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धर्म

आज है नवरोज, जानिए कहां, कैसे और क्यों मनाते हैं यह पर्व

नंदलाल शर्मा/मंजू ममगाईं/aajtak.in
  • 19 मार्च 2019,
  • अपडेटेड 11:06 AM IST
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आज पारसी समुदाय नवरोज मना रहा है. 'नवरोज' पारसी लोगों का नववर्ष माना जाता है. नवरोज का अर्थ ईरानी कैलेंडर के पहले महीने का पहला दिन होता है. खबरों की मानें तो नवरोज मनाने की परंपरा करीब 3000 साल पहले शुरू हुई थी.पारसी समुदाय के नववर्ष को पतेती, जमशेदी नवरोज और नवरोज जैसे कई नामों से पहचाना जाना जाता है. आइए जानते हैं आखिर कैसे हुई इसे मनाने की शुरूआत.

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नवरोज मनाने की शुरूआत
नवरोज, फारस के राजा जमशेद की याद में मनाते हैं. कहा जाता है कि करीब तीन हजार साल पहले पारसी समुदाय के एक योद्धा जमशेद ने पहली बार इस पारसी कैलेंडर की स्थापना की थी. ग्रेगोरी कैलेंडर के अनुसार, नवरोज वसंत ऋतु में दिन मनाया जाता है, जब दिन और रात बराबर होते हैं.

(UNESCO Image)

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कैसे मनाते हैं यह पर्व

इस दिन घर की साफ-सफाई कर घर के बाहर रंगोली बनाई जाती है. नवरोज के दिन पारसी परिवार के सभी सदस्‍य सुबह जल्‍दी उठकर तैयार हो जाते हैं. पारसी लोग इस दिन खास पकवान बनाते हैं, जिन्हें वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ बांटते हैं. इसके अलावा वो इस दिन एक-दूसरे के प्रति सहयोग और प्रेम  व्यक्त करने के लिए आपस में उपहार भी बांटते हैं.

(Reuters Image)

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नवरोज से जुड़ी कुछ मान्यताएं

पारसी समुदाय देश की सबसे कम आबादी वाले अल्पसंख्यक समुदायों में से एक है. बावजूद इसके नवरोज जैसे त्योहार के माध्यम से इस समुदाय ने आज भी अपनी परंपराओं को जिंदा रखा है. इस दिन पारसी लोग चंदन की लकड़ियों के टुकड़े घर में रखते हैं. ऐसा करने के पीछे उनकी यह मान्यता है कि चंदन की लकड़ियों की सुगंध हर ओर फैलने से हवा शुद्ध होती है.

(Reuters Image)

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क्‍या होता है इस दिन

पारसी मंदिर अगियारी में विशेष प्रार्थनाएं होती हैं. इन प्रार्थनाओं में लोग पिछले साल उन्‍होंने जो कुछ भी पाया, उसके लिए ईश्‍वर के प्रति आभार व्‍यक्‍त करते हैं. मंदिर में प्रार्थना समाप्‍त होने के बाद समुदाय के लोग एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं.


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