तलाक के मामले में बच्चे के पितृत्व को साबित करने के लिए DNA टेस्ट कराना उचित है या नहीं? इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि तलाक के मामलो में DNA टेस्ट के आदेश रूटीन मैनर में नहीं दिए जाने चाहिए. इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि सिर्फ व्यभिचार के संदेह के आधारों पर ही DNA टेस्ट की इजाजत देना उचित नहीं है.
मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस राम सुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली बेंच ने अपने फैसले में कहा कि अदालतें पारिवारिक मामलो में सिर्फ व्यभिचार के संदेह पर DNA टेस्ट का आदेश न दें, बल्कि तथ्यों को जांचने के बाद ही इसकी इजाजत दी जानी चाहिए.
इससे पहले भी DNA टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट अक्टूबर 2021 में बड़ा फैसला सुना चुका है. कोर्ट ने तब भी कहा था कि नियमित रूप से लोगों के DNA टेस्ट का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए. कोर्ट की नजरों में DNA टेस्ट कराना निजता के अधिकार के खिलाफ माना जा सकता है. ये भी कहा गया था कि DNA टेस्ट के लिए मजबूर करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा था कि सिर्फ उन मामलों में ही ऐसा करना चाहिए, जहां इस तरह के टेस्ट की अत्यधिक आवश्यकता हो.
तब जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस हृषिकेश रॉय की बेंच ने कहा था कि अदालतों के विवेक का इस्तेमाल पक्षों के हितों को संतुलित करने के बाद किया जाना चाहिए और ये तय किया जाना चाहिए कि मामले में न्याय करने के लिए DNA टेस्ट की आवश्यकता है या नहीं. पीठ ने कहा था कि ऐसी परिस्थितियों में जहां रिश्ते को साबित करने या विवाद करने के लिए अन्य सबूत उपलब्ध हैं तो अदालत को आमतौर पर DNA टेस्ट का आदेश देने से बचना चाहिए.
संजय शर्मा