इस साल गुजरात के पांच लोगों को पद्म पुरस्कार मिलने की घोषणा की गई है. नीलेश मांडलेवाला, हाजी कासम मीर (हाजी रमकडू), रतिलाल बोरिसागर, अरविंद वैद्य और धार्मिकलाल पंड्या को पद्म श्री से सम्मानित किया गया है.
भारत के 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है. कला, सामाजिक सेवा, शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले गुजरात के पांच नागरिकों को पद्म श्री पुरस्कार के लिए चुना गया है.
सूरत के अंगदान अभियान के अगुआ नीलेश मांडलेवाला, जूनागढ़ के हाजी रमकडू के नाम से मशहूर हाजी कासम मीर, जो अपने ढोल के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं, वडोदरा के धार्मिकलाल पंड्या, जिन्होंने माणभट्ट की 350 साल पुरानी परंपरा को जीवित रखा है, साहित्य में प्रसिद्ध हास्यकार और निबंधकार रतिलाल बोरिसागर और कला क्षेत्र में जाने-माने फिल्म अभिनेता रहे अरविंद वैद्य को पद्म श्री देने की घोषणा की गई है.
सूरत के नीलेश विनोदचंद्र मांडलेवाला को सामाजिक कार्यों के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. उन्हें गुजरात में अंगदान अभियान का अगुआ माना जाता है और वे डोनेट लाइफ संगठन के संस्थापक हैं. वर्ष 1997 में नीलेशभाई के पिता की किडनी खराब हो गई थी. वर्ष 2004 से उन्हें नियमित डायलिसिस कराना पड़ता था. इस दौरान रोगी और परिवार की असहनीय पीड़ा को देखकर नीलेशभाई ने इस क्षेत्र में काम करने का दृढ़ संकल्प लिया. उनके पिता का देहांत सितंबर 2011 में हुआ. इससे पहले वर्ष 2006 से किडनी दान के साथ उनका अभियान शुरू हुआ था, जो धीरे-धीरे यकृत, अग्न्याशय, हृदय, फेफड़े, आंतें, हाथ और अस्थि दान तक विस्तारित हो गया. अंगदान अभियान में 22 जनवरी 2026 तक कुल 1366 अंगों और ऊतकों का दान किया जा चुका है, जिससे देश और विदेश के विभिन्न राज्यों के कुल 1258 लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान मिला है.
गिरनार की गोद में बसे जूनागढ़ शहर के लिए यह गौरव का क्षण है. भारत सरकार ने जूनागढ़ के प्रसिद्ध ढोलक वादक हाजीभाई कासमभाई मीर, जिन्हें ‘हाजी रमकडू’ के नाम से जाना जाता है, को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म श्री से सम्मानित करने की घोषणा की है. पिछले छह दशकों से ढोलक की थाप से दुनिया को मंत्रमुग्ध करने वाले इस कलाकार को जब सम्मान की खबर मिली तो वे बेहद भावुक हो गए. 80 वर्ष के हो चुके हाजीभाई ने इस घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हार्दिक धन्यवाद दिया. हाजी रमकडू का जन्म 17 मई 1951 को सोमनाथ के अदारी गांव में हुआ था. उन्हें संगीत विरासत में मिला, क्योंकि उनके पिता और दादा भी इस कला से जुड़े हुए थे. महज 9 साल की उम्र में ढोलक बजाना शुरू करने वाले हाजीभाई ने वंजारी चौक की गरबी में ढोल बजाकर अपनी पहली कमाई 15 रुपये की थी. उनके मित्र शंकरभाई रावल ने उनकी ढोल बजाने की अनूठी शैली देखकर उन्हें ‘रमकडू’ नाम दिया, जो बाद में उनकी पहचान बन गया.
