मुस्लिम वोटरों की वफादारी को लेकर इसलिए कन्फ्यूज हैं अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव ने एक साथ सॉफ्ट हिंदुत्व और मुस्लिम समर्थक बनने की कोशिश की पर अब वो कन्फ्यूज दिख रहे हैं. जिस तरह उन्होंने इधर बयान दिए हैं उससे लगता है कि वो एक बार फिर अपने पिता मुलायम सिंह यादव की खड़ाऊं पहनने की कोशिश कर रहे हैं.

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अखिलेश यादव पहुंचे मुख्तार अंसारी के घर अखिलेश यादव पहुंचे मुख्तार अंसारी के घर

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 09 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 11:50 AM IST

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सबसे विश्वसनीय वोटर यादव और मुसलमान ही रहे हैं. इन्हीं दोनों समुदायों के बल पर आज तक समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश के चुनावों में कई बार परचम लहराया है. लोकसभा चुनाव 2024 में भी समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अगर सबसे अधिक भऱोसा होना चाहिए तो इन्ही 2 समुदाय के वोटों पर. पर अखिलेश ने इस बार सबसे अधिक फोकस पिछड़े वोटों को लेकर रखा है. अभी तक हुए सीट बंटवारे में भी पिछड़ी जातियों का प्रतिशत सबसे अधिक रहा. लोकसभा कैंडीडेट की लिस्ट देखकर यादव और मुस्लिम के लिए कोई बहुत उत्साहजनक स्थिति नहीं थी. कई बार ऐसा लगा कि अखिलेश कहीं जानबूझकर तो ऐसा नहीं कर रहे. लेकिन अचानक अखिलेश में एक बार फिर परिवर्तन देखने को मिला है. वो अल्पसंख्यक वोटों के लिए इस तरह की बयानबाजी पर आ गए कि हिंदू वोटों की परवाह भी छोड़ दी. आखिर ऐसा क्यों है कि पार्टी के कोर वोटर्स विशेषकर मुसलमानों को लेकर वो इस तरह कन्फ्यूज दिखते हैं, जितना कि उनको नहीं होना चाहिए था. आइए देखते हैं कि अखिलेश की क्या मजबूरी है?

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1-मुस्लिम वोटर्स को लेकर पहले कैजुअल अप्रोच दिखाया

लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी शुरू से ही हार्डकोर मुस्लिम समर्थक छवि बनाए रखती थी.अखिलेश यादव के पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने तो कार सेवकों पर गोली ही नहीं चलवाया बल्कि वह बयान भी ऐसे देते थे कि बीजेपी समर्थक उन्हें मुल्ला मुलायम कहते थे. अखिलेश यादव ने अपनी राजनीति अपने पिता से अलग तरह की करनी चाही और कई तरह के परिवर्तन किए. सबसे पहले तो अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी से गुंडा माफिया टाइप के लोगों को बाहर करने का रास्ता अपनाया.  यादवों की पार्टी ठप्पा हटाने की कोशिश में उन्होंने पहली बार किसी दूसरी जाति के नेता को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया.

इसके साथ ही अखिलेश के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने विकास की राजनीति शुरू की . इसी क्रम में अखिलेश ने सॉफ्ट हिंदुत्व वाली छवि भी बनाने की कोशिश की. यही कारण रहा कि अखिलेश की पहुंच सवर्ण युवाओं में भी जबरदस्त तरीके से हुई. पर अनुभव की कमी के चलते रामलला मंदिर के उद्घाटन पर उन्होंने अरविंद केजरीवाल जैसा स्टैंड नहीं ले सके. वो कभी जाएंगे , कभी नहीं जाएंगे के बीच झूलते रहे. इसके बाद टिकट बंटवारे में भी उन्होंने मुस्लिम कैडिडेट की जमकर उपेक्षा की. पश्चिम यूपी की कई मुस्लिम बहुल सीटों जिसमें मेरठ भी शामिल है उन्होंने गैर मुस्लिम उम्मीदवारों को वरीयता दी.इसके बाद ऐसा लगने लगा कि अखिलेश मुस्लिम वोट्स को लेकर बहुत कैजुवल अप्रोच रख रहे हैं. कहा जाने लगा कि बीजेपी से मुकबले के चलते वो मुस्लिम उम्मीदवारों से निश्चित दूरी बना रहे हैं. ताकि उन पर मुस्लिमपरस्त होने का ठप्पा न लग जाए. 

