सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सहमति से शुरू हुए रिश्ते का टूटना या साथी के बीच दूरी बढ़ना, क्रिमिनल मशीनरी को एक्टिव करने का जरिया नहीं हो सकता. मसलन, कोर्ट का मानना है कि ऐसी स्थिति में यह अपराध नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने एक 25 वर्षीय युवक के खिलाफ शादी के झूठे वादे पर दर्ज दुष्कर्म के मामले को खारिज कर दिया है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामले सिर्फ अदालतों का समय और संसाधन खराब करते हैं और साथ ही, ऐसे गंभीर आरोपों से शख्स की छवि को भी नुकसान पहुंचता है. सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार ऐसे प्रावधानों के दुरुपयोग के खिलाफ चेतावनी दी है, और कहा है कि शादी के वादे के टूटने को हर बार झूठा वादा मानकर अपराध में बदलना अराजकता है.
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सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया बरी
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी युवक मात्र 25 साल का है और उसके जीवन में बहुत कुछ अभी बाकी है. इस संदर्भ में न्याय का हित इसमें है कि उसे किसी लंबित मुकदमे का सामना न करना पड़े. इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के जून 2025 के आदेश को निरस्त करते हुए युवक को आरोपी से बरी कर दिया.
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सिर्फ विवाह का आश्वासन देकर धोखा दिया गया, ये सिद्ध नहीं
कोर्ट ने कहा कि मामले में शुरू से ही झूठे विवाह का कोई प्रमाण नहीं है और भारतीय दंड संहिता की धाराओं 376(2)(n) और 506 के तहत अपराध सिद्ध नहीं होते. एफआईआर में दर्ज आरोपों को सही मानने पर भी ऐसा नहीं लगता कि शिकायतकर्ता महिला की सहमति उसके खिलाफ ली गई हो या सिर्फ विवाह का आश्वासन देकर धोखा दिया गया हो.
सृष्टि ओझा