लॉकडाउन, राज्यसभा में गोगोई, एमनेस्टी पर एक्शन, इन मुद्दों पर फ्रीडम रिपोर्ट में पिछड़ा भारत

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर टिप्पणी करते हुए फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की राज्यसभा में नियुक्ति की ओर इशारा किया गया है. इसमें कहा है कि साल 2020 में राष्ट्रपति ने एक सेवा निवृत चीफ जस्टिस की नियुक्ति संसद के ऊपरी सदन में की जो कि देश में संवैधानिक मूल्यों के लिए ठीक नहीं है.

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इस रिपोर्ट में लॉकडाउन में मजदूरों को परेशानियों का जिक्र है. (फाइल फोटो- पीटीआई) इस रिपोर्ट में लॉकडाउन में मजदूरों को परेशानियों का जिक्र है. (फाइल फोटो- पीटीआई)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 मार्च 2021,
  • अपडेटेड 2:15 PM IST
  • US थिंक टैंक की रिपोर्ट में पिछड़ा भारत
  • लॉकडाउन, जमात, अमेनस्टी का जिक्र
  • राज्यसभा में जस्टिस गोगई की नियुक्ति की चर्चा

फ्रीडम हाउस द्वारा भारत समेत दुनिया के कई देशों में जीने की 'आजादी' को लेकर तैयार की गई ये रिपोर्ट कई मानकों के अध्ययन पर आधारित है. इन मानकों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, एनजीओ को कार्य करने की आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मुद्दे शामिल हैं?

फ्रीडम हाउस ने अपनी रिपोर्ट में भारत को पिछले साल के 71 के मुकाबले इस साल 67 का स्कोर दिया है. इस वर्ष जिन मुद्दों के अध्ययन के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की गई है उनमें से प्रमुख ये हैं.

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 क्या वहां पर स्वतंत्र न्यायपालिका काम कर रही है?

 क्या NGO को काम करने की आजादी है? खासकर उन एनजीओ को जो मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे हैं?
 
क्या लोग राजनीतिक और दूसरे संवेदनशील मुद्दों पर अपनी निजी राय को बिना किसी बदले की कार्रवाई के डर के रखने के लिए स्वतंत्र हैं?

क्या लोगों को फ्री मूवमेंट की आजादी है? इसके अलावा क्या उन्हें अपना निवास स्थान, रोजगार और शिक्षा बदलने की स्वतंत्रता है?

क्या लोगों अपने पसंद के राजनीतिक दल में जाने का अधिकार है?

क्या सरकार का मौजूदा प्रमुख या दूसरे राष्ट्रीय चीफ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के जरिए चुने गए हैं?

क्या वहां का मीडिया आजाद और स्वतंत्र है?

क्या लोग सार्वजनिक रूप से अपने धार्मिक विश्वास का पालन करने और उसे व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं? या फिर जिन्हें किसी आस्था में विश्वास नहीं है तो ऐसा व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं?

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फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में जमातियों का अप्रत्यक्ष रूप से जिक्र किया गया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड महामारी की शुरुआत में भारत के मुस्लिमों को कोरोना वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. इसमें सत्ताधारी दल के लोग भी शामिल थे. 

राजनीतिक विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने की चर्चा करते हुए कहा गया है कि साल 2020 में जिन लोगों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन किया था, उनमें से कई लोगों के खिलाफ राजद्रोह के मुकदमे चलाए गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि जनवरी 2020 में कर्नाटक में 'फ्री कश्मीर' का पोस्टर लगाने के लिए एक प्रदर्शनकारी के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा लगाया गया. 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर टिप्पणी करते हुए फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के राज्यसभा में नियुक्ति की ओर इशारा किया गया है. इसमें कहा है कि साल 2020 में राष्ट्रपति ने एक सेवा निवृत चीफ जस्टिस की नियुक्ति संसद के ऊपरी सदन में की जो कि देश में संवैधानिक मूल्यों के लिए ठीक नहीं है. इस कैटेगरी में भारत की रैंकिंग गिरी है. 

एनजीओ के काम करने की आजादी के मामले में भी फ्रीडम हाउस ने भारत की रैंकिंग को डाउनग्रेड किया है. इस में कहा गया है कि सितंबर 2020 में अमनेस्टी इंटरनेशनल को भारत में अपना काम बंद करना पड़ा जब सरकारी एजेंसियों ने कथित तौर पर विदेशी फंडिंग का आरोप लगाते हुए इसके खाते बंद कर दिए. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि माना जाता है कि कश्मीर में सरकार की नीतियों और दिल्ली दंगों में पुलिस पर सवाल उठाने के लिए ऐसा किया गया है. 

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यूएस थिंक टैंक की इस रिपोर्ट में लॉकडाउन में मजदूरों को हुई परेशानियों का भी जिक्र है. रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन में मजदूरों को नाम मात्र की मदद दी गई. इसकी वजह से लाखों मजदूरों को शहरों से गांवों की ओर पलायन करना पड़ा. इन मजदूरों के सामने परिवहन के कोई साधन न थे, इस वजह से इन्हें सैकड़ों मील पैदल चलना पड़ा. 

 

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