गैंगस्टर लखन भैया फेक एनकाउंटर की पूरी कहानी जिसमें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा को हुई उम्रकैद की सजा

महाराष्ट्र के मुंबई में साल 2006 में एक एनकाउंटर हुआ था, जिसको अदालत ने फर्जी करार देते हुए पूर्व पुलिस ऑफिसर प्रदीप शर्मा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. इससे पहले दोषी पाए गए 13

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मुंबई फेक एनकाउंटर (फाइल फोटो) मुंबई फेक एनकाउंटर (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • मुंबई,
  • 20 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 12:38 PM IST

बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने मंगलवार को अपने एक फैसले में मुंबई पुलिस के पूर्व अफसर प्रदीप शर्मा को फर्जी एनकाउंटर मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई है. साल 2006 में गैंगस्टर छोटा राजन के एक कथित सदस्य लखन भैया की एनकाउंटर में मौत हो गई थी. कोर्ट ने प्रदीप शर्मा के साथ 13 अन्य लोगों की भी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी, जिनमें से 12 पुलिसकर्मी (दिलीप पलांडे, नितिन सरतापे, गणेश हरपुडे, आनंद पटाडे, प्रकाश कदम, देवीदास सकपाल, पांडुरंग कोकम, रत्नाकर कांबले, संदीप सरदार, तानाजी देसाई, प्रदीप सूर्यवंशी और विनायक शिंदे) शामिल हैं. इसमें एक नागरिक भी शामिल है, जिसका नाम हितेश सोलंकी है.

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11 नवंबर, 2006 को उत्तर-पश्चिमी मुंबई के वर्सोवा में नाना नानी पार्क में लखन भैया उर्फ रामनारायण गुप्ता की हत्या कर दी गई थी.

साजिश के साथ हुआ था एनकाउंटर

मामले में दोषी पाए गए प्रदीप शर्मा, 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' के नाम से जाने जाते थे. उन पर लखन भैया और उनके दोस्त अनिल भेड़ा को नवी मुंबई के वाशी स्थित उनके घर से अपहरण करके गोली मारने और पूरे अपराध को एक एनकाउंटर सीन के रूप में दिखाने का आरोप था. लखन की हत्या के बाद भेड़ा को भी मृत पाया गया था.

जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस गौरी गोडसे की बेंच ने प्रदीप शर्मा को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को पलट दिया. बेंच ने कहा कि गलत तरीके से बंधक बनाना, आपराधिक अपहरण और फर्जी मुठभेड़ के आरोप सच साबित हुए हैं. 

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कोर्ट ने कहा कि यह शर्म की बात है कि अनिल भेड़ा के हत्यारों पर मामला दर्ज नहीं किया गया. इस मामले के मुख्य गवाह की हत्या कर दी गई. यह उनके परिवार के लिए इंसाफ का मजाक है. अदालत ने मामले में 13 आरोपियों की अपील भी खारिज कर दी.

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याचिका के बाद शुरू हुई जांच

मृतक के भाई और वकील रामप्रसाद गुप्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद फरवरी 2008 को मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दिया गया था. सितंबर 2009 में, कोर्ट के द्वारा एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया और मामले की जांच की जिम्मेदारी तत्कालीन पुलिस उपायुक्त IPS अधिकारी के.एम.एम. प्रसन्ना को दी गई. 

हत्या के लिए मिली थी सुपारी

अप्रैल 2010 में एसआईटी ने मामले में 22 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था. इसमें कहा गया है कि एक रियल एस्टेट एजेंट जनार्दन भांगे ने ज्वाइंट प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन को लेकर रामनारायण गुप्ता के खिलाफ पूर्व पुलिस अधिकारियों प्रदीप शर्मा और प्रदीप सूर्यवंशी को हत्या की सुपारी दी थी. इसके बाद एनकाउंटर की योजना बनाई गई थी. 

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13 मार्च, 2011 को अदालत में अपनी गवाही से पहले, मामले के मुख्य गवाह अनिल भेड़ा, वाशी में अपने आवास से लापता हो गए. चार दिन बाद उनका बुरी स्थिति में जला हुआ शव ठाणे के मनोर में पाया गया. 

मामले में एक सेशन कोर्ट ने 21 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी लेकिन प्रदीप शर्मा को बरी कर दिया था. इंस्पेक्टर प्रदीप सूर्यवंशी और दिलीप पलांडे और कांस्टेबल तानाजी देसाई को हत्या का दोषी ठहराया गया, जबकि 18 आरोपी पुलिसकर्मियों को उकसाने के आरोप में दोषी ठहराया गया.

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