करेंसी बेकार, जिंदगी मुश्क‍िल, अरबों-खरबों में बिक रहे रोजमर्रा के सामान... क्यों वेनेजुएला छोड़कर भाग रहे लोग? 

पिछले 10 सालों में दुनिया भर के शरणार्थियों में सबसे ज्यादा यानी 16.2 फीसदी हिस्सेदारी वेनेजुएला की रही है. इन शरणार्थि‍यों ने राष्ट्रपति मादुरो पर हुई कार्रवाई को सही ठहराते हुए जश्न मंगाया. यहां के हालात इतना ज्यादा कैसे बिगड़ गए कि लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. आइए समझते हैं पूरा गण‍ित.

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जहां रहना मौत से मुश्किल था: वेनेजुएला की आबादी में 12% की गिरावट (Photo:AFP) जहां रहना मौत से मुश्किल था: वेनेजुएला की आबादी में 12% की गिरावट (Photo:AFP)

सम्राट शर्मा

  •  नई दिल्ली,
  • 07 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:53 PM IST

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण की खबर के बाद देश के भीतर अमेरिका के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन देखने को मिले. लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों में रह रहे कई वेनेजुएलावासी इसके उलट, अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जश्न मनाते दिखे. उनका मानना है कि इससे मादुरो के शासन का अंत होगा.

दरअसल, यही वेनेजुएला से बाहर गए लोग देश की आबादी में आई बड़ी गिरावट की सबसे बड़ी वजह हैं. साल 2016 तक वेनेजुएला की जनसंख्या सामान्य रफ्तार से बढ़ रही थी, लेकिन इसके बाद हालात तेजी से बदले.

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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक 2016 में वेनेजुएला की आबादी थी 3.07 करोड़ थी जो साल
2026 में घटकर 2.68 करोड़ रह जाने का अनुमान है. यानी करीब 12 फीसदी से ज्यादा आबादी कम हो गई. इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह यह रही कि लोगों के लिए देश छोड़ना अब आर्थिक विकल्प नहीं बल्कि जिंदा रहने का फैसला बन गया.

दुनिया में सबसे ज्यादा शरणार्थी भेजने वाला देश

2016 वो साल था, जब वेनेजुएला सिर्फ संकट में नहीं बल्कि पूरी तरह टूटने की कगार पर पहुंच गया.
तेल की कीमतों में भारी गिरावट ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी. इसके बाद आया बेतहाशा महंगाई का दौर (Hyperinflation), जिसमें लोगों की कमाई की कोई कीमत नहीं बची.

खाने-पीने की चीजें गायब होने लगीं. बुनियादी सुविधाएं ठप हो गईं. राजनीतिक दमन बढ़ा और उसी तेजी से अपराध बढ़ा. हालात ऐसे हो गए कि देश छोड़ने से ज्यादा खतरनाक देश में रहना लगने लगा. इसी दौरान वेनेजुएला से शरण मांगने वालों की संख्या आसमान छूने लगी.

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संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के मुताबिक 2015 में सिर्फ 15,087 वेनेजुएलावासी शरणार्थी थे. वहीं 2025 तक ये संख्या बढ़कर 13.63 लाख हो गई. पिछले 10 सालों में दुनिया भर के कुल शरणार्थियों में सबसे ज्यादा 16.2% वेनेजुएला से थे. वहीं अफगानिस्तान दूसरे नंबर पर (6.1%) और इराक तीसरे नंबर पर (4.6%) रहा. 

न खाना सस्ता रहा, न नौकरी बची

अर्थव्यवस्था ढहने के बाद वेनेजुएला में महंगाई पर कोई काबू नहीं रहा. रोजमर्रा की चीजों की कीमतें आसमान पर पहुंच गईं. यहां तनख्वाह का कोई मतलब नहीं रह गया. संसाधन कम हुए, अपराध बढ़ा. फैक्ट्रियां बंद होने लगीं. नौकरियां खत्म होती चली गईं. नतीजा ये हुआ कि बेरोजगारी तेजी से बढ़ी. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2014 में बेरोजगारी दर 8% थी जो 2018 में बढ़कर 35.6% हो गई यानी चार गुना से भी ज्यादा.

करेंसी बेकार हो गई, करोड़-अरब में कीमतें

महंगाई इतनी बढ़ गई कि वेनेजुएला की मुद्रा बोलिवार लगभग बेकार हो गई.रोजमर्रा की चीजें पहले लाखों फिर करोड़ों फिर अरबों और खरबों बोलिवार में बिकने लगीं. हालात ऐसे हो गए कि एटीएम ठीक से काम नहीं कर रहे थे. नकद लेनदेन मुश्किल हो गया. दुकानों में कीमत के टैग लगाना बेकार हो गया.स्थिति संभालने के लिए सरकार ने अपनी करेंसी से कई बार जीरो हटाए, ताकि कीमतें कम दिखें. लेकिन हकीकत यह है कि जीरो हटाने से महंगाई कम नहीं होती, सिर्फ आंकड़े छोटे दिखने लगते हैं.

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