चीन के बाद अमेरिका ने भी बनाया लैब में सूरज, जल्द ठंडा पड़ने वाला है असली सूर्य!

अमेरिका ने लैब में नकली सूरज बनाया. ये एनर्जी का बड़ा स्त्रोत साबित होगा, ऐसे दावे हो रहे हैं. चीन भी सूरज से भी कई गुना ज्यादा गर्मी पैदा करने वाली प्रक्रिया में सफलता की बात कर चुका है. यानी सूरज भी अब मेड-इन अमेरिका या मेड-इन चाइना होने वाला है. इसके बीच ये बात भी आ रही है कि क्या असली सूरज की एक्सपायरी डेट करीब आ चुकी है?

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अपनी रेड जायंट अवस्था में सूरज जमकर तबाही मचाएगा. सांकेतिक फोटो (Pixabay) अपनी रेड जायंट अवस्था में सूरज जमकर तबाही मचाएगा. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 दिसंबर 2022,
  • अपडेटेड 11:54 AM IST

सर्दियां आते ही सूरज की रोशनी कम पड़ने लगती है. तब ज्यादातर लोग किसी न किसी बीमारी, खासकर मानसिक परेशानियों की चपेट में आ जाते हैं. लेकिन क्या हो अगर एकाएक सूरज ऐसे बुझ जाए, जैसे बिजली चली जाती है! वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसा जरूर होगा, लेकिन अभी नहीं, बल्कि लगभग 5 बिलियन सालों के बाद. ऐसे होते ही दुनिया में सब बदल जाएगा. क्या बदलेगा, ये समझने के पहले एक बार सूरज से निकलती गर्मी को समझते हैं. 

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ये गर्मी एक तरह की एनर्जी है, जो न्यूक्लियर फ्यूजन से पैदा होती है. सूरज दरअसल हीलियम और हाइड्रोजन जैसी गैसों से मिलकर बना है. इनमें विखंडन से बहुत ज्यादा ऊर्जा निकलती है, जिसका एक हिस्सा धरती पर भी पहुंचता है, जबकि कुछ हिस्सा स्पेस में ही बिखरकर रह जाता है. 

क्या है रेड जायंट अवस्था?
5 बिलियन साल के पास पहुंचते हुए हाइड्रोजन खत्म होने लगेगा. इससे फ्यूजन की प्रोसेस धीमी पड़ती जाएगी, यानी सूरज के भीतर उतनी ऊर्जा नहीं बचेगी. इसे ठीक करते हुए सूरज और भी ज्यादा गर्म, ज्यादा विशाल होने लगेगा. इस स्टेट को रेड जायंट कहा जा रहा है. हर खत्म होता तारा पहले इस स्टेज में पहुंचता है. 

ठंडा पड़ने से पहले सूरज का तापमान तेजी से बढ़ेगा, जिससे धरती जलने लगेगी. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

धरती पर तबाही मच जाएगी
इस दौरान हमारे ग्रह का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि समुद्र सूख जाएंगे. पेड़-पौधे खत्म होने लगेंगे और हाहाकार मच जाएगा. पानी सूखने के बाद ठोस चीजें भी गलने और भाप बनने लगेंगी. जाहिर बात है कि ऐसे में इंसानों या किसी भी स्पीशीज का जीवित रहना असंभव है. 

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हालात और खराब होंगे. सूरज इतना फैल जाएगा कि आसपास के कई ग्रहों, जैसे शुक्र और मर्करी को भी अपने भीतर समा लेगा. ये भी अनुमान लगाया जा रहा है कि शायद धरती भी सूरज के भीतर चली जाए. हालांकि आखिर के ग्रहों को ये खतरा नहीं रहेगा. लेकिन बता दें कि ये सब केवल अनुमान है, जो वैज्ञानिक बहुत से शोधों के आधार पर लगा रहे हैं. 

लेकिन अभी सूरज पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है
इसके बाद भी एक स्टेज आएगी, जिसे वैज्ञानिक वाइट ड्वार्फ नाम देते हैं. इस दौरान सूरज का गुस्सा ठंडा पड़ने लगेगा. उसके फैलने की रफ्तार कम होते-होते रुक जाएगी और बाहरी सतह पर लगातार भयंकर विस्फोट होने लगेंगे, जो तब तक होते रहेंगे, जब तक कि सूरज की गर्मी पूरी तरह खत्म न हो जाए. हालांकि इसके बाद भी उसके अवशेष बचे रहेंगे, जिनके बेहद गर्मी और जहरीली गैसें निकलती रहेंगी. उसे ठंडा होने में भी कम से कम 1 बिलियन वर्ष लगेगा. इस तरह से सूरज पूरी तरह खत्म हो जाएगा. 

विस्फोटों के बाद सूरज की ऊर्जा पूरी तरह खत्म होगी, और वो वाइट ड्वार्फ अवस्था में पहुंच जाएगा. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

वैज्ञानिक अभी से सोचने लगे कि इंसानों को कहां ले जाया जाए
ये भी हो सकता है कि सूरज के तापमान में अंतर दिखने के साथ ही हम इंसानी किसी दूर-दराज के प्लानेट पर बसने की जगह खोज लें. वो जो सूरज से काफी दूर हो ताकि उसके रेड जायंट अवस्था में हम सुरक्षित रह सकें. वैसे इसमें लगभग 5 बिलियन साल बाकी हैं. 

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लैब में वही प्रक्रिया दोहराई गई
जाते हुए ये भी समझ लें कि अमेरिका या फिर चीन जिस लैब-मेड-सूरज की बात कर रहे हैं वो असल में क्या है. सूरज के भीतर जिस तरह से एनर्जी पैदा होती है, ये उसकी नकल है. असली सूरज में हीलियम और हाइड्रोजन जैसी गैसें हाई टेंपरेचर पर क्रिया करती हैं. इससे एनर्जी का विस्फोट होता है. लैब में ही इस प्रक्रिया को पूरा करने की कोशिश हुई. कई बार असफलता मिली. कई बार न्यूक्लियर फ्यूजन चैंबर ही इतने तापमान को बर्दाश्त नहीं कर सका.

सूरज की नकल पर लैब में पैदा ऊर्जा को ग्रीन एनर्जी माना जा रहा है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

सालभर पहले ही चीन ने एलान किया कि वो इसमें सफल हो चुका है, और लैब में ही वो असली सूरज से ज्यादा ऊर्जा पैदा कर सकता है. ये गर्मी लगभग 200 मिलियन डिग्री सेल्सियस है, जो कि असल सूर्य से 10 गुना से भी ज्यादा है. अब अमेरिका ने भी यही बात दोहराई. 

क्या होगा फायदा?
एक्सपर्ट मान रहे हैं कि इस तरह से मिलने वाली एनर्जी ऊर्जा के बाकी स्त्रोतों से ज्यादा अच्छी होगी. इससे हम धरती खोदकर गैसें और जीवाश्म नहीं निकालेंगे, यानी पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा. कुल मिलाकर, लैब में सूरज की नकल को ग्रीन एनर्जी से जोड़ा जा रहा है और क्लेम हो रहा है कि इससे दुनिया में गहराता ऊर्जा संकट कम हो सकेगा.

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