सुप्रीम कोर्ट ने शरजील इमाम के फैसले में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना एक संवैधानिक दायित्व है. अदालत ने कहा कि यह संतुलन किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं, बल्कि संविधान के तहत अदालतों की जिम्मेदारी है.
कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी साफ किया कि जिन लोगों पर अवैध या आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने, उसका निर्देशन करने या उसे आगे बढ़ाने के आरोप हैं, उनकी कानूनी स्थिति उन लोगों से अलग होती है जिनकी भूमिका केवल सहायता देने या सीमित स्तर की भागीदारी तक बताई गई है. अदालत के मुताबिक, इन दोनों वर्गों को एक ही नजर से देखना मनमाना और कानून के खिलाफ होगा.
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका यह फैसला न तो अभियोजन पक्ष के पूरे मामले का समर्थन करता है और न ही किसी आरोपी के दोषी या निर्दोष होने पर कोई राय देता है. अदालत ने कहा कि यह निर्णय केवल कानून के अनुसार लिया गया है, जिसमें एक ओर व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा जरूरी है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और सामूहिक सुरक्षा की वैध जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
अदालत ने यह भी कहा कि यह फैसला सीमित दायरे में दिया गया है. जमानत याचिका पर विचार करते समय कोर्ट ने न तो अभियोजन के सबूतों की गहराई से जांच की है और न ही किसी आरोपी की अंतिम दोषसिद्धि पर टिप्पणी की है. सभी टिप्पणियां मौजूद रिकॉर्ड और विशेष कानून के तहत विचाराधीन अवधि में स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक मानकों तक ही सीमित हैं.
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इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिए हैं कि मामले की प्रकृति और आरोपियों द्वारा पहले से काटी गई हिरासत की अवधि को देखते हुए सुनवाई में तेजी लाई जाए. अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष जिन संरक्षित गवाहों पर निर्भर है, उनके बयान जल्द से जल्द दर्ज किए जाएं और सुनवाई में अनावश्यक देरी न हो.
कोर्ट ने अभियोजन को यह सुनिश्चित करने को भी कहा है कि तय तारीखों पर गवाहों की मौजूदगी रहे. वहीं सभी पक्षों को सलाह दी गई है कि अपरिहार्य परिस्थितियों को छोड़कर स्थगन न मांगा जाए. ट्रायल कोर्ट को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वह कानून के अनुसार कार्यवाही को नियंत्रित करे, ताकि मुकदमा बेवजह लंबा न खींचे और सभी पक्षों के अधिकार सुरक्षित रह सकें.
संजय शर्मा