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2-मुख्तार परिवार के साथ खड़े नजर आए

पर यह ज्यादा नहीं हो सका कि वो मुस्लिम वोटों के साथ कैजुवल अप्रोच रख सकें. 2014, 2017, 2019 और 2022 की हार ने उन्हें अपने पिता के पदचिह्नों पर चलने को मजबूर कर दिया. हाल ही में पूर्वांचल के माफिया नेता मुख्तार अंसारी की जेल में हुई मृत्यु पर जिस तरह समाजवादी पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल ने मुख्तार को श्रद्धांजलि ही नहीं दी बल्कि महिमामंडन भी किया वह अपने आप में आश्चर्यजनक था. अखिलेश ने ट्वीट करके कहा कि मुख्तार अंसारी की मौत के लिए यूपी सरकार जिम्मेदार है. मृत्यु के बाद वो मुख्तार के घर भी पहुंचे . मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी को पार्टी ने गाजीपुर से लोकसभा का टिकट भी दिया हुआ है.

3-कांग्रेस के साथ होने के बावजूद नहीं हैं कॉन्फिडेंट

ऊपर की बातें सुनकर समझकर ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं कोई बात ऐसी है जो अखिलेश यादव हिंदू मुस्लिम में भटक रहे हैं. क्योंकि इस बार परिस्थितियां उनके साथ हैं. कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने के चलते मुस्लिम वोट के छिटकने या बंटने का खतरा बिल्कुल भी नहीं दिखाई दे रहा है. दूसरे यह भी है कि कुछ सीटों जैसे सहारनपुर, अमरोहा, कन्नौज को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर मुस्लिम बहुल सीटों पर बीएसपी ने मुस्लिम कैंडिडेट नहीं खड़े किए हैं.  इस कारण अखिलेश और कांग्रेस दोनों के लिए चिंतित होने की कोई बात नहीं थी.हर हाल में मुस्लिम वोट अखिलेश यादव के कैंडिडेट को ही जाने वाला है.  अखिलेश जिस तरह सॉफ्ट हिंदुत्व को गले लगाकर चल रहे थे उनके लिए लोकसभा चुनावों में कई जगह से बढत दिलाने वाला था. पर अब जब वो मुख्तार फैमिली और पाकिस्तान में मारे गए आतंकियों के साथ दिखने लगे हैं तो जाहिर है कि बीजेपी उन्हें मुस्लिम परस्त घोषित करके माइलेज लेने का प्रयास करेगी.

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4-क्या बसपा के मजबूत कैंडिडेट्स से बढ़ी चिंता की लकीरें

दरअसल अखिलेश यादव की चिंता का कारण बीजेपी नहीं है . यूपी में बीएसपी ने सपा और बीजेपी दोनों की नींदे उड़ा रखी हैं. बीजेपी को यकीन था कि मुस्लिम बहुल सीटों पर बीएसपी मुस्लिम कैंडिडेट खड़ी करेगी . पर सहारनपुर, अमरोहा और कन्नौज को छोड़कर बीएसपी ने कहीं से भी मुस्लिम कैंडिडेट को नहीं खड़ा किया. यही हाल समाजवादी पार्टी का भी रहा. बीएसपी ने कई जगह तो ऐसे प्रत्याशी खड़े कर दिए जो बीजेपा का ही वोट काट रहे है. पर समाजवादी पार्टी के लिए भी बीएसपी ने मुश्किल खड़ा कर दिया है. समाजवादी पार्टी को लगता है कि बीएसपी ने बीजेपी को हराने वाले कैंडिडेट खड़े कर मुस्लिम समुदाय को यह संदेश दे दिया है कि हम बीजेपी की बी टीम नहीं हैं. जैसा कि समाजवादी पार्टी लगातार प्रचारित कर रही थी. अब समाजवादी पार्टी को ऐसा लग रहा है कि जहां बीएसपी के कैंडिडेट मजबूत होंगे वहां मुस्लिम वोटर्स उसके साथ हो सकते हैं. यही कारण है कि अखिलेश एक बार फिर अपने पिता की खड़ाऊं पहनने की कोशिश कर रहे हैं. 

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