
आप वहां नंगे होने लगते हैं, बिल्कुल अघोर, नंग-धड़ंग... आत्मा, समझने लगती है कि चारों ओर जो शरीर लिपटा हुआ है वही अपने आप में कपड़े जैसा है. क्योंकि हर तरह के कपड़े, हर आवरण, हर रंग का पर्दा वहां राख बना पड़ा है. फिर हाथ अपने आप चिता की उस भस्म तक पहुंच जाते हैं और आप दोनों हाथों में मुट्ठी से भरकर उस राख को वैसे ही उड़ाने लग जाते हैं जैसे कि बाहरी दुनिया के रंगों में रंगा कोई शख्स गुलाल उड़ाता है.
यही है मणिकर्णिका की मसाने की होली और इसके पीछे का सिद्धांत. फिर भी सवाल उठता है कि जिस श्मशान में चिता के जलाने के बाद नहाना जरूरी बताया जाता है, तो क्या उसी श्मशान की राख से होली खेलना जायज है? क्या चिता की भस्म अशुभ नहीं रह जाती है? क्या संसार का श्मशान में ऊधम मचाना सही ठहराया जा सकता है?
क्या है चिता की होली का पौराणिक कनेक्शन?
असली बात तो ये है कि किसी भी पुराण और किसी भी उपनिषद में राख से होली खेले जाने का जिक्र नहीं मिलता है. हां, इस बात को जरूर पुराणों में दर्ज किया गया है कि भोलेनाथ ने श्मशान की राख अपने शरीर पर मल ली और वह अघोर कहलाए. इसके लिए भी अलग-अलग तर्क और कहानियां हैं. कहते हैं कि देवी सती ने जब खुद को पिता के यज्ञ में भस्म कर लिया तो महादेव ने उनके शरीर की राख प्रेम के कारण मल ली थी.
एक तर्क ये भी है कि उन्होंने कामदेव को भस्म करके उसे शरीर की सीमा से मुक्त कर दिया. फिर उसकी ही भस्म को अपने शरीर पर मल लिया. एक कहानी ये भी है कि महादेव जब देवी पार्वती से विवाह करके लौटे तो देवताओं ने उनके विवाह का बहुत सुंदर जश्न मनाया. खूब रंगारंग कार्यक्रम हुआ. अप्सराओं के नृत्य हुए. मृदंग की ताल और वीणा के तार पर गंधर्वों ने सुंदर गायन किया. कुल मिलाकर बिल्कुल आदर्श क्लासिकल सा माहौल हो गया.
लेकिन इस क्लास का नुकसान ये हुआ कि मॉस इससे दूर हो गया. शिवजी तो मॉसमैन हैं. कॉमन मैन, आम-फहम के अगुआ. उनके पीछे होती है भूतों-पिशाचों और पशुओं की लंबी-चौड़ी लाइन. अघोरियों का महाजुटान और बेढंगों-मलंगों की बैठकी. इनके बीच होते हैं महादेव. इसलिए महादेव ने उनके साथ भी जश्न मनाने के लिए उनके जैसा जश्न मनाया. इस जश्न के लिए तंबू मणिकर्णिका के महाश्मशान में लगाया गया और फिर शुरू हुई धूम. एक अनोखी होली की धूम.
होली के साथ क्यों जुड़ा है खेलना?
होली अकेला ऐसा त्योहार है, जिसके साथ मनाना नहीं खेलना जुड़ा है. खेल भी ऐसा जिसमें आनंद आए. आप दिवाली-दशहरा, रक्षाबंधन मनाते हैं, लेकिन होली खेलते हैं. खेल किसी भी तरह के रूटीन नियमों के बजाय अपने ही उन नियमों में बंधा होता है जिससे खेल का मजा आए. होली के खेल का नियम ही बंधन को खोल देना. शिव और श्मशान की राख इसी बंधन को खोल देती है. सारे अंतर मिटा देती है. राख इतनी पवित्र बन जाती है कि इसके होने से तो रंगों के लाल-पीले-नीले होने का भी भेद मिट जाता है. रह जाती है तो सिर्फ सफेदी. एक शाश्वत सफेदी.
