प्रयागराज माघ मेला के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों से मेला प्रशासन का टकराव चर्चा में है. इस मामले ने तूल पकड़ते हुए राजनीतिक रंग ले लिया है. इसके साथ ही ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य की पदवी का विवाद फिर से सामने आ गया है. बता दें कि शंकराचार्य की पदवी का इतिहास सीधे आठवीं सदी के संत आदि शंकराचार्य से जाकर जुड़ता है. उन्होंने देशभर में तीर्थ यात्रा और भ्रमण के जरिए सनातन के अद्वैत सिद्धांत का प्रचार किया. इसके साथ ही उन्होंने देश की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की और उनके पीठाधीश्वर मठाधीश बनाए, जो अद्वैत सिद्धांत को आगे बढ़ा सकें.
इन्हीं चारों पीठों के पीठाधीश्वर मठाधीश (मठ के प्रमुख और मुखिया) को शंकराचार्य की पदवी दी जाती है. यहीं से एक शंकराचार्य के बाद चार शंकराचार्य सामने आए. पहले शंकराचार्य जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ही हैं. वैदिक सिद्धांत है "एकोहं बहुस्याम" यानी 'ब्रह्म एक है और बहुत होना चाहता है'. इसी सिद्धांत के आधार पर एक शंकराचार्य से चार शंकराचार्यों की परंपरा सामने आई.
आदिगुरु शंकराचार्य ने ही इसकी शुरुआत की थी. उन्होंने जिन चार मठों की स्थापना की थी, उन पर शंकराचार्यों की नियुक्ति और चयन आदि शंकराचार्य के ही लिखे ग्रंथ 'मठाम्नाय महानुशासन संविधान ग्रंथ' के अनुसार होता है.
कौन-कौन से हैं चार मठ?
ज्योतिर्मठः उत्तराम्नाय मठ या उत्तर मठ, ज्योतिर्मठ जो कि जोशीमठ में स्थित है. यह बदरिकाश्रम के पास मौजूद है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसी पीठ पर खुद को शंकराचार्य के पद पर होने की घोषणा की हुई है, जिसे लेकर विवाद है.
गोवर्धन मठः इसी तरह पूर्व दिशा में पूर्वाम्नाय मठ या पूर्वी मठ है, जिसे गोवर्धन मठ कहा जाता है. यह ओडिशा के पुरी में स्थापित है. जिसके वर्तमान शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती हैं.
शृंगेरी मठ, शारदा पीठः दक्षिण दिशा में स्थापित मठ को दक्षिणाम्नाय मठ या दक्षिणी मठ कहा जाता है. इसे शृंगेरी मठ और शारदा पीठ भी कहते हैं जो कि शृंगेरी, कर्नाटक में स्थित है. जिसके वर्तमान शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ हैं.
द्वारिका मठः पश्चिम दिशा में आदि शंकराचार्य ने पश्चिमाम्नाय मठ या पश्चिमी मठ की स्थपना की थी. यह द्वारिका पीठ भी कहलाता है जो कि द्वारिका में स्थित है. ज्योतिर्मठ के पूर्व शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती इसके भी शंकराचार्य थे. साल 2022 में उनके निधन के बाद से स्वामी सदानंद यहां के शंकराचार्य हैं.
देश में यही प्रमुख चार मठ हैं और इन मठों के ही मुखिया सिर्फ आधिकारिक तौर पर शंकराचार्य हैं. हालांकि देश में इन चार मठों के अलावा भी कई अन्य जगह शंकराचार्य पद लगाने वाले मठ मिलते हैं जो वैदिक परम्परा के अनुसार नहीं हैं, बल्कि खुद ही बना लिए गए हैं. उन्हें लेकर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उनकी मान्यता और विश्वसनीयता भी नहीं है. क्योंकि इन चारों के अलावा अन्य मठ और उनके पीठाधीश्वर 'महानुशासन' में नहीं आते हैं.
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