जब 'नरक के दरवाजे' में घुसा शख्स, 1000 डिग्री तापमान में 17 मिनट रहा, बताया अंदर क्या देखा?

तुर्कमेनिस्तान में, एक प्राकृतिक गैस क्रेटर जिसे 'डोर टू हेल' यानी नरक के द्वार के नाम से जाना जाता है, वह 1971 से लगातार जल रहा है. एक बार जब शख्स इसमें उतरा तो उसने बताया कि वहां उसने क्या कुछ देखा.

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aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 1:06 PM IST

तुर्कमेनिस्तान में, एक प्राकृतिक गैस क्रेटर ने दशकों से वैज्ञानिकों और लोगों को कई दशकों से हैरान कर रखा है. दरवाजा क्रेटर, जिसे 'डोर टू हेल' यानी नरक के द्वार के नाम से जाना जाता है, वह 1971 से लगातार जल रहा है. यह एक प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट और जियोलॉजिकल फेनोमेना बन गया है. इसे बुझाने के प्रयासों के बावजूद, काराकुम रेगिस्तान में आग का ये गड्ढा कभी बुझा ही नहीं.

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2 साल की तैयारी और वो 17 मिनट

इन सभी सालों में, केवल एक ही आदमी गैस रीडिंग और मिट्टी के नमूने प्राप्त लेने के लिए संभवत: 1,000 डिग्री सेल्सियस के  तापमान वाले 230 फुट चौड़े, 100 फुट गहरे गड्ढे में उतरा है. एक्सप्लोरर और एडवेंचरर जॉर्ज कौरौनिस, 2013 में मीथेन उगलने वाले "डोर टू हेल" में उतर गए थे. नेशनल ज्योग्राफिक के अनुसार, कौरूनिस ने अभियान के लिए दो साल तक तैयारी की थी और खास सूट पहनकर वहां के नमूने एकत्र करने के लिए उन्हें केवल 17 मिनट मिले थे.  

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'सचमुच नरक ही था'

'नर्क का दरवाजे' में जाकर जिंदा लौटे कौरूनिस ने बताया कि 'वह 17 मिनट मेरे दिमाग में बहुत गहराई तक छपे हुए हैं. यह बहुत डरावना था, जितना मैंने सोचा था उससे कहीं ज्यादा गर्म और बड़ा. जब आप बीच में लटक रहे होते हैं तो आपको ऐसा महसूस होता है जैसे तार पर कपड़े का एक टुकड़ा सूख रहा है. मैं चारों ओर देख रहा था और यह सचमुच नरक के द्वार जैसा लग रहा था, एहसास हुआ कि अगर कुछ गलत हुआ तो गिर जाउंगा और मर जाउंगा. उसने एक कस्टम-निर्मित चढ़ाई हार्नेस का उपयोग किया जो गर्मी से नहीं पिघलता. इस मिशन ने दुनिया भर में क्रेटर के बारे में जागरूकता फैलाई थी और इसके अंदर कोरोनिस की तस्वीर इंटरनेट पर बहुत वायरल हुई थी.

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हीट रजिस्टेंट सूट में भी पके आलू जैसा अहसास 

unilad डॉट कॉम की खबर के अनुसार उन्होंने आगे कहा 'दिन हो या रात यहां बस आग है. आप किनारे पर खड़े रहकर मानो आग की दहाड़ सुन सकते हैं.  गर्मी असहनीय है. वहां हजारों छोटी-छोटी लपटें हैं किनारों के आसपास और सेंटर में भी.  नीचे बीच में दो बड़ी लपटें हैं और संभवत: यहीं पर नैचुरल गैस का ड्रिलिंग वाला छेद था जिसे एक थ्योरी में आग का कारण माना जाता है. यहां हर चीज का रंग नारंगी दिखता है. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने हीट रजिस्टेंट सूट में भी 'कुछ-कुछ पके हुए आलू जैसा' महसूस कर रहे है.'

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कैसे बना डोर टू हेल?

नेशनल ज्योग्राफिक ने कहा कि यह पता नहीं है कि यह गड्ढा कैसे बना लेकिन दशकों से कई थ्योरी प्रचलित हैं. ऐसी ही एक कहानी की मानें तो 1960 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ के इंजीनियर इस क्षेत्र में ड्रिलिंग कर रहे थे, तभी उनके नीचे जमीन धंस गई, जिससे बड़ा छेद खुल गया. माना जाता है कि इंजीनियरों ने मीथेन गैस जलाई थी, उन्हें उम्मीद थी कि यह जल्दी ही जल कर खत्म हो जाएगी. लेकिन वह आग आज भी जल रही है. 'डोर टू हेल' पर्यटकों के बीच एक लोकप्रिय स्थान है और तुर्कमेनिस्तान को भारी मुनाफा देता है.

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