'600 साल पुरानी हैं KGMU की मजारें...' हटाने की नोटिस पर भड़के लखनऊ के कई संगठन 

लखनऊ के KGMU परिसर में बनी मजारों को हटाने के लिए प्रशासन द्वारा जारी 15 दिन के नोटिस के बाद विरोध तेज हो गया है. समाजवादी पार्टी, मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरुओं ने इसे आस्था पर चोट बताया. शाहमीना शाह में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में मजारों को 600 साल पुराना बताते हुए नोटिस वापस लेने और सरकार से हस्तक्षेप की मांग की गई.

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मजार हटाने की नोटिस लगाने के बाद हलचल तेज हो गई है (Photo ITG) मजार हटाने की नोटिस लगाने के बाद हलचल तेज हो गई है (Photo ITG)

आशीष श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 26 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:21 PM IST

लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) परिसर में मौजूद मजारों को लेकर जारी नोटिस ने सियासी और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है. विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा मजारों को अवैध निर्माण बताते हुए 15 दिनों के भीतर हटाने का नोटिस चस्पा किए जाने के बाद इस फैसले के खिलाफ तीखा विरोध शुरू हो गया है. समाजवादी पार्टी, मुस्लिम धार्मिक संगठनों और कई सामाजिक संगठनों ने इस कदम को आस्था पर चोट बताते हुए खुलकर विरोध दर्ज कराया है.

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KGMU प्रशासन की ओर से लगाए गए नोटिस में साफ तौर पर कहा गया है कि परिसर के भीतर बनी मजारें विश्वविद्यालय की संपत्ति पर अवैध रूप से निर्मित हैं और यदि तय समयसीमा के भीतर इन्हें नहीं हटाया गया, तो पुलिस बल की मदद से इन्हें ध्वस्त कर दिया जाएगा. इतना ही नहीं, ध्वस्तीकरण पर आने वाले खर्च की वसूली भी जिम्मेदार लोगों से किए जाने की चेतावनी दी गई है. नोटिस में नियमों और सरकारी दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए सख्त कार्रवाई की बात कही गई है.

समाजवादी पार्टी ने गंभीर मुद्दा बताया 

इस नोटिस के सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी ने इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए सरकार और KGMU प्रशासन पर सवाल खड़े किए हैं. पार्टी नेताओं का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इससे लाखों लोगों की धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है. सपा का आरोप है कि बिना संवाद और संवेदनशीलता के उठाया गया यह कदम सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकता है. इसी कड़ी में लखनऊ के शाहमीना शाह इलाके में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया, जिसमें समाजवादी पार्टी के नेताओं के साथ-साथ विभिन्न मुस्लिम संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और धर्मगुरुओं ने हिस्सा लिया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद वक्ताओं ने एक स्वर में KGMU प्रशासन के नोटिस का विरोध किया और इसे तत्काल वापस लेने की मांग की.

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प्रेस से बातचीत में वक्ताओं ने दावा किया कि KGMU परिसर में मौजूद मजारें करीब 600 साल पुरानी हैं और उनका ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व है. उनका कहना था कि ये मजारें केवल इमारतें नहीं, बल्कि पीढ़ियों से लोगों की आस्था का केंद्र रही हैं. यहां हर धर्म और समुदाय के लोग मन्नत मांगने और दुआ करने आते रहे हैं. ऐसे में इन्हें अवैध निर्माण बताना न सिर्फ इतिहास को नकारना है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करने जैसा है. समाजवादी पार्टी के नेताओं ने साफ कहा कि यदि मजारों को हटाने की कोशिश की गई तो पार्टी सड़कों पर उतरकर विरोध करेगी. उन्होंने सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति का ऐलान करते हुए कहा कि यह मामला केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेशव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है. सपा नेताओं ने यह भी कहा कि सरकार को चाहिए कि वह इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करे और प्रशासन को संवेदनशीलता बरतने के निर्देश दे.

आस्था का विषय बताया 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई मुस्लिम संगठनों के पदाधिकारी भी मौजूद रहे. उन्होंने कहा कि मजारें आस्था का विषय हैं और इन्हें हटाने का फैसला लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला है. वक्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि चुनिंदा धार्मिक स्थलों को ही निशाना बनाया जा रहा है, जो संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है. इस विरोध में सामाजिक कार्यकर्ता रविदास मल्होत्रा भी शामिल हुए. उन्होंने कहा कि यह मामला किसी एक धर्म या समुदाय का नहीं है, बल्कि यह सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी विश्वास से जुड़ा हुआ है. उनका कहना था कि यदि आज एक समुदाय की आस्था को चोट पहुंचाई जाती है, तो कल किसी और की बारी आ सकती है. इसलिए ऐसे फैसलों का सामूहिक रूप से विरोध जरूरी है.

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प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौलाना कल्बे जवाद समेत कई प्रमुख धर्मगुरुओं ने भी अपनी बात रखी. मौलाना कल्बे जवाद ने कहा कि मजारों का इतिहास सदियों पुराना है और इन्हें हटाने का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया प्रतीत होता है. उन्होंने सरकार से अपील की कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे और प्रशासन को कार्रवाई से रोके. साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मजारों को नुकसान पहुंचाया गया, तो इसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं. वक्ताओं ने यह भी कहा कि KGMU जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से इस तरह के असंवेदनशील कदम की उम्मीद नहीं की जाती. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वास्तव में मजारें अवैध थीं, तो इतने वर्षों तक प्रशासन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की. अब अचानक नोटिस जारी करना कई संदेहों को जन्म देता है.

सरकार को सौपेंगे ज्ञापन 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह घोषणा भी की गई कि मजारों को बचाने के लिए सरकार को ज्ञापन सौंपा जाएगा. इसके लिए एक प्रतिनिधिमंडल तैयार किया जाएगा, जो मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्रियों से मुलाकात कर इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखेगा. वक्ताओं ने कहा कि वे कानूनी दायरे में रहकर मजारों को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. KGMU प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी प्रकार का अवैध निर्माण नियमों के खिलाफ है और इसे हटाना उनकी जिम्मेदारी है. प्रशासन का तर्क है कि परिसर की जमीन शैक्षणिक और चिकित्सीय गतिविधियों के लिए निर्धारित है और वहां किसी भी तरह के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया है कि कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत की जा रही है.

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हालांकि, विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि नियमों की आड़ में आस्था को कुचलने की कोशिश की जा रही है. उनका तर्क है कि यदि प्रशासन वास्तव में कानून का पालन करना चाहता है, तो पहले मजारों के ऐतिहासिक और कानूनी पक्ष की जांच करानी चाहिए थी. बिना वैकल्पिक व्यवस्था और संवाद के नोटिस जारी करना टकराव को बढ़ावा दे रहा है. फिलहाल यह मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है. एक ओर KGMU प्रशासन अपने फैसले पर अड़ा हुआ नजर आ रहा है, तो दूसरी ओर राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन विरोध के स्वर तेज कर रहे हैं. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या कोई मध्यस्थ समाधान निकल पाता है.

स्पष्ट है कि KGMU परिसर की मजारों का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आस्था, राजनीति और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा एक संवेदनशील विषय बन चुका है. यदि समय रहते संवाद और संतुलित निर्णय नहीं लिया गया, तो यह विवाद और गहराता जा सकता है.

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