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धर्म

सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण, जानें ग्रहण पर क्या कहता है इस्लाम?

प्रज्ञा बाजपेयी
  • 25 जुलाई 2018,
  • अपडेटेड 3:35 PM IST
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21वीं सदी का सबसे बड़ा चंद्रग्रहण 27 जुलाई 2018 को होने वाला है. इस दिन चंद्रमा लाल रंग का दिखाई देगा, जिसको 'ब्लड मून'  नाम दिया गया है. 27 जुलाई को होने वाला चंद्रग्रहण इस सदी का सबसे प्रभावशाली चंद्रग्रहण माना जा रहा है.

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अलग-अलग धर्मों में ग्रहण को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं. आइए जानते हैं इस्लाम धर्म में ग्रहण को लेकर क्या महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं.

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इस्लाम धर्म में माना जाता है कि स्वर्ग यानी जन्नत और धरती पर जितनी भी चीजें हैं, उन सभी को बनाने और स्थिर रखने वाला सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला है.

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कुरान में कई जगह अल्लाह तअाला की कुदरत का जिक्र किया गया है. कुरान की आयत (7:54) में कहा गया है कि 'वो अल्लाह है जिसने सूरज, चांद और तारों के साथ सभी चीजों को बनाया है. ये सभी अल्लाह के हुक्म का पालन करती हैं.'

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कुरान की आयत (21:33) में कहा गया है कि 'वो अल्लाह है जिसने रात और दिन के साथ सूरज और चांद को बनाया है. आसमान में रहने वाली सभी खगोलीय पिंड अपनी ऑर्बिट में घूमती हैं.'

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इस्लाम धर्म में सूर्य ग्रहण के दौरान सभी मुस्लिम मर्द और औरतों को 'सलात-अल-खुसूफ'  नमाज अदा करने की हिदायत दी गई है.

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पैगंबर हज़रत मुहम्मद की जिंदगी में उनके बेटे हजरत इब्राहिम की मौत के दिन सूरज पर ग्रहण लगा था. तब कहा गया कि, पैगंबर के बेटे की मौत होने से पैगंबर बेहद दुखी हैं, जिस वजह से सूरज पर ग्रहण लगा है.

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इसपर पैगंबर ने कहा था कि चांद और सूरज पर किसी की मौत होने के कारण ग्रहण नहीं लगता है, बल्कि ये अल्लाह की तरफ से दिए गए संकेतों में से 2 संकेत हैं. इन्हें देखने के बाद उठकर नमाज पढ़ें और इबादत करें.

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इस्लाम में अल्लाह तअाला का शुक्रगुजार होने की वजहें-पहला, चंद्र और सूर्य ग्रहण अल्लाह तआला की ताकत और कुदरत को दर्शाता है.

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दूसरा, हज़रत मोहम्मद के साथी हजरत अबु बक्र का कहना था कि, सूरज या चांद पर ग्रहण लगने से लोग डर जाते हैं. जिसके बाद मुस्लिम लोग अल्लाह से उसके रहम की पुकार करते हैं.

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तीसरा, हजरत अबु मूसा का कहना था कि ग्रहण कयामत के दिन की याद दिलाता है.

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सूरज पर ग्रहण लगते ही पैगंबर हज़रत मुहम्मद कहते थे कि ये कयामत का समय हो सकता है. वह मस्जिद की ओर जाते और नमाज पढ़ते और सबसे लंबा कियाम करते थे. इसके बाद वह कहते थे कि ये इशारे जो अल्लाह दे रहा है, इसका किसी के जीवन या मौत से ताल्लुक नहीं है बल्कि अल्लाह तआला अपने बंदों को डरा रहा है. इसलिए जब भी ग्रहण देखो, अल्लाह को याद करो और उससे अपने गुनाहों की माफी मांगो. ( बुखारी 2:167)

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इस्लाम में ग्रहण के वक्त नमाज अदा करने का तरीका-हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर ने ग्रहण के वक्त लोगों को हुजूम के साथ दो रकात नमाज अदा करने की सलाह दी थी.


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हजरत अबु बक्र ने कहा था, पैगंबर साहब की जिंदगी में जब भी सूरज पर ग्रहण लगता था तो वह अल्लाह की बारगाह में दो रकात नमाज अदा करते थे.

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हजरत आयशा ने बताया था कि पैगंबर हज़रत मुहम्मद ग्रहण के दौरान लोगों को अपने साथ हुजूम में खड़ा कर के दो रकात नमाज 4 सजदे के साथ अदा करते थे, जिसमें उनका पहला रुकु काफी लंबे समय तक होता था.

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हजरत आयशा का कहना था कि जब पैगंबर हज़रत मुहम्मद नमाज पूरी कर के उठते थे तो सूरज पर लगा ग्रहण पूरी तरह से हट चुका होता था.

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'सूरज और चांद पर लगा ग्रहण अल्लाह तआला के दिए गए संकेतों में से 2 अहम संकेत माने जाते हैं. किसी का जिंदगी या मौत की वजह से चांद और सूरज पर ग्रहण नहीं लगता है. इसलिए जब भी ग्रहण देखें, अल्लाह को याद करें. नमाज पढ़ें और सदका दें.' ( हदीस 2:154)

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आधुनिक जीवन में ग्रहण को लेकर डर और अंधविश्वास खत्म हो चुका है. हालांकि, आज भी कई मुस्लिम लोग चांद या सूरज पर ग्रहण लगने के दौरान अल्लाह को याद करते हैं. मुस्लिम लोगों का मानना है कि जन्नत और जमीन की हर एक चीज पर सिर्फ अल्लाह की ही हुकूमत है.

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