मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य शहडोल में 'दगना' कुप्रथा इस आधुनिक जमाने में भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. जन्म के समय से कुपोषित बच्चों को अंधविश्वास के चलते आदिवासियों में गर्म लोहे से दागने की प्रथा है. बच्चों को दागने की यह प्रथा इतनी दर्दनाक होती है कि कई बार बच्चे अपनी जान गंवा देते हैं.
ताजा मामला सोहागपुर जनपद के हरदी गांव का है. यहां के प्रदीप बैगा के डेढ़ माह के बेटे प्रेमलाल को पेट फूलने और सांस लेने में तकलीफ हो रही थी. पिता ने गांव के ही एक व्यक्ति से मासूम के शरीर को गर्म लोहे से दगवाया. जब प्रेम लाल की हालत बिगड़ने लगी तो परिजन उसे मेडिकल कॉलेज ले आए, जहां मासूम की हालत नाजुक बनी हुई है.
दरअसल, आदिवासी समुदाय में गर्भवती महिलाओं की सही देखभाल न होने के चलते कई बार कुपोषित बच्चे पैदा होते हैं. जिनका जन्म के समय से ही बहुत कम वजन रहता है. खाल हड्डियों से चिपकी रहती है.
ऐसे बच्चों के इलाज के लिए जिला मुख्यालय पर कुपोषण पुनर्वास केंद्र बनाए गए हैं. लेकिन आदिवासी समुदाय में ऐसे बच्चों को अंधविश्वास के चलते दागने की प्रथा है. इलाज के नाम पर मासूमों को गर्म सलाखों से शरीर में कई जगह दाग दिया जाता है. इनका मानना है कि ऐसा करने से बच्चा ठीक हो जाएगा. लेकिन यह दर्दनाक इलाज बच्चों की जान के लिए खतरा बन जाता है.
मध्यप्रदेश के आदिवासी जिलों में इस अंधविश्वास के चलते कई मासूम अपनी जान गंवा चुके हैं. इसी साल फरवरी माह में भी शहडोल में दो बच्चों की इलाज के दौरान मौत हो गई थी. प्रशासन के लाख प्रयासों और जागरूकता अभियानों के बावजूद आदिवासियों में यह प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही है.
रावेंद्र शुक्ला