21वीं सदी के विचारक ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1939 को हुआ था. अपने जीवनकाल के दौरान उन्हें विवादास्पद रहस्यदर्शी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में देखा गया. उन्होंने मानव जीवन में कामुकता पर खुलकर अपनी राय रखी जिसके कारण उन्हें 'सेक्स गुरु' की भी संज्ञा दे दी गई. ओशो ने 'संभोग से समाधि की ओर' का विचार दिया. अश्लीलता, कामुकता और युवाओं को लेकर लंबे समय से एक बहस चली आ रही है, आइए जानते हैं ओशो के विचार....
ओशो कहते हैं- मैं युवकों से कहना चाहूंगा कि तुम जिस दुनिया को बनाने में संलग्न हो, उसमें यौन संबंधों को वर्जित मत करना. अन्यथा आदमी और भी कामुक से कामुक होता चला जाएगा. मेरी यह बात देखने में बड़ी उलटी लगेगी. अख़बार वाले और नेतागण चिल्ला-चिल्ला कर घोषणा करते है कि मैं लोगों में काम का प्रचार कर रहा हूं. सच्चाई उलटी है के मैं लोगों को काम से मुक्त करना चाहता हूं. और प्रचार वे कर रहे हैं. लेकिन उनका प्रचार दिखाई नहीं पड़ता. क्योंकि हजारों साल की परंपरा से उनकी बातें सुन-सुन कर हम अंधे और बहरे हो गये है. हमें ख्याल ही रहा कि वे क्या कह रहे है. मन के सूत्रों का, मन के विज्ञान का कोई बोध ही नहीं रहा. कि वे क्या कर रहे है. वे क्या करवा रहे है. इसलिए आज जितना कामुक आदमी भारत में है. उतना कामुक आदमी पृथ्वी के किसी कोने में नहीं है.
एक बार ओशो अपने शिष्यों के सवाल का जवाब दे रहे थे. उन्होंने कहा, अभी मैं एक गांव में था. और कुछ बड़े विचारक और संत-साधु मिल कर अश्लील पोस्टर विरोधी एक सम्मेलन कर रहे थे . तो उनका ख्याल है कि अश्लील पोस्टर लगता है दीवार पर, इसलिए लोग कामवासना से परेशान रहते हैं. जब कि हालत दूसरी है, लोग कामवासना से परेशान हैं, इसलिए पोस्टर में मजा है. यह पोस्टर कौन देखेगा? पोस्टर को देखने कौन जा रहा है?
पोस्टर को देखने वही जा रहा है, जो स्त्री-पुरुष के शरीर को देख ही नहीं सका. जो शरीर के सौंदर्य को नहीं देख सका, जो शरीर की सहजता को अनुभव नहीं कर सका, वह पोस्टर देख रहा है. पोस्टर इन्हीं गुरुओं की कृपा से लग रहे हैं, क्योंकि ये इधर स्त्री-पुरुष को मिलने-जुलने नहीं देते, पास नहीं होने देते, तो इसका परवर्टेड, विकृत रूप है कि कोई गंदी किताब पढ़ रहा है, कोई गंदी तस्वीर देख रहा है, कोई फिल्म बना रहा है. क्योंकि आखिर यह फिल्म कोई आसमान से नहीं टपकती, लोगों की जरूरत है.
इसलिए सवाल यह नहीं है कि गंदी फिल्म क्यों है, सवाल यह है कि लोगों में जरूरत क्यों है? यह तस्वीर जो पोस्टर लगती है, कोई ऐसे ही मुफ्त पैसा खराब करके नहीं लगाता, इसका कोई उपयोग है. इसे कहीं कोई देखने को तैयार है, मांग है इसकी. वह मांग कैसे पैदा हुई है? वह मांग हमने पैदा की है. स्त्री-पुरुष को दूर कर-कर के वह मांग पैदा कर दी. अब वह मांग को पूरा करने जब कोई जाता है तो हमको लगता है कि गड़बड़ हो रही है. तो उसको और बाधाएं डालो. उसको जितनी वे बाधाएं डालेंगे, वह नये रास्ते खोजता है मांग के. क्योंकि मांग तो अपनी पूर्ति मांगती है.