क्यों राख मलते हैं महादेव?
शिवजी राख क्यों मलते हैं? इसके जवाब में एक और कहानी कही जाती है. कहते हैं कि राम-राम रटते हुए एक बार महादेव धरती पर उतर आए. एक मंदिर में उन्होंने अपने रामजी की छवि देखी तो वहीं बैठकर नाम जप करने लगे. दिन बीता, रात आई तो पुजारी ने कहा- अब राम जी सोएंगे. ऐसा कहकर उसने मंदिर बंद कर दिया. शिवजी अपने राम की खोज में फिर भटकने लगे. गंगा किनारे यूं ही बैठे रहे. सुबह हुई तो देखते हैं कि एक अर्थी चली आ रही है. उसमें शामिल लोग कहते जा रहे हैं राम नाम सत्य है. महादेव इसी रामधुन को सुनकर पीछे-पीछे चलने लगे और महाश्मशान पहुंच गए.
वह महसूस करते हैं कि जो राम घर में नहीं हैं, मंदिर में नहीं हैं. इधर-उधर नहीं हैं, वो राम तो श्मशान में चारों ओर हैं. राख की ढेरी के नीचे. जल रही चिता की आग में. भस्म बनती देह में, वहां तो राम का नाम ऐसा बिखरा पड़ा मिला कि फिर महादेव को कहीं जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी. वह तो समा गए उसी राख और उसी ढेरी में और उसमें ही अपना घर बना लिया. वैसे भी वह अघोरी थे ही, अनिकेत (बिना घर का व्यक्ति) बन गए फिर श्मशान ही उनका घर हो गया.
फिर तो महादेव ने राख ही मल ली, राख ही ओढ़ ली. राख ही बिछा ली. राख का ही चंदन और राख की ही भभूति लगा ली. कहते हैं कि जिंदगी यही तो है. इसका असली रंग यही राख है. यही राख मौत है, मुक्ति है, मोक्ष है और नई दुनिया का दरवाजा है और पुरानी दुनिया की वापसी भी. यही चेतना है और यही चिंतन भी है. इस एक राख की सफेदी में सारे रंग हैं. विज्ञान भी कहता है कि सूरज की रौशनी सफेद है और सफेद रंग से ही सारे रंग निकले हैं. यही जान लेना असली आनंद है.
शिवत्व में रंग जाने का आनंद
देवता ये आनंद न पा सकते हैं और न समझ सकते हैं. यह सुख आम आदमी ही समझ सकता है. ये आनंद घर-परिवार में है. दोस्तों-यारों में है, काम-काज में है. यह सबकुछ शिव है. राख की होली का यही रहस्य है. इसलिए भले ही आम दिनों में चिता की राख अशुभ और अपवित्र होती है, लेकिन महादेव के रंग में रंगने की बात होती है तो ये जिंदगी का सबक बन जाती है.
खैर... परंपराओं से अलग ये होली सबके लिए नहीं है. गृहस्थों के लिए बिल्कुल नहीं. ये होली संसार के भंवर में पड़ने की नहीं है, बल्कि उससे छुटकारा पाने की होली है. इसीलिए ये उनकी ही है जो इस गृहस्थी के भंवर से निकलकर मलंग हो चुके हैं. मसान होली हमें ठहरकर सोचने का मौका है. भस्म होली भय का नहीं, बल्कि निडरता का उत्सव है. यह मृत्यु से डरने के बजाय उसे समझने और स्वीकार करने की क्षमता है. इसी स्वीकृति में मुक्ति का रास्ता है.
कबीर भी तो यही कहते हैं, जो घर फूंके आपनो, चले हमारे साथ...
भस्म की होली एक पुकार है, अपने घमंड, गुस्सा, पद-मान, संबंध, रिश्ते-नातों के घर को फूंक कर निकल पड़ने के लिए, जहां आपको शिवत्व के रंग में रंग जाना है.
विकास पोरवाल