विरोधियों को झूठे केस में फंसाने वाले वकील को 10 साल से ज्यादा की सजा... लखनऊ की कोर्ट का फैसला

लखनऊ की विशेष एससी/एसटी कोर्ट ने एक वकील को 10 साल 6 महीने की सजा और दो लाख पचास हजार रुपये से अधिक जुर्माना लगाया है. वकील ने अपने विरोधियों को फंसाने के लिए झूठे केस दर्ज कराए थे. वकील लाखन सिंह ने अपनी निजी दुश्मनी निकालने के लिए 20 से अधिक झूठे केस दर्ज करवाकर कोर्ट का समय बर्बाद कराया. जांच में यह केस पूरी तरह फर्जी पाया गया.

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कोर्ट ने वकील को सुनाई सजा. कोर्ट ने वकील को सुनाई सजा.

आशीष श्रीवास्तव / संतोष शर्मा

  • लखनऊ,
  • 17 मई 2025,
  • अपडेटेड 12:52 PM IST

लखनऊ की एससी-एसटी कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. कोर्ट ने झूठे मुकदमे दर्ज कराने वाले एक अधिवक्ता को दस साल छह महीने की सजा और ढाई लाख रुपये से अधिक के जुर्माने की सजा सुनाई है. कोर्ट ने पाया कि वकील ने एक नहीं, बल्कि 20 से अधिक झूठे केस दर्ज कराए, जिनमें से अधिकतर का मकसद केवल निजी दुश्मनी निकालना और कोर्ट का समय बर्बाद करना था. विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने अपने फैसले में सख्त लहजे में कहा कि आपने वकील जैसे जिम्मेदार पेशे को कलंकित किया है और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई है.

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'कभी-कभी बहुत चतुर शिकारी भी शिकार करते समय ऐसी चाल चल देता है, जिसमें आगे चलकर अपने द्वारा बुने हुए जाल में वह खुद फंस जाता है…' ये लाइनें कोर्ट में वकील को सजा सुनाने के दौरान जज ने अपने फैसले में लिखी है. यह वकील झूठे केस लिखाकर लोगों को प्रताड़ित कर रहा था.

झूठी एफआईआर दर्ज कराकर अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग के मामले में कोर्ट ने वकील को दस साल छह महीने की कैद और 2 लाख 51 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. कोर्ट ने यह निर्णय बार काउंसिल उत्तर प्रदेश और लखनऊ के पुलिस कमिश्नर को भी भेजा है, ताकि वकील ने अगर झूठा केस दर्ज कराकर सरकारी राहत राशि ली हो तो वो भी वसूली जाए.

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यह मामला लखनऊ के SC-ST कोर्ट के स्पेशल जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी की अदालत का है. शुक्रवार को अदालत ने 11 साल पुराने मामले में झूठी FIR लिखाकर अपने विरोधियों को जेल भिजवाने की साजिश रचने वाले लाखन सिंह को बार-बार विरोधियों को झूठे केस में फंसाने की कोशिश के चलते सजा सुनाई.

लखनऊ के सेक्टर 13 विकास नगर में रहने वाले लाखन सिंह ने 15 फरवरी 2014 को विकास नगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि सुनील दुबे ने साथियों के साथ मिलकर उनको जान से मारने की कोशिश की, जाति सूचक गालियां दीं. चूंकि केस में अनुसूचित जाति जनजाति अधिनियम लगा था, लिहाजा मामले की जांच तत्कालीन सीओ महानगर धीरेंद्र राय को दी गई.

सीबीआई से लौटे तेज तर्रार, अनुभवी डिप्टी एसपी धीरेंद्र राय ने तहकीकात शुरू कर दी. केस दर्ज कराने वाले वादी से लेकर इसके मोबाइल की लोकेशन, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जुटाए तो पता चला जिस सुनील कुमार दुबे पर हत्या के प्रयास और दलित उत्पीड़न का केस दर्ज हुआ है, वह तो घटनास्थल वाले दिन मौके पर था ही नहीं.

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पुलिस ने गहराई से पड़ताल शुरू की. लोगों से पूछताछ की तो पता चला 15 फरवरी 2014 को लाखन सिंह की कार एक टाटा मैजिक से टच हो गई थी. इस पर अधिवक्ता लाखन सिंह ने टाटा मैजिक के ड्राइवर की चाबी निकाल ली, जेब में डाली और कहा कि कोर्ट में आकर मिलो. मिनी ट्रक मलिक ने कोर्ट परिसर में जाकर लाखन सिंह से मुलाकात की तो 12000 रुपये लेकर मामला रफा दफा किया.

वकील लाखन सिंह ने जिस घटना में ₹12000 लेकर मामला रफा दफा किया, उसकी एफआईआर तक दर्ज नहीं करवाई. उसी घटना को लेकर लाखन सिंह ने अपने पुराने विरोधी सुनील दुबे पर हत्या के प्रयास और दलित उत्पीड़न का केस विकास नगर थाने में दर्ज करा दिया. तत्कालीन सीओ महानगर धीरेंद्र राय ने जांच के बाद इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगा दी और झूठा मुकदमा लिखकर किसी निर्दोष को जेल भिजवाने की कोशिश में कोर्ट से दंडित करने के लिए वाद दाखिल कर दिया.

सीओ महानगर धीरेंद्र राय ने झूठा केस लिखाने की कोशिश करने वाले लाखन सिंह को अदालत से दंडित कराने के लिए सिर्फ इसी एक केस का हवाला नहीं दिया, बल्कि सुनील दुबे और उसके परिवार को फंसाने के लिए साल 1990 से लेकर 2009 के बीच दर्ज करवाई गई कुल सात एफआईआर का भी जिक्र किया, जिनमें हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने की धाराएं लगी थीं, लेकिन पुलिस ने जांच के बाद सभी 6 केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी.

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साल 2009 में गाजीपुर थाने में दर्ज कराए गए केस में सिर्फ एक आरोपी विवेक बाजपेई के खिलाफ चार्जशीट लगी. सुनील दुबे की नामजदगी पर फाइनल रिपोर्ट लगा दी. पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि लाखन सिंह का सुनील दुबे से कृष्णा नगर इलाके के एक तीन एकड़ की जमीन का पुराना विवाद है, जिसके चलते पेशे से अधिवक्ता लाखन सिंह कानून और अदालती कार्रवाई का दुरुपयोग करते हुए विपक्षियों को फंसाने के लिए दलित उत्पीड़न जैसे गंभीर धाराओं में केस दर्ज करवा रहा है.

अदालत ने शुक्रवार को सुनाए अपने फैसले में साफ कहा कि अगर लाखन सिंह के द्वारा दर्ज कराए गए केस में पुलिस आरोप पत्र दाखिल करती, अदालत सजा सुनाती तो निर्दोष सुनील दुबे और उसके साथी को 10-10 साल की सजा हो सकती थी.

इस केस में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी तो लाखन सिंह ने प्रोटेस्ट अपील लगा दी. अदालत में प्रोटेस्ट अपील को सुनते हुए पुलिस को अग्रिम विवेचना के आदेश दिए. पुलिस ने भी अदालत के आदेश का पालन करते हुए फिर केस को झूठा और वादी मुकदमा लाखन सिंह को झूठी एफआईआर लिखाने की रिपोर्ट भेज दी.

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