हिमाचल की सर्द भरी वादियों में सियासत गर्मा चुकी है. यहां की विधानसभा की 68 सीटों के लिए 12 नवंबर को वोटिंग होनी है. वोटरों को रिझाने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने पत्ते भी फेंक दिए हैं. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा 'सेब' को लेकर है.
देशभर में लोगों के मुंह में मिठास घोलने वाले हिमाचल के सेब ने वहां नेताओं के दांत खट्टे कर दिए हैं. यही वजह है कि चाहे बीजेपी हो या फिर कांग्रेस, दोनों ही पार्टियों सेब की खेती करने वाले किसानों को खुश करने के लिए दांव चल दिया है.
कांग्रेस ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनी तो एक कमेटी का गठन किया जाएगा, जो सेब की कीमत तय करेगी. वहीं, बीजेपी ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनी रही तो सेब के पैकेजिंग मटैरियल पर लगने वाले जीएसटी को 18% से घटाकर 12% कर दिया जाएगा.
चुनाव आते ही सेब की खेती करने वाले किसानों को पार्टियां खुश करने में लगी हैं, तो जाहिर है कि इनका एक बड़ा वोट बैंक भी होगा. एक अनुमान के मुताबिक, हिमाचल की 68 में से 20 से 25 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां सेब की खेती करने वाले किसान असर डालते हैं. मतलब साफ है कि सेब के किसान साथ आ जाएं तो सरकार बनाना आसान हो सकता है.
अभी क्या है किसानों की मांग?
सेब की खेती करने वाले किसानों की कई मांगें हैं. सबसे बड़ी मांग तो यही है कि पैकेजिंग मटैरियल पर लगने वाले जीएसटी को कम किया जाए.
किसानों की सबसे बड़ी मांग यही है कि सेब की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले कार्टन और ट्रे पर लगने वाले जीएसटी को घटाया जाए. क्योंकि इससे पैकेजिंग का खर्चा बढ़ रहा है और कमाई घट रही है. जीएसटी बढ़ने का असर ये हुआ कि पहले ट्रे की 100 यूनिट जो 600 रुपये के आसपास मिल जाती थी, वो अब 850 रुपये से ज्यादा की मिल रही है. वहीं, एक कार्टन पहले 40 रुपये में आ जाता था, वो अब 60 रुपये से ज्यादा में आता है.
दूसरी मांग है कि जम्मू-कश्मीर की तरह ही यहां भी सेब का भी एक न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी हो. किसानों का कहना है कि जब जम्मू में सेब का समर्थन मूल्