राजस्थान के अलवर जिले में गड़ियां लोहार समाज की एक अनोखी और भव्य शव यात्रा निकाली गई. समाज के 90 वर्षीय बुजुर्ग जागा के निधन के बाद उन्हें पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई. आमतौर पर जहां शव यात्राएं शोक और सन्नाटे के बीच निकलती हैं, वहीं इस समाज की परंपरा बिल्कुल अलग नजर आई. बुजुर्ग की शव यात्रा दूल्हे की तरह सजाकर निकाली गई, जिसने हर किसी का ध्यान खींचा.
दरअसल, शव को काला चश्मा और साफा पहनाया गया. फिर पालकी में बैठाया गया. यह दृश्य देखने वाले लोग हैरान रह गए और इसे समाज की अनोखी परंपरा के रूप में देखते रहे.
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हाथी, घोड़े और ऊंट बने आकर्षण
यह शव यात्रा सूर्य नगर डी-ब्लॉक से शुरू होकर एन.ई.बी श्मशान घाट तक पहुंची. यात्रा की सबसे खास बात यह रही कि सबसे आगे जयपुर से विशेष रूप से मंगवाया गया सजा-धजा हाथी चल रहा था. हाथी के पीछे घोड़े, ऊंट, डीजे और बैंडबाजे के साथ समाज के सैकड़ों लोग शामिल थे.
डीजे और पारंपरिक बाजों की धुन पर समाज के युवक नाचते-गाते नजर आए. पूरे रास्ते माहौल अलग ही रंग में डूबा रहा. कई स्थानों पर लोगों ने पुष्प वर्षा कर बुजुर्ग को अंतिम प्रणाम किया.
आपसी सहयोग से हुआ आयोजन
परिजनों और समाज के लोगों के अनुसार, इस पूरे आयोजन पर लाखों रुपये का खर्च आया. यह राशि गड़ियां लोहार समाज के लोगों ने आपसी सहयोग से इकट्ठा की. समाज में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है कि किसी भी सदस्य के निधन पर पूरा समाज साथ खड़ा होता है.
मृतक के पोते रोहित ने बताया कि उनके दादा जागा समाज में बेहद सम्मानित थे. उन्होंने कहा कि हमारे समाज में बुजुर्ग के निधन पर अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और एकता के साथ किया जाता है.
अंतिम संस्कार में दिखी भावुकता
शव यात्रा के दौरान समाज के स्वयंसेवकों ने व्यवस्थाएं संभालीं, जिससे यात्रा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सकी. एन.ई.बी श्मशान घाट पहुंचने के बाद विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया गया. इस दौरान माहौल भावुक हो गया.
गड़ियां लोहार समाज की यह शव यात्रा केवल एक व्यक्ति की अंतिम विदाई नहीं थी, बल्कि समाज की संस्कृति, परंपरा और सामूहिक सहयोग की मजबूत मिसाल भी बनी. पूरे इलाके में दिनभर इस अनोखी शव यात्रा की चर्चा होती रही और लोगों ने इसे एक अनूठी सामाजिक परंपरा के रूप में देखा.
हिमांशु शर्मा