बॉम्बे हाईकोर्ट ने इंडियन एयरपोर्ट ऑथोरिटी को अपने एक कर्मचारी को मैटरनिटी लीव देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि मां बनना एक प्राकृतिक घटना है और एक एम्प्लोयर को एक महिला कर्मचारी के प्रति विचारशील और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए. इसी के साथ न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर और न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की पीठ ने AAI के पश्चिमी क्षेत्र मुख्यालय द्वारा जारी 2014 के उस निर्देश को खारिज कर दिया, जिसमें एक महिला कर्मी को तीसरे बच्चे के जन्म के लिए मैटरनिटी लीव नहीं देने की बात कही गई थी.
इंडियन एयरपोर्ट ऑथोरिटी वर्कर्स यूनियन और संबंधित कर्मचारी कनकावली राजा अरमुगम उर्फ कनकावली श्याम संदल की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह फैसला सुनाया. दरअसल, याचिका में 2015 में एएआई द्वारा जारी दो निर्देशों को चुनौती दी गई थी, जिसमें मैटरनिटी लीव लाभ के लिए कनकावली के आवेदन को खारिज कर दिया गया था क्योंकि उनके पहले से ही दो बच्चे थे.
कनकावली की शादी AAI के ही कर्मचारी राजा अर्मुगम से हुई थी. उनकी मृत्यु के बाद, उन्हें अनुकंपा के आधार पर एएआई द्वारा नियुक्त किया गया था. कनकावली ने अपनी याचिका में कहा कि उनकी पिछली शादी से उनका एक बच्चा है. उनके पहले पति की मृत्यु के बाद उन्होंने दूसरी शादी की. दूसरी शादी से उन्होंने दो बच्चों को जन्म दिया.
कनकावली ने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने अपनी पहली शादी से पहले बच्चे के जन्म के दौरान मैटरनिटी लीव का लाभ नहीं उठाया था. उन्होंने तीसरे बच्चे के लिए मैटरनिटी लीव की मांग की थी, जिसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उनके पहले से ही दो बच्चे हैं और इसलिए, वह इसके लिए पात्र नहीं है.
हालाँकि, पीठ ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 42 में प्रावधान है कि राज्य काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियों को सुरक्षित करने और मातृत्व राहत के लिए प्रावधान करेगा. इसमें कहा गया है कि अनुच्छेद 42 "काम की उचित और मानवीय स्थितियों" और "मातृत्व राहत" की बात करता है.
याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा, "प्रजनन और बच्चे के पालन-पोषण के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति की निजता, गरिमा और शारीरिक अखंडता के अधिकार के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मान्यता दी गई है. अनुच्छेद 42 राज्य को काम की उचित और मानवीय परिस्थितियों को सुरक्षित करने और मातृत्व राहत के लिए प्रावधान करने का आदेश देता है. मां बनना एक महिला के जीवन की सबसे स्वाभाविक घटना है. नौकरी करने वाली महिला के लिए बच्चे के जन्म को सुविधाजनक बनाने के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, नियोक्ता को उसके प्रति विचारशील और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए और शारीरिक कठिनाइयों का एहसास करना चाहिए, जिसका सामना एक कामकाजी महिला को गर्भ में बच्चे को पालते समय या जन्म के बाद बच्चे का पालन-पोषण करते समय कार्यस्थल पर अपने कर्तव्यों का पालन करते समय करना होगा.''
पीठ ने कहा कि एएआई के अपने मैटरनिटी लीव नियमों के अनुसार, एक महिला कर्मचारी अपनी सेवा अवधि में दो बार इसका लाभ उठा सकती है.
पीठ ने तर्क दिया, "इस विनियमन का उद्देश्य मैटरनिटी लीव का लाभ देना है, न कि जनसंख्या पर अंकुश लगाना. दो जीवित बच्चों की शर्त इस प्रकार है कि एक महिला कर्मचारी को अधिकतम दो बार ही लाभ मिल सकता है. चूंकि याचिकाकर्ता ने अपने पहले बच्चे के जन्म के समय मैटरनिटी लीव का लाभ नहीं उठाया था, इसलिए जब उसका तीसरा बच्चा हुआ तो वह इस लाभ के लिए पात्र थी. नियमों की उदारतापूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए. न्यायालय की भूमिका समाज में कानून के उद्देश्य को समझना और कानून को उसके उद्देश्य को हासिल करने में मदद करना है. जब सामाजिक वास्तविकता बदलती है, तो कानून को भी बदलना होगा."
विद्या