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वडोदरा के धार्मिकलाल चुनीलाल पंड्या ‘माणभट्ट’ को संगीत के क्षेत्र में पद्म श्री से सम्मानित किया जाएगा. धार्मिकलाल पंड्या ने कहा, “मुझे यह पद्म श्री पुरस्कार पाकर बहुत खुशी हो रही है. लेकिन यह सम्मान केवल मेरा नहीं है, यह प्रेमानंद, नरसिंह मेहता, नाकर और भालन जैसे महान कवियों का सम्मान है, जिन्होंने हमारे गुजराती साहित्य को समृद्ध किया है. मुझे खुशी है कि आज गुजराती भाषा और कहानीकारों को सम्मान मिल रहा है.” उन्होंने बताया कि बचपन से वे अपने पिता के साथ जाते थे, इसलिए यह कला उन्हें विरासत में मिली. पिता के निधन के बाद जिम्मेदारी उन पर आ गई और दोस्तों ने उन्हें इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया. शुरुआत में उन्हें खुद पर भरोसा नहीं था और लगभग दस साल तक वे सफल भी नहीं हो पाए, लेकिन बाद में उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना कर इस कला को स्वीकार किया. धार्मिकलाल पंड्या ने भारत समेत पांच से अधिक देशों में विभिन्न माध्यमों से 2500 से ज्यादा कहानियां प्रस्तुत की हैं. उनकी प्रस्तुति ऑल इंडिया रेडियो वडोदरा पर ‘श्री हरिवंश पुराण’ के 28 एपिसोड, दिल्ली अंतरराष्ट्रीय कला महोत्सव और संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर रही है. इसके अलावा उन्होंने सूचना एवं प्रसारण विभाग के सहयोग से ‘जल आख्यान’ और ‘अक्षर आख्यान’ जैसे जन जागरूकता कार्यक्रम भी किए हैं, जो आकाशवाणी पर प्रसारित हुए. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, नशाबंदी और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर भी उन्होंने कार्यक्रम किए हैं.
रतिलाल बोरिसागर एक गुजराती हास्यकार, निबंधकार और संपादक हैं. उन्होंने कुल 17 पुस्तकें लिखी हैं और 6 पुस्तकें बच्चों के लिए लिखी हैं. उन्हें साहित्य के क्षेत्र में पद्म श्री से सम्मानित किया गया है. उनका जन्म 31 अगस्त 1938 को अमरेली के सावरकुंडला में हुआ था. उन्होंने वहीं से शिक्षा प्राप्त की और 1989 में पीएचडी की उपाधि हासिल की. कुछ वर्षों तक शिक्षक के रूप में काम करने के बाद वे राज्य विद्यालय पाठ्यपुस्तक बोर्ड से जुड़े और 1998 में सेवानिवृत्त हुए. उन्होंने अपने लेखन करियर की शुरुआत कहानीकार के रूप में की, लेकिन बाद में एक हास्यकार के रूप में पहचान बनाई. उन्होंने कई हास्य संग्रह और उपन्यास लिखे, जिनमें चर्चित पुस्तक ‘एंजॉयोग्राफी’ भी शामिल है. 2019 में उन्हें उनके निबंध संग्रह ‘मोजमा रेवु रे’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
मूल रूप से महाराष्ट्र में जन्मे अरविंद वैद्य को फिल्म और रंगमंच में योगदान के लिए कला क्षेत्र में पद्म श्री देने की घोषणा की गई है. उन्होंने टीवी और फिल्मों में 33 वर्षों तक काम किया है. वे 400 से ज्यादा नाटकों में अभिनय कर चुके हैं और 200 से अधिक नाटकों का निर्देशन कर चुके हैं. उनका जन्म मई 1941 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के मसूर गांव में हुआ था. कुछ वर्षों बाद उनका परिवार गुजरात आ गया और अहमदाबाद में बस गया. उनके पिता चाहते थे कि अरविंद इंजीनियर बनें, लेकिन रुचि न होने के कारण उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी. पिता के निधन के बाद वे नाटकों से जुड़े और यहीं से उनके कला जीवन की शुरुआत हुई. उन्होंने गुजराती और हिंदी टीवी सीरियल्स में काम किया है. गुजराती अभिनेता और निर्देशक के रूप में पहचाने जाने वाले अरविंद वैद्य ‘पप्पा वन्स मोर’ और ‘बा बापूजी नी ट्वेंटी ट्वेंटी’ जैसे नाटकों के लिए जाने जाते हैं. वे ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों और कुछ बॉलीवुड फिल्मों में भी नजर आ चुके हैं.
इसके अलावा गुजरात से उदय कोटक, अलका याज्ञिक और सतीश शाह (मरणोपरांत) को भी पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.
ब्रिजेश दोशी