मेरे एक डाक्टर मित्र इंग्लैण्ड के एक मेडिकल कांफ्रेंस में भाग लेने गये थे. व्हाइट पार्क में उनकी सभा होती थी. कोई पाँच सौ डाक्टर इकट्ठे थे. बातचीत चलती थी. खाना पीना चलता था. लेकिन पास की बेंच पर एक युवक और युवती गले में हाथ डाले अत्यंत प्रेम में लीन आंखे बंद किये बैठे थे. उन मित्र के प्राणों में बेचैनी होने लगी. भारतीय प्राण में चारों तरफ झांकने का मन होता है. अब खाने में उनका मन न रहा. अब चर्चा में उनका रस न रहा. वे बार-बार लौटकर उस बेंच कीओर देखने लगे. पुलिस क्या कर रही है. वह बंद क्यों नहीं करती ये सब. ये कैसा अश्लील देश है. यह लड़के और लड़की आँख बंद किये हुए चुपचाप पाँच सौ लोगों की भीड़ के पास ही बेंच पर बैठे हुए प्रेम प्रकट कर रहे है. कैसे लोग है यह क्या हो रहा है. यह बर्दाश्त के बाहर है. पुलिस क्या कर रही है. बार-बार वहां देखते.
पड़ोस के एक आस्ट्रेलियन डाक्टर ने उनको हाथ के इशारा किया ओर कहा, बार-बार मत देखिए, नहीं तो पुलिसवाला आपको यहां से उठा कर ले जायेगा. वह अनैतिकता का सबूत है. यह दो व्यक्तियों की निजी जिंदगी की बात है. और वे दोनों व्यक्ति इसलिए पाँच सौ लोगों की भीड़ के पास भी शांति से बैठे है, क्योंकि वे जानते है कि यहां सज्जन लोग इकट्ठे है, कोई देखेगा नहीं. किसी को प्रयोजन भी क्या है. आपका यह देखना बहुत गर्हित है, बहुत अशोभन है, बहुत अशिष्ट है. यह अच्छे आदमी का सबूत नहीं है. आप पाँच सौ लोगों को देख रहे है कोई भी फिक्र नहीं कर रहा. क्या प्रयोजन है किसी से. यह उनकी अपनी बात है. और दो व्यक्ति इस उम्र में प्रेम करें तो पाप क्या है? और प्रेम में वह आँख बंद करके पास-पास बैठे हों तो हर्ज क्या है? आप परेशान हो रहे है. न तो कोई आपके गले में हाथ डाले हुए है, न कोई आपसे प्रेम कर रहा है.
वह मित्र मुझसे लौटकर कहने लगे कि मैं इतना घबरा गया किये कैसे लोग है. लेकिन धीरे-धीरे उनकी समझ में यह बात पड़ी की गलत वे ही थे. हमारा पूरा मुल्क ही एक दूसरे घर में दरवाजे के होल बना कर झाँकता रहता है. कहां क्या हो रहा है. कौन क्या कर रहा है? कौन जा रहा है? कौन किसके साथ है? कौन किसके गले में हाथ डाले है? कौन किसका हाथ-हाथ में लिए है? क्या बदतमीजी है, कैसी संस्कारहीनता है. यह सब क्या है? यह क्यों हो रहा है? यह हो रह है इसलिए कि भीतर वह जिसको दबाता है, वह सब तरफ से दिखाई पड़ रहा है. वही दिखाई पड़ रहा है.
तथ्य को समझते ही आदमी कहानियों से मुक्त हो जाता है. और जो तथ्य से बचता है, वह कहानियों में भटक जाता है. कितनी सेक्स की कहानियां चलती हे. और कोई मजाक ही नहीं है हमारे पास, बस एक ही मजाक है कि यौन संबंध की तरफ इशारा करें और हंसे. हद हो गई. तो जो आदमी यौन संबंध की तरफ इशारा करके हंसता है, वह आदमी बहुत ही क्षुद्र है. कामुकता की तरफ इशारा करके हंसने का क्या मतलब है? उसका एक ही मतलब है कि आप समझते ही नहीं. बच्चे तो बहुत तकलीफ में है कि उन्हें कौन समझायें, किससे वे बातें करें कौन सारे तथ्यों को सामने रखे. उनके प्राणों में जिज्ञासा है, खोज है, लेकिन उसको दबाये चले जाते हे. रोके चले जाते है. उसके दुष्परिणाम होते है. जितना रोकते है, उतना मन वहां दौड़ने लगता है और उस रोकने और दौड़ने में सारी शक्ति और ऊर्जा नष्ट हो जाती है. यह मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जिस देश में भी इसकी स्वस्थ रूपा से स्वीकृति नहीं होती, उस देश की प्रतिभा का जन्म नहीं होता. पश्चिम में तीस वर्षो में जो जीनियस पैदा हुआ है, जो प्रतिभा पैदा हुई है. वह यौन संबंध के तथ्य की स्वीकृति से पैदा हुई है.