कथावाचक देवी चित्रलेखा ने बहुत ही कम उम्र में ख्याति हासिल कर ली है. सोशल मीडिया पर आपने इनकी रील्स जरूर देखे होंगे. दुनियाभर में इनके फॉलोअर्स हैं. इनका सफरनामा भी बड़ा दिलचस्प रहा है. कहते हैं कि देवी चित्रलेखा जब केवल 4 साल की थीं, तब इनके पिता तुकाराम शर्मा ने इन्हें शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए गिरधारी बापू के आश्रम भेज दिया था. चित्रलेखा 6 साल की उम्र में जब बृज के प्रतिष्ठित संत रमेश बाबा के कार्यक्रम में हिस्सा ले रही थीं, तब उन्होंने अचानक देवी चित्रलेखा को माइक सौंप दिया. धीरे-धीरे चित्रलेखा मशहूर कथावाचकों में शुमार हो गई. 'साहित्य आज तक 2024' के मंच पर देवी चित्रलेखा ने अपने बारे में बहुत से सवालों के जवाब दिए.
देवी चित्रलेखा 26 साल की छोटी सी उम्र में एक बड़ी कथावाचक बन चुकी हैं. कुछ लोगों को इनके कथा पढ़ने का तरीका पसंद है तो कुछ सोशल मीडिया पर इनके रील्स और एक्टिविटी को इनकी कामयाबी का आधार मानते हैं.
इस बारे देवी चित्रलेखा कहती हैं, 'इंस्टाग्राम रील्स या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपकी एक्टिविटी को देखकर सफलता का अंदाजा लगाते हैं, जो कि ठीक नहीं है. कामयाबी को मापने का यह पैमाना गलत है. आज तक तो लोग व्यूज या फॉलोवर्स बढ़ाने के लिए कुछ भी कर रहे हैं. मेरा मानना है अगर आप अपने काम से खुश और संतुष्ट हैं तो आप इस दुनिया के सबसे सफल व्यक्ति हैं.'
कथावाचक को न समझें साधु
देवी चित्रलेखा कहती हैं कि एक साधु-संत और कथावाचक में फर्क समझना जरूरी है. हम कथावचक परिवार में रहते हैं. गृहस्थ लोग हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि शास्त्रों और पौराणिक कथाओं के बारे में बताने वाले ऋषिमुनि भी खुद गृहस्थ ही थे. कथावाचकों से लोग अपेक्षा करते हैं कि वो साधु-संतों जैसा व्यवहार करें. ऐसा सोचना गलता है. कथावाचक केवल एक पोस्टमैन की तरह है, जो शास्त्रों में कही बातों को साधारण भाषा में लोगों तक पहुंचाता है.
यह नया दौर है और समय के साथ हो रहे बदलावों को हमें स्वीकार करना पड़ता है. पहले के समय कथा सुनाने वाले और सुनने वाले दोनों ही बूढ़े-बुजुर्ग हुआ करते थे. लेकिन आज युवाओं में भी कथा सुनने का क्रेज बढ़ रहा है. और यह सब सोशल मीडिया के माध्यम से सफल हो पाया है.
कथावाचक में लग्जरी चीजों का शौक कितना सही?
हाल ही में जया किशोरी के लग्जरी बैग को लेकर सोशल मीडिया पर खूब बवाल हुआ था. यूजर का कहना था कि एक कथावाचक को इतने महंगे लग्जरी बैग की आखिर क्या जरूरत है. कथावचकों के ऐसे ही बदलते लाइफस्टाइल और लुक को लेकर चित्रलेखा ने कहा, 'मैं इस पर कोई निजी टिप्पणी नहीं कर सकती. लेकिन हम किसी के भौतिक सुख पर पाबंदी नहीं लगाते हैं. हम सिर्फ यह कहते हैं कि ऐसी चीजों में डूबिए मत.'
उन्होंने आगे कहा, 'आज मेरे हाथ में एप्पल की वॉच है. कल जब ये नहीं होगी, तब भी मेरे चेहरे पर ऐसी ही हंसी रहेगी. आज मेरे पास सफलता और इतने सारे लोगों का साथ है. कल जब ये नहीं रहेंगे, मैं तब भी इतनी ही खुश रहूंगी. हम लोगों को सांसारिक सुख का त्याग करने के लिए नहीं कहते हैं. हम सिर्फ इतना कहते हैं कि आपके जीवन का उद्देश्य भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं है. बल्कि इससे कहीं ज्यादा बढ़कर है.'
'मैं खुद कोई संत नहीं हूं. लेकिन मैं हमेशा कहती हूं कि इस दुनिया की सारी लग्जरी चीजों का कोई सच्चा हकदार है तो वह एक साधु है, क्योंकि समाज के प्रति उसका समर्पण बहुत अधिक है. लोग कह सकते हैं कि एक साधु फ्लाइट में क्यों बैठा है. लेकिन मैं कहती हूं कि उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल जाएं, क्योंकि उसने अपना जीवन संसार के नाम किया है. वह हजारों-लाखों लोगों के जीवन को बदल रहा है.'
गुटखा-तंबाकू-शराब प्रमोट करने वालों को सम्मान क्यों?
देवी चित्रलेखा ने एक बड़ी तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, 'टेलीविजन पर एक आदमी जो गुटखा, तंबाकू, शराब जैसी चीजों को प्रमोट कर रहा है. आप उसे खूब सम्मान दे रहे हो. उसके लिए भौतिक सुखों की कामना कर रहे हो. बात रही कथावचक और लग्जरी आइटम्स की तो इतना समझ लीजिए कि भगवान ने हमें दिया है तो खुलकर मौज में रहते हैं.'
'कुछ लोग कहते हैं कि आजकल कम उम्र के लोगों ने कथावाचन का बिजनेस शुरू कर दिया है. ऐसे लोग 'बाबा' शब्द का बहुत इस्तेमाल करते हैं, जो बहुत गंदा लगता है. मैं ऐसे लोगों से कहना चाहती हूं कि आप एक बार बाबा बनकर देख लो. आपको समझ आ जाएगा बाबा बनने और बाबा होने में कितनी मेहनत लगती है. बाबा कपड़ों से नहीं, बल्कि अपने स्वभाव और विचारों से बना जाता है.'
aajtak.in