ईरान इस वक्त अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. बीते एक हफ्ते से देशभर में जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे सिर्फ किसी एक शहर या एक तबके के गुस्से की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसा जनउभार है, जिसने पूरे ईरान को अपनी चपेट में ले लिया है. सड़कों पर उतर आए लाखों लोग सत्ता के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को सीधे चुनौती दे रहे हैं और शासन बदलने की मांग कर रहे हैं. तो क्या साल 2026 की शुरुआत में ही एक और युद्ध छिड़ने वाला है?
यह प्रदर्शन अचानक नहीं फूटे हैं. इसके पीछे सालों से जमा होता गुस्सा है, जो अब विस्फोट की तरह बाहर आ रहा है. महंगाई, बेरोजगारी, गिरती मुद्रा और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने आम ईरानी की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है. हालात ऐसे हैं कि रोजमर्रा की चीजें लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं. ईरानी करेंसी की कीमत लगातार गिर रही है और जानकार मानते हैं कि यह गिरावट अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है. इसी आर्थिक बदहाली ने लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है.
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शुरुआत 28 दिसंबर को तेहरान से हुई, जब दुकानदारों और व्यापारियों ने महंगाई और आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया. लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन देशव्यापी बन गया. अब यह सिर्फ व्यापारियों का प्रदर्शन नहीं रह गया है. कॉलेज और यूनिवर्सिटीज के छात्र भी इसमें शामिल हो चुके हैं. खासकर जेन-Z, जो रोजगार के संकट से जूझ रही है, इस आंदोलन की बड़ी ताकत बनकर उभरी है. युवाओं को लगता है कि मौजूदा व्यवस्था उनके भविष्य को अंधेरे में धकेल रही है.
ईरान में बड़े पैमाने पर हो रही हिंसाएं
इन प्रदर्शनों की एक बड़ी खासियत महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है. सख्त सामाजिक पाबंदियों और कट्टर नियमों वाले ईरान में महिलाओं का इस तरह सड़कों पर उतरना सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. यही वजह है कि सरकार और सुरक्षा बलों ने आंदोलन को कुचलने के लिए सख्ती का रास्ता अपनाया. लाठीचार्ज, गोलीबारी, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और हिरासत अब आम बात हो चुकी है. आगजनी की घटनाएं बढ़ रही हैं, गाड़ियां और इमारतें जल रही हैं और हिंसा में अब तक कम से कम 19 लोगों की मौत की खबर सामने आ चुकी है.
सरकार की सख्ती के बावजूद आंदोलन थमने के बजाय और तेज होता जा रहा है. 25 से ज्यादा प्रांतों में सत्ता के खिलाफ गुस्सा सड़कों पर दिख रहा है. लोग सिर्फ सुधार नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं. कुछ जगहों पर तो राजशाही की वापसी की मांग तक सुनाई देने लगी है. यह सब खामेनेई और मौजूदा सत्ता व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है.
अमेरिका की एंट्री से हालात हो बिगड़े
इसी बीच अमेरिका की एंट्री ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम ईरान को चेतावनी दी है कि अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर जुल्म जारी रहा, तो अमेरिका इसे रोकने के लिए कदम उठाने को तैयार है. ट्रंप के इस बयान ने ईरान में आंदोलन कर रहे लोगों का हौसला जरूर बढ़ाया है, लेकिन साथ ही सत्ता को और आक्रामक भी कर दिया है. ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने ट्रंप पर दखलअंदाजी का आरोप लगाया है और कहा है कि अमेरिका पर्दे के पीछे युद्ध की साजिश रच रहा था.
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यह तनाव ऐसे समय पर बढ़ा है, जब ईरान की यादें अभी ताजा हैं. महज छह महीने पहले जून में ईरान को अमेरिकी और इजरायली हमलों का सामना करना पड़ा था. इजरायल और ईरान के बीच 12 दिन तक चले संघर्ष में अमेरिका भी कूद पड़ा था और ईरान के परमाणु ठिकानों पर भारी बमबारी की गई थी. अब जब देश के अंदर हालात बेकाबू हैं, तो बाहरी दबाव ने ईरान की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं.
इजरायल की भूमिका भी इस पूरे संकट को और गंभीर बना रही है. खबरें हैं कि इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कैबिनेट बैठक बुलाकर ईरान पर संभावित हमलों के लिए अपनी सेना को मंजूरी दे दी है. नेतन्याहू ने खुले तौर पर ईरान में सत्ता विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन किया है और कहा है कि इजरायल ईरानी जनता के संघर्ष और उनकी आजादी की आकांक्षाओं के साथ खड़ा है. इस बयान ने तेहरान में खतरे की आशंका को और गहरा कर दिया है.
ईरान ने अपनी सेना को किया मजबूत
ईरान की स्थिति इस वक्त दोहरे संकट जैसी है. एक तरफ देश के अंदर लाखों लोग सड़कों पर हैं, सत्ता की वैधता को चुनौती दे रहे हैं और आर्थिक बदहाली के खिलाफ गुस्सा जाहिर कर रहे हैं. दूसरी तरफ अमेरिका और इजरायल जैसी सैन्य ताकतें खुले तौर पर दबाव बना रही हैं. ईरान ने भले ही हाल के महीनों में अपने एयर डिफेंस सिस्टम और सेना को मजबूत करने के दावे किए हों, लेकिन आंतरिक विद्रोह ने उसकी स्थिति कमजोर कर दी है.
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ईरानी सेना प्रमुख इन प्रदर्शनों को अमेरिका और इजरायल के उकसावे का नतीजा बता रहे हैं, लेकिन सड़कों पर दिख रहा गुस्सा यह साफ कर देता है कि मामला सिर्फ बाहरी साजिश का नहीं है. यह गुस्सा आम लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों, टूटती उम्मीदों और बंद होते भविष्य से निकला है.
ईरान में 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों के बाद यह सबसे बड़ा जनआंदोलन माना जा रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मुद्दा सिर्फ सामाजिक आजादी नहीं, बल्कि आर्थिक अस्तित्व और सत्ता की दिशा को लेकर है. सवाल अब यह नहीं है कि ईरान में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या मौजूदा सत्ता इस जनदबाव, अंतरराष्ट्रीय धमकियों और संभावित युद्ध के खतरे के बीच खुद को संभाल पाएगी या फिर 2026 की शुरुआत ईरान और पूरे पश्चिम एशिया के लिए एक नई और खतरनाक कहानी लिखेगी.
आजतक ब्यूरो