भारतीय विदेश मंत्रालय के चीन के साथ रिश्ते सुधारने के मिशन में चौंकाने वाली दिक्कतें सामने आ रही है. मिशन के तहत भारतीय दूतावास, बीजिंग में तैनात भारतीय और चीनी कर्मचारी के बर्तावों से यह मुश्किल पैदा हुई है. ऐसे में विदेश मंत्रालय के कर्मचारी के कुछ गैरजरूरी रिश्तों पर भी सवाल खड़े हुए हैं.
अशोक कंठ ने उठाए कठोर कदम
मेल टुडे की खबर के मुताबिक ऐसी हरकतों की वजह से ही एक कर्मचारी को बीते साल अक्टूबर महीने में बीजिंग से भारत वापस भेज दिया गया था. चीन में तत्कालीन भारतीय राजदूत अशोक कंठ ने यह फैसला किया था. कंठ इस साल 7 जनवरी को अपने पद से रिटायर हो गए. कंठ ने विदेश मंत्रालय के लेवल 4 मल्टी टास्किंग अफसर राजकुमार को एक चीनी महिला से संबंध रखने की सूचना के बाद यह कदम उठाया था. विदेश मंत्रालय के रिश्ते मजबूत करने के मिशन के मुताबिक दूतावास में स्थानीय कर्मचारी रखने की वजह से चीनी महिला वहां साथ काम कर रही थी. दूतावास के इस कदम के बाद उसकी छंटनी हो गई. दूतावास में ज्यादातर स्थानीय कर्मचारी एक चीनी एजेंसी के जरिए रखे गए थे. डिप्लोमेट्स मान रहे थे कि तैनाती से पहले इन लोगों की पुख्ता जांच तो चीनी सुरक्षा एजेंसीज ने की ही होगी. यह उनसे जुड़े हुए भी हो सकते हैं.
शुरुआती जांच में नहीं था कुछ संदिग्ध
मामले की जांच से जुड़े दूतावास के दो अफसरों ने बताया कि वापस भेजा गया भारतीय कर्मचारी वहां बतौर चपरासी फाइल्स को अफसरों तक ले जाने का काम कर रहा था. इस वजह से दूतावास के कई संवेदनशील जगहों तक उसकी सीधी पहुंच थी. खासतौर पर दफ्तर में सबसे अहम और सुरक्षित चौथे मंजिल पर भी वह जाता था. इस मंजिल पर राजदूत, उप राजदूत सहित मिशन से जुड़े सबसे बड़े अधिकारी बैठते हैं. वह कर्मचारी फाइल लेकर राजदूत कंठ के पास भी जाता था. बीजिंग में शुरुआती जांच कर ली गई है. दूतावास के अधिकारियों ने कहा कि मामले में कोई ढील नहीं दी जा सकती. कर्मचारी ने अपनी गलती मान ली है. उसके मोबाइल फोन की जांच में फिलहाल कोई संदिग्ध रिकॉर्ड नहीं मिला है. जांच इस नतीजे पर पहुंची है कि शायद उसने कोई संवेदनशील जानकारी लीक ही न की हो. इसके बावजूद नई दिल्ली में इस मामले की विस्तार से जांच की जाएगी.
चुप रहना चाहता है आरोपी
कंठ को मामले की जानकारी सितंबर, 2015 में दी गई थी. तब राजकुमार को दूतावास से कुछ किलोमीटर दक्षिण बने एक अपार्टमेंट में चीनी महिला के साथ देखा गया था. इसके बाद राजकुमार की जांच की गई. उसने गलतियों से इंकार नहीं किया. इसके बाद उसे तुरंत वापस दिल्ली भेज दिया गया. विदेश मंत्रालय के मुताबिक वह इस मामले पर कोई बात नहीं करना चाहता. मामला उजागर होने के बाद खासकर संवेदनशील देशों के साथ भारत के रिश्ते सुधारने के मिशन पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या हम इतने मजबूत और चौकन्ना हो पाए हैं कि देशहित में कोई ढील मुमकिन न हो पाए.
हनी ट्रैप से बचने के लिए हो ज्यादा ट्रेनिंग
कुछ मौजूदा और पूर्व राजनयिकों के मुताबिक यह केस बहुत अनोखा नहीं है. बीजिंग या दूसरे जगहों पर 'गोपनीयता की संस्कृति' के मद्देनजर ऐसे कदम उठाए जाते रहे हैं. संवेदनशील सूचनाओं के लिए हनी ट्रैप के शिकार होने वाले कर्मचारियों के साथ आमतौर पर ऐसे फैसले किए जाते हैं. इस घटना से दूतावास परिसर में चल रहे गड़बड़ियों की जानकारी मिलने के बाद भी कुछ महीने तक झेलते रहने का सवाल भी खड़ा हुआ है.
हाल ही में हुई हैं ये घटना
साल 2008 में चीन में तैनात रॉ (RAW) के एक अधिकारी मनमोहन शर्मा को भी बीजिंग से बुलाकर बर्खास्त कर दिया गया था. उनपर अपने चीनी भाषा की टीचर से गलत रिश्ते के आरोप थे. शर्मा मामले में रॉ और विदेश मंत्रालय के बीच कई मसलों पर बहसें चली. इसके बाद अधिकारियों के लिए खुद को बचाने के लिए भी आगाह किया गया. साल 2010 में इस मिशन से जुड़ीं और इस्लामाबाद में तैनात उप सचिव माधुरी गुप्ता को भी वापस दिल्ली बुलाकर गिरफ्तार कर लिया गया था. उनपर गोपनीय जानकारियों को पाकिस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसीज से साझा करने का आरोप था.
वर्क कल्चर में सुधार की जरूरत
फ्रांस और जर्मनी में राजदूत रहे और इस्लामाबाद में भी काम कर चुके पूर्व डिप्लोमेट टीसीए रंगाचारी ने कहा कि बीजिंग मामला इन सबसे अलग है. उन्होंने बताया कि हालिया मामले में ग्रेड थ्री और फोर लेवल के कर्मचारियों पर आरोप हैं. राजकुमार मामले में जांच हो रही है. ऐसे मामलों में कर्मचारियों को तबादलों और प्रमोशन के वक्त और अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए ट्रेनिंग की जरूरत है. उन्हें परिवार के साथ रहने और बेहद संवेदनशील जानकारियों से थोड़ा अलग रखे जाने की भी जरूरत है. अगर बड़े अफसरों ने ऐसा किया तो उन्हें बिल्कुल भी माफ नहीं किया जाना चाहिए.
केशव कुमार / अनंत कृष्णन