मैसूर की रक्षक देवी,1000 साल पुराना इतिहास, नवरात्रि में घूम आएं इस धाम

नवरात्रि के दौरान मैसूर की 3489 फीट ऊंची चामुंडेश्वरी पहाड़ी पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है. कहा जाता है यहां दर्शन का अनुभव साधारण नहीं बल्कि आत्मा को छू जाने वाला होता है.

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3489 फीट ऊंचाई पर विराजमान चामुंडेश्वरी मंदिर (Photo: incredibleindia.gov.in) 3489 फीट ऊंचाई पर विराजमान चामुंडेश्वरी मंदिर (Photo: incredibleindia.gov.in)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 सितंबर 2025,
  • अपडेटेड 12:47 PM IST

क्या आप जानते हैं कि कर्नाटक में एक ऐसा दिव्य धाम है, जो न सिर्फ 3489 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, बल्कि 1000 साल से भी ज़्यादा पुराना है? हम बात कर रहे हैं मैसूर की रक्षक देवी, श्री चामुंडेश्वरी के मंदिर की. यह सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि एक शानदार ट्रेवल डेस्टिनेशन भी है. पहाड़ी की चोटी पर होने के कारण, यहां पहुंचने का सफ़र भी रोमांच से भरा होता है. खासकर नवरात्रि के दौरान, जब मां चामुंडेश्वरी की शक्ति अपने शिखर पर होती है, तो इस धाम के दर्शन करना शुभ माना जाता है. अगर आप आध्यात्म और रोमांच दोनों का मजा लेना चाहते हैं, तो यह यात्रा आपके लिए बिल्कुल फरफेक्ट है.

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3489 फीट की ऊंचाई और अद्भुत नज़ारे

मंदिर की सबसे बड़ी पहचान इसकी ऊंचाई है. मैसूर से लगभग 13 किलोमीटर दूर स्थित यह पहाड़ी दूर से ही दिखाई देती है, मानो किसी मुकुट की शोभा हो. मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क और बस दोनों की सुविधा है. आप अपनी गाड़ी से या नियमित बस सेवाओं से आराम से ऊपर तक जा सकते हैं.

यह सफ़र सिर्फ़ मंदिर तक पहुंचने का रास्ता नहीं है, बल्कि अपने-आप में एक बेहतरीन पहाड़ी यात्रा है. जैसे-जैसे आप ऊपर चढ़ते हैं, मैसूर शहर का नज़ारा खुलता जाता है. दशहरे के वक्त जब पूरा शहर और मैसूर पैलेस रोशनी से जगमगा उठता है, तो चोटी से यह दृश्य देखना किसी जादू से कम नहीं होता. खास बात यह है कि यहां से पैलेस, ललिता महल पैलेस, कुक्कराहल्ली झील और सेंट फिलोमेना चर्च जैसे प्रमुख स्थल साफ़ दिखाई देते हैं, जो आपकी यात्रा की थकान तुरंत मिटा देते हैं.

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प्राचीनता और आस्था का अद्भुत संगम

यह मंदिर कोई साधारण स्थल नहीं है, इसकी इतिहास 1000 सालों से भी अधिक पुरानी है. शुरुआत में यह एक छोटा सा मंदिर था, लेकिन समय के साथ इसका महत्व बढ़ता गया. कहा जाता है कि साल 1399 में मैसूर के महाराजा वोडेयार ने इसे अपनी कुलदेवी (गृहदेवी) का दर्जा दिया, तभी से इसकी धार्मिक महत्ता और बढ़ गई. 

मंदिर का नाम पहाड़ी के प्राचीन नाम 'महाबलाद्रि' से बदलकर 'चामुंडेश्वरी' रखा गया, जो देवी पार्वती का ही एक प्रचंड रूप हैं. यह स्थान स्कंद पुराण में वर्णित आठ पहाड़ियों में से एक है. यही वजह है कि नवरात्रि के दौरान यहां देवी चामुंडी की पूजा विशेष रूप से होती है. इतना ही नहीं मान्यता है कि मां दुर्गा ने यहीं पर चंड-मुंड और महिषासुर का वध किया था. यही कारण है कि भक्त मानते हैं कि इस मंदिर में दर्शन करने से हर कठिनाई दूर होती है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

वास्तुकला की भव्यता और द्रविड़ शैली का जादू

अगर आपको मंदिरों की वास्तुकला देखने का शौक है, तो श्री चामुंडेश्वरी मंदिर आपको जरूर आकर्षित करेगा. इस मंदिर की खास बात है कि यह द्रविड़ शैली में बना है और इसका सात मंज़िला पिरामिडनुमा गोपुरम (प्रवेश मीनार) सबसे खास है. इसके अलावा प्रवेश द्वार पर आते ही यहां का नजारा किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकता है. इतना ही नहीं मंदिर के मुख्य द्वार पर चांदी की परत चढ़ी है, जिस पर देवी के अलग-अलग रूपों की नक्काशी की गई है. यही नहीं मंदिर का चतुर्भुजाकार डिज़ाइन और गर्भगृह के ऊपर बना छोटा मीनार (विमान) इसकी प्राचीन और खूबसूरत कलाकारी को दिखाता है.

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घूमने वालों के लिए आकर्षण

यहां सिर्फ मंदिर ही नहीं बल्कि और भी जगहें देखने लायक हैं. चामुंडी की पहाड़ियों पर ‘महिषासुर’ की विशाल प्रतिमा है जो पर्यटकों को आकर्षित करती है. इसके अलावा मंदिर की ओर जाते हुए नंदी की एक अखंड प्रतिमा भी दिखाई देती है. खास बात यह है कि मंदिर के आसपास जंगल है, जहां पक्षियों और जानवरों की विविधता देखने को मिलती है. पास में ही चामुंडी गांव बसा है जो इस यात्रा को और भी दिलचस्प बनाता है.

नवरात्रि में क्यों है खास अनुभव?

नवरात्रि के दौरान इस मंदिर का माहौल बिल्कुल अलग हो जाता है. भक्तों की भीड़, मंत्रोच्चारण, सजावट और देवी की विशेष पूजा पूरे वातावरण को दिव्य बना देते हैं. कहा जाता है कि नवरात्रि में यहां दर्शन करने से आत्मिक शांति मिलती है और जीवन की परेशानियां दूर होती हैं. यही वजह है कि भक्तों के साथ-साथ सैलानी भी यहां आते हैं.

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