उत्तर प्रदेश की कटेहरी विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में सबसे दिलचस्प पहलू देखने को मिल रहा है. इस सीट पर भाजपा, सपा और बसपा तीनों प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशियों ने अपनी राजनीति का ककहरा एक वक्त पर बसपा से ही सीखा है और आज उपचुनाव में एक-दूसरे के सामने खड़े हैं.
बीजेपी ने अंबेडकरनगर से तीन बार के विधायक और बसपा सरकार में मंत्री रहे धर्मराज निषाद को टिकट दिया है. सपा ने शोभावती वर्मा को टिकट दिया. उनके पति लालजी वर्मा एक वक्त पर बसपा के कद्दावर नेताओं में होती थी, जबकि बसपा ने इस सीट पर अमित वर्मा को टिकट दिया है. जिन्होंने 2010 में बसपा सरकार के दौरान अपनी राजनीति की शुरुआत की थी और कुछ साल बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए. उन्होंने साल 2012 में कटेहरी से लालजी वर्मा के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ा था.
बसपा से 3 बार विधायक रह चुके हैं बीजेपी प्रत्याशी
बीजेपी ने कटेहरी सीट से धर्मराज निषाद को टिकट दिया है. वह सबसे पुराने बसपाई हैं. धर्मराज ने 28 साल पहले कटेहरी से अपना पहला चुनाव 1996 में बसपा के टिकट पर लड़ा था और विधायक बने थे. इसके बाद उन्हें बसपा के टिकट पर 2002 और 2007 में भी जीत हासिल की थी. इस दौरान साल 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने धर्मराज को मंत्री भी बनाया था.
सपा प्रत्याशी ने BSP से शुरू की थी राजनीति
सपा प्रत्याशी शोभावती वर्मा ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बसपा के बैनर तले की है. वह कभी बसपा के कद्दावर नेता रहे लालजी वर्मा की पत्नी हैं. लालजी वर्मा बसपा से 5 बार विधायक और बसपा सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. शोभावती ने साल 2011 में अंबेडकर नगर की जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीता था. उन्होंने साल 2016 में फिर से जिला पंचायत का चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
बसपा का गढ़ कहे जाने वाले अंबेडकरनगर की कटेहरी सीट से बपसा ने अपने पुराने नेता अमित वर्मा को टिकट दिया है. अमित ने अपनी राजनीति की शुरुआत साल 2010 में बसपा से ही की थी. हालांकि, कुछ वक्त बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए और साल 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था.
बताया जाता है कि सपा प्रत्याशी के पति लालजी वर्मा और बसपा प्रत्याशी अमित वर्मा के पिता राम केश वर्मा का काफी अच्छी दोस्ती थी. रामकेश एक बड़े ठेकेदार हैं. एक वक्त पर राम केश लालजी वर्मा की चुनाव में काफी मदद किया करते थे, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में दोनों परिवार एक-दूसरे के सामने-सामने खड़े हैं.
के के पाण्डेय