राज्यों में केंद्र की दखलअंदाजी को लेकर नया नहीं है टकराव, पढ़ें 'शह और मात' का इत‍िहास

केंद्र सरकार ने दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर अध्यादेश जारी कर दिया है. इस अध्यादेश के अतंर्गत ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामलों में LG यानी केंद्र सरकार ही बॉस बनी रहेगी. लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब केंद्र और राज्य सरकार के बीच अधिकारों को लेकर टकराव हुआ है. इससे पहले भी कई बार ऐसा वाकया देखने को मिल चुका है. पढ़ें केंद्र और राज्य सरकार के संबंधों के बीच का दिलचस्प इतिहास.

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दिल्ली सरकार के अधिकारों पर केंद्र ने जारी किया अध्यादेश दिल्ली सरकार के अधिकारों पर केंद्र ने जारी किया अध्यादेश

प्रियरंजन कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 20 मई 2023,
  • अपडेटेड 11:59 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ‘प्रशासन पर नियंत्रण’ को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच चल रहे मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कई साल से चले आ रहे इस मामले में आम आदमी पार्टी को बड़ी जीत मिली. मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के पांच साल पुराने फैसले को पलटते हुए दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया और उसे नौकरशाही पर नियंत्रण का हक दिया. लेकिन शुक्रवार को केंद्र सरकार ने दिल्ली सरकार के अधिकारों पर अध्यादेश जारी कर दिया. इस तरह से एक बार फिर केंद्र सरकार अपने दबदबे को कायम रखने में कामयाब रही.

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लेकिन यह पहली बार नहीं है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की शक्तियों को लेकर टकराव सामने आया है. अक्सर ही कभी पैसे के बंटवारे तो कभी जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव देखने को मिलते रहे हैं.

एलजी वीके सक्सेना (बाएं) और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (दाएं) (फोटो: पीटीआई)

केंद्र और राज्य सरकार के इन्हीं झगड़ों को देखते हुए संबंध सुधारने के लिए देश में अब तक तीन बार आयोग (केंद्र द्वारा) और तीन बार समितियों (राज्यों द्वारा) का गठन भी किया जा चुका है. जिसमें केंद्र सरकार ने तीन बार आयोग का गठन कर उनसे सुझाव मांगे. वहीं तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों ने टकराव की स्थिति में अपनी तरफ से एक-एक बार समिति बनाकर केंद्र सरकार से अपनी मांगों रखते हुए सुझाव देने की कोशिश की. लेकिन संबंधों में सुधार की जगह शह-मात का खेल जारी रहा.

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आजादी के समय सहज थे केंद्र-राज्य के रिश्ते

हालांकि, आजादी के बाद 1967 तक ऐसे मतभेद देखने को नहीं मिलते थे. केंद्र और राज्यों के बीच संबंध काफी सहज थे. इसकी अहम वजह थी कि 1967 तक केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के साथ-साथ ज्यादातर राज्यों में भी उसी की सत्ता हुआ करती थी.

60 की दशक में शुरू हुई रार

1967 के आम चुनावों कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी थी और इसी दौरान कई अन्य क्षेत्रिय पार्टियां भी उभरकर सामने आईं. कई राज्यों में उनका दबदबा भी देखने को मिला. इतना ही नहीं, कांग्रेस को कड़ी टक्कर देते हुए इन क्षेत्रीय दलों ने गठबंधन की सरकारें भी बनाई. यहीं से केंद्र और राज्यों के बीच खटास आनी शुरू हो गई. इसके बाद ही केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों को लेकर खींचतान की भी शुरुआत हुई.

1966 में पहली बार मतभेदों की जांच के लिए आयोग का गठन

60 के दशक में नई पार्टियों के आने से केंद्र और राज्य के बीच मन-मुटाव सामने आने शुरू हो गए थे. इसलिए केंद्र सरकार ने 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में 6 सदस्यीय ‘प्रशासनिक सुधार आयोग’ का गठन किया. यह पहली बार था जब केंद्र सरकार ने राज्यों के हो रहे मतभेदों की गहराई से जांच करने के लिए ऐसा कदम उठाया. आयोग ने 3 सालों के बाद 1969 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में केंद्र और राज्य सरकार के संबंध को बेहतर करने के लिए 22 सिफारिशें की गई थी. आयोग ने इंटर-स्टेट काउंसिल की स्थापना, राज्यपाल की नियुक्ति, राज्यों को अधिक शक्ति देने और केंद्रीय सुरक्षाबल के प्रयोग जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सिफारिशें की थी. लेकिन केंद्र सरकार ने किसी भी सिफारिश को लागू नहीं किया.

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मोरारजी देसाई (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

तमिलनाडु ‘समिति’ का गठन करने वाला पहला राज्य

तमिलनाडु पहला ऐसा राज्य है, जिसने केंद्र-राज्य के संबंध को लेकर किसी समिति का गठन किया. जब केंद्र सरकार ने ‘प्रशासनिक सुधार आयोग’ की सिफारिशों को नहीं लागू किया गया तो तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने 1969 में डॉ. पीवी राजमन्नार की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. इस समिति से इस मामले में संविधान में बदलाव को लेकर सुझाव मांगे गए थे.

राजमन्नार समिति ने तमिलनाडु सरकार को 1971 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि किन कारणों से केंद्र सरकार का राज्य सरकारों में जरूरत से ज्यादा दखलअंदाजी है. साथ ही इन्हें बदलने के लिए कई अहम सिफारिशें भी कीं.  

एम करुणानिधि संग इंदिरा गांधी (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

राजमन्नार समिति ने की थी महत्वपूर्ण सिफारिशें

इन सिफारिशों में इंटर-स्टेट काउंसिल की स्थापना, जिसे केंद्र सरकार की ‘प्रशासनिक सुधार आयोग’ भी शामिल था. इस सुझाव के पीछे तर्क था कि ऐसा कोई भी फैसला, जिससे राज्य सरकार के हित प्रभावित हो सकते हैं, केंद्र सरकार को काउंसिल के सुझाव के बिना नहीं लिया जाना चाहिए. वहीं, अनुच्छेद 356 का उपयोग केवल राज्य में कानून और व्यवस्था के पूर्ण रूप से भंग होने की स्थिति में ही किया जाना चाहिए. बता दें कि अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुमति देता है.

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इस समिति ने वित्त आयोग, नीति आयोग, राज्यपाल को लेकर भी सुझाव दिए और ऑल इंडिया सर्विसेस यानी IAS, IPS और IFS को खत्म करने को कहा. लेकिन जब तमिलनाडु सरकार ने अपनी समिति की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी तो उसने इसकी सभी सिफारिशों को पूरी तरह से नजरअंदाज़ कर दिया.

आनंदपुर साहिब रेज्यूलुशन और ऑपरेशन ब्लू स्टार

केंद्र-राज्य संबंध में दूसरा रेज्यूलुशन पंजाब ने पास किया था. 1967 के चुनाव में सिखों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी अकाली दल कांग्रेस को हराकर सत्ता में आ गई. पार्टी से कई सिख संत और गुरुद्वारा कमेटी के लोग जुड़े हुए थे. पंजाब राज्य को सिख पहचान दिलाने के लिए उनकी राजनीतिक और धार्मिक मांगें थीं, जिसे लेकर इंदिरा गांधी की केंद्र सरकार से उनका टकराव चल रहा था.

 तलवंडी बादल (बाएं) और हरचंद सिंह लोगोंवाल (दाएं) (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)


 
अकाली दल ने इसे लेकर 1973 में एक रेज्यूलुशन पारित किया. इस प्रस्ताव में कहा गया था कि केंद्र का अधिकार क्षेत्र केवल रक्षा, विदेशी मामलों, संचार और मुद्रा तक ही सीमित होना चाहिए और केंद्र में सभी राज्यों का समान अधिकार होना चाहिए. भारत के वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी जीवनी 'एक ज़िंदगी काफी नहीं' में बताते हैं कि इस मुद्दे पर लंबी बहस चली. 1984 आते-आते केंद्र और पंजाब सरकार एक साझा समझौते पर पहुंच गए थे. लेकिन उस वक्त तक सिख कट्टरपंथी जरनैल सिंह भिंडरावाले का प्रभाव अपने चरम पर था और स्वर्ण मंदिर में उसके शरण लेने से राज्य में बहुत तनाव बढ़ गया था. इंदिरा गांधी ने समझौता हो जाने के बावजूद अचानक ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ लॉन्च कर दिया.

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1977 में आया पश्चिम बंगाल मेमोरेंडम

आजादी के समय से चाहे सरकार में हो या न हो, पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा रहा है. 1977 में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल सरकार केंद्र और राज्य सरकार के संबंधों को लेकर एक मेमोरेंडम लेकर आई थी. जिसमें उसने केंद्र सरकार से कई मांगें रखी.

पंजाब की तरह पश्चिम बंगाल ने भी कहा कि केंद्र का अधिकार क्षेत्र केवल रक्षा, विदेशी मामलों, संचार और मुद्रा तक ही सीमित होना चाहिए. इसके अलावा केंद्र अब तक राज्य में तीन बार राष्ट्रपति शासन लग चुका था, इसलिए बंगाल सरकार ने अनुच्छेद 356 और 357 को भी खत्म करने की मांग की. वहीं तमिलनाडु सरकार की तरह ऑल इंडिया सर्विसेस (IAS, IPS, IFS) को भी हटाने को कहा. पश्चिम बंगाल सरकार ने कुछ और मांगें रखी थी लेकिन केंद्र सरकार ने इनमें किसी भी मांग को स्वीकार नहीं किया.

1983 में केंद्र सरकार ने पहली बार बनाया आयोग

राज्य सरकारों के साथ कई मतभेद होने के बावजूद केंद्र की किसी सरकार ने दोनों के रिश्ते को सुधारने के लिए न ही कोई समिति बनाई और न ही कोई पहल की. हालांकि 1966 में केंद्र सरकार ने ‘प्रशासनिक सुधार आयोग’ का गठन किया था, लेकिन उसका उद्देश्य केवल मुद्दों की समीक्षा करना था. अंततः राजीव गांधी की केंद्र सरकार ने पहली बार 1983 में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज आरएस सरकारिया की अध्यक्षता में ‘सरकारिया आयोग’ का गठन किया. आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए एक साल का समय दिया गया था. लेकिन इसे चार बार बढ़ाया गया और चार साल बाद 1987 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी.

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जस्टिस आरएस सरकारिया संग राजीव गांधी (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

आयोग ने केंद्र और राज्य सरकार की संबंधों को सुधारने के लिए अपनी रिपोर्ट में कुल 247 सिफारिशें कीं, जिसमें से सरकार ने 180 सिफारिशों को लागू किया. यह पहली बार था जब केंद्र सरकार ने किसी समिति की रिपोर्ट पर एक्शन लिया था. आयोग ने राष्ट्रपति शासन, इंटर-स्टेट काउंसिल, ऑल इंडिया सर्विसेस, वित्त आयोग, नीति आयोग, केंद्रीय सुरक्षा बल के प्रयोग समेत कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए. लेकिन इंटर-स्टेट काउंसिल की स्थापना की सुझाव को सबसे महत्वपूर्ण सुझाव माना जाता है. केंद्र सरकार ने सुझाव मानते हुए 1990 में इसकी स्थापना की. बता दें कि तमिलनाडु सरकार ने 1971 में पहली बार इसकी मांग उठाई थी.

2007 में UPA की केंद्र सरकार ने बनाया दूसरा आयोग

केंद्र सरकार ने दूसरी बार (हालांकि यह केंद्र द्वारा तीसरा आयोग था लेकिन तकनीकी तौर पर दूसरा ही माना जाता है) 2007 में केंद्र और राज्य संबंधों को लेकर एक आयोग का गठन किया. इसके अध्यक्ष भारत के पूर्व चीफ जस्टिस एम एम पुंछी थे. इस आयोग का मुख्य काम दो दशक पहले ‘सरकारिया आयोग’ द्वारा लागू सिफारिशों को भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था और केंद्र-राज्य सरकार के संबंधों में हुए बदलाव की समीक्षा करना था.

केजरीवाल Vs उपराज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

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अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कई महत्वपूर्ण टिप्पण‍ियां की. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हालांकि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है, लेकिन यहां की सरकार अन्य राज्यों की तरह ही लोगों द्वारा चुनी गई है और उनका प्रतिनिधित्व करती है. यदि प्रशासनिक अधिकारियों को दिल्ली सरकार के मंत्रियों के नियंत्रण से बाहर रखा गया तो उनके द्वारा लाई गईं योजनाओं को लागू करने में बाधा आएगी.

कोर्ट ने आगे कहा कि नौकरशाही पर दिल्ली सरकार का नियंत्रण होगा, लेकिन पब्लिक ऑर्डर, पुलिस और जमीन इससे बाहर रहेंगे. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि दिल्ली सरकार की एग्जिक्यूटिव शक्तियां केंद्र सरकार के मौजूदा कानून के अधीन ही होंगी.

मोटे तौर पर कहें तो किसी राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति और उसकी शक्तियों, राष्ट्रपति शासन, लॉ एंड ऑर्डर के लिए केंद्रीय बल के प्रयोग, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का चुनाव के लिए इस्तेमाल करने, फंड और टैक्स में राज्यों के शेयर को लेकर भेदभाव, राज्य सरकार की प्रोजक्ट्स को पास करने की अनुमति, किसी सीएम के खिलाफ जांच बैठाने, IAS, IPS, IFS जैसे केंद्रीय अधिकारियों का मैनेजमेंट को लेकर अक्सर केंद्र और राज्यों बीच तनाव बना रहता है.

 

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