उत्तराखंड के चमोली में रैणी के नजदीक ऋषिगंगा और धौलीगंगा में जब सैलाब आया, तो लोगों को तिनके की तरह बहाकर ले गया. पानी का जो भयानक बहाव लोगों ने 2013 में देखा था वैसा ही खौफनाक मंजर सामने आया और पहाड़, पत्थर, पेड़ और पावर प्लांट को बहा कर ले गया. इस दरमियान इस विकराल बहाव के सामने जो भी आए काल के गाल में समा गए.
सोमवार को आजतक जब धौलीगंगा में विनाश का जायजा लेने पहुंचा तो तबाही के निशान रोंगटे खड़े कर देने वाले थे.
ऋषिगंगा से नीचे आई पानी की तेज धार सीधे बैराज से टकराई, यहां एक तरफ एनटीपीसी की दीवार है दूसरी तरफ एनटीपीसी की दो सुरंग हैं. जिस वक्त सैलाब आया, बैराज के तीन गेट बंद थे. सिर्फ एक खुला था, जिससे सैलाब कुछ देर तक एक ही गेट से आगे बढ़ता रहा, और थोड़ी देर बाद दूसरी तरफ मुड़ गया. इस दौरान काफी मलबा सुरंग में भी घुस गया.
तपोवन प्रोजेक्ट में नहीं था सायरन
बता दें कि ऐसे हादसों की सूचना देने के लिए बड़े-बड़े पावर प्रोजेक्ट में सायरन लगे होते हैं, लेकिन अब तक की रिपोर्ट के मुताबिक तपोवन के NTPC प्रोजेक्ट में कोई सायरन नहीं लगा था. इससे इस आपदा की जानकारी बैराज से नीचे बसे लोगों को नहीं मिली. अगर NTPC का सायरन बजता तो निचले इलाकों के लोग सुरक्षित स्थान पर भागने में कामयाब हो सकते थे.
रविवार को न होता काम तो कम होती मौतें
अब इलाके के लोग एनटीपीसी प्रबंधन पर सवाल उठा रहे हैं. प्रबंधन को कोसते हुए ये कह रहे हैं कि रविवार के दिन भी क्यों काम करवाया जा रहा था? रविवार के दिन छुट्टी होती है, अगर इस दिन काम नहीं होता तो शायद इतना भयंकर हादसा शायद ना होता.
हादसे में लापता एक व्यक्ति के रिश्तेदार ने कहा कि एनटीपीसी ने संडे को काम क्यों करवाया.
ग्लेशियर से आई बाढ़ ने जिस तरह से कहर बरपाया है उसे देखकर टनल में फंसे लोगों के परिजन तो कह रहे हैं कि उन्हें उम्मीद ही नहीं है कि इस भीषण प्रवाह में कोई बच पाएगा.
हालांकि बचाव कार्य बेहद तेजी से चल रहा है. खुद केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने तबाही की साइट का दौरा किया है. सोमवार देर शाम को सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत घटनास्थल पर ही मौजद थे.
बता दें कि रैणी गांव के लोग पिछले 16 सालों से इन पावर प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे थे. इस प्रोजेक्ट का काम 2005 में शुरु हो गया था.
मीनाक्षी कंडवाल