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धर्म

भगवान शिव ने क्यों पहने थे गोपियों के वस्त्र?

aajtak.in
  • 24 नवंबर 2017,
  • अपडेटेड 11:36 AM IST
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कैलाश पर्वत पर एक बार महादेव शंकर ध्यानमग्न थे, तभी भगवान शिव के कानों में श्रीकृष्ण की बांसुरी की मीठी धुन पड़ी. रास लीला में उल्लासित लोगों की टोली एक साथ नाच-गाकर दिव्य आनंद की प्राप्ति कर रही थी.

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जब यह रास लीला शुरु हुई, तो भगवान शिव पहाड़ों में ध्यान मग्न थे. श्रीकृष्ण भी भगवान शिव के भक्त रहे हैं. हर सुबह और शाम कृष्ण महादेव के मंदिर जाया करते थे.

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जब शिव ध्यान में मग्न थे और अचानक, उन्हें पता चला कि जो आनंद उन्हें ध्यान में मिल रहा है, रास में लीन बच्चे नाच कर उसी आनंद का पान कर रहे हैं. वह देखकर हैरान थे कि छोटी उम्र का उनका वह भक्त बांस के छोटे टुकड़े की मोहक धुन पर सभी को नचाकर परम आनंद में डुबो रहा था. अब शिव से रहा नहीं गया.

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वह रास देखना चाहते थे. वह तुरंत उठे और सीधे यमुना तट की ओर चल दिए. वह यमुना को पार कर देखना चाह रहे थे कि वहां क्या हो रहा है.

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लेकिन जब भोलेनाथ वहां पहुंचे तो नदी की देवी वृनदेवी ने उन्हें वहीं रोक दिया. वृनदेवी ने कहा कि श्रीकृष्ण की रासलीला में उनके अलावा दूसरा कोई पुरुष नहीं आ सकता है. अगर आपको वहां जाना है, तो आपको महिला के रूप में आना होगा.

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इस पर शिव आश्चर्यचकित रह गए. शिव को पौरुष का प्रतीक माना जाता है. उनका प्रतीक लिंग और बाकी सब चीजों के होने की भी यही वजह है. ये प्रतीक उनके पौरुषता के साक्षात प्रमाण हैं. अब ऐसे में उनके सामने बड़ी दुविधा थी कि वह महिला के वेश में कैसे आएं.

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वहीं, दूसरी ओर रास अपने चरम पर था. वह वहां जाना भी चाहते थे. नदी की वृनदेवी ने भगवान शिव से कहा कि अगर आप महिला का वेश धारण करने के लिए तैयार हैं, तो मैं आपको जाने दूंगी. वरना नहीं.’

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भगवान शिव गोपी का वेष धारण करने के लिए तैयार हो गए. तब वृनदेवी ने उनके सामने गोपी वाले वस्त्र पेश कर दिए. शिव ने उन्हें पहना और नदी पार करके चले गए.

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तो शिव को भी रास लीला में शामिल होने के लिए गोपी का वेष धारण करना पड़ा. प्रेम, खुशी, उल्लास और आनंद की यह रासलीला यूं ही चलती रही.

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