'मैं चाहता हूं कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद साफ-साफ दिखाई दे...', अप्रैल 1976 के किसी दिन संजय गांधी अपने भरोसेमंद, डीडीए उपाध्यक्ष जगमोहन मल्होत्रा के साथ तुर्कमान गेट के दौरे पर गए थे. तभी उन्होंने ये शब्द कहे थे जिसे जगमोहन ने आदेश की तरह लिया और फैसला किया कि तुर्कमान गेट और जामा मस्जिद के बीच जो भी झुग्गी बस्तियां या अन्य इमारतें हैं, उन्हें ध्वस्त कर दिया जाएगा. इसी फैसले के साथ भारत ने देखा वो पहला बुलडोजर एक्शन जिसने सैकड़ों घरों को जमींदोज कर दिया और परिवारों को बेघर.
संजय गांधी के हुक्म की तामील के लिए 13 अप्रैल 1976 की सुबह एक पुराना बुलडोजर तुर्कमान गेट के पास पहुंचा. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लोग गुस्सा न हों इसके लिए एक रणनीति बनाई गई और मजदूरों ने पहले आसपास के फुटपाथ को तोड़ना शुरू किया.
डीडीए ने लोगों को आश्वस्त करने की पूरी कोशिश की कि कोई घर नहीं तोड़ा जाएगा लेकिन लोगों के मन में बुलडोजर देखकर शंका पैदा हो गई. कुछ लोग जगमोहन से मिलने गए ताकि वो बुलडोजर एक्शन को रुकवा दें लेकिन देखते ही देखते तुर्कमान गेट के पास की झुग्गियां, इमारतों पर बुलडोजर चलने लगे. लोग रोते-चिल्लाते हुए अपने आशियाने को टूटते बेबस देखते रहे.
ये वक्त था इमरजेंसी का जब देश में लोकतंत्र औंधे मुंह गिर पड़ा था. विपक्षी नेता जेल में थे और लोगों के विरोध करने की आजादी तक छीन ली गई थी. तुर्कमान गेट का विध्वंस इमरजेंसी (1975-1977 के बीच) का एक स्याह पन्ना है जिसे पलटने पर भी कालिख उंगलियों में चिपक जाती है.
जिनके घर टूटे वो चुप बैठने वाले कहां थे...19 अप्रैल 1976 को करीब 500 महिलाएं और उनके बच्चे विध्वंस के स्थान पर जमा हो गए. बांह पर काली पट्टी बांधे महिलाएं बुलडोलर एक्शन के खिलाफ तनकर खड़ी हो गईं. उन्होंने बुलडोजरों को चलने से रोक दिया.
इसे देख बड़ी संख्या में सीआरपीएफ के जवानों को बुलाया गया. जवान राइफल, आंसू गैस के गोले और रॉयट शील्ड के साथ उतरे. यह देख भीड़ बौखला गई और उन्होंने मलबे से पत्थर उठाकर जवानों की तरफ फेंकने शुरू कर दिए. पुलिस पर छतों से भी पत्थर बरसाए गए.
पुलिस ने फायरिंग की लेकिन भीड़ पूरी तैयारी के साथ आई थी. लोग तंग गलियों से निकलकर सुरक्षाबलों पर हमला करने लगे. मामला संभालने के लिए सुरक्षाबलों ने कई राउंड गोलियां चलाई जिसमें कई लोगों की मौत हो गई.
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, कुल 14 राउंड गोली चलाई गई जिसमें छह लोग मारे गए. लेकिन बताया जाता है कि मरने वालों की सख्या इससे कहीं ज्यादा थी.
कई लेखकों ने इस घटना का जिक्र अपनी किताबों में किया और मरने वालों की संख्या अलग-अलग बताई गई. वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर की किताब 'द जजमेंट' में लिखा गया है कि पुलिस की गोली से 150 लोग मारे गए थे.
आपातकाल के दौरान देशभर में लोगों को बेघर करने और विस्थापित करने वाली अधिकांश तोड़फोड़ के पीछे संजय गांधी ही थे. तुर्कमान गेट विध्वंस भी ‘सौंदर्यीकरण’ के नाम पर किया गया. आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए 1977 में गठित शाह आयोग को ऐसी शिकायतें मिलीं कि ये तोड़फोड़ कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई थीं.
दिल्ली में 1973 से जून 1975 के बीच 1,800 संरचनाएं ढहाई गईं. इसके बाद जून 1975 से मार्च 1977 तक, यानी आपातकाल हटाए जाने तक, दिल्ली में 1,50,105 संरचनाओं को गिरा दिया गया. अनुमान है कि इस दौरान 7,00,000 लोग विस्थापित हुए.
जब 6-7 जनवरी की दरमियानी रात करीब 1 बजे तुर्कमान गेट पर फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास बुलडोजर एक्शन दिखा तो उस वीभत्स घटना का जिक्र जरूरी हो गया. दिल्ली नगर निगम (MCD) ने मस्जिद के पास अवैध निर्माण हटाने के लिए डिमोलिशन ड्राइव शुरू किया.
इस कार्रवाई के लिए रात में 30 से अधिक बुलडोजर पहुंचे जिसका स्थानीय लोगों ने भारी विरोध किया और पुलिसवालों पर पत्थर फेंके. पुलिसवालों और लोगों के बीच हुई झड़प में पांच पुलिसकर्मी घायल बताए जा रहे हैं और कई लोगों को भी चोट पहुंची है.
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