सुप्रीम कोर्ट में एक विवाहिता ने अपने 26 हफ्ते के अनचाहे गर्भ को गिराने की इजाजत मांगी जिस पर कोर्ट में आज यानी बुधवार को फिर से सुनवाई हुई. जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बी वी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने कहा था है कि वो पहले ही दो बच्चे की मां है और प्रसव बाद के अवसाद सहित स्वास्थ्य संबंधित कई तरह की दिक्कतों से जूझ रही है. वो आर्थिक मानसिक और सामाजिक तौर पर भी इस तीसरे बच्चे को पालने में अक्षम है.
एक ओर गर्भपात कराने की इच्छुक मां के अधिकार और दूसरी ओर जन्म लेने को इच्छुक भ्रूण यानी अजन्मे शिशु के अधिकारों की बहस में सुप्रीम कोर्ट की दो महिला जजों के बीच भी वैचारिक मतभेद दिखा. जस्टिस हिमा कोहली मेडिकल रिपोर्ट और अजन्मे बच्चे के जीने के अधिकार के समर्थन में बच्चे को इस दुनिया में लाने के हक में दिखीं तो वहीं जस्टिस नागरत्ना ने महिला की इच्छा के समर्थन में गर्भपात कराने के हक में अपना मंतव्य सुनाया.
लिहाजा मत भिन्नता की वजह से अब ये मामला चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के पास भेजा गया है. अब जस्टिस चंद्रचूड़ तीन जजों की पीठ गठित करेंगे जो इस मानवीय और संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई करेगी. ऐसे में अब इस मामले में बच्चे के जन्म की संभावनाएं प्रबल होती दिख रही हैं.
सुनवाई के दौरान भी जस्टिस हिमा कोहली ने कोर्ट में मौजूद याचिकाकर्ता महिला से कहा कि कोर्ट के साथ वीडीओ कॉन्फ्रेंस के दौरान भी उसने बच्चे को जन्म देने पर सहमति जताई थी. लेकिन अब ऐसी स्थित में भी वो इस बात से मुकर रही है जब गर्भ को खत्म करना एक जीवन खत्म करने जैसा है. जस्टिस कोहली ने कहा कि एम्स के ई मेल ने सारी स्थिति साफ कर दी है. ये मेल पहले आ गया होता तो हमें शीघ्र गर्भपात करवाने का आदेश देने की नौबत ही नहीं आती. मेल मिलने के बाद मेरा न्यायिक विवेक गर्भ खत्म करने का आदेश देने की कतई इजाजत नहीं देता है.
केंद्र सरकार की ओर से भी ASG ऐश्वर्या भाटी ने एम्स के ईमेल के आधार पर गर्भ के जीवित रहने का हवाला देते हुए गर्भपात न कराने की हिमायत की. वहीं जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि महिला की इच्छा का सम्मान करना चाहिए. हम उसकी इच्छा का दमन नहीं करना चाहिए.
सृष्टि ओझा / संजय शर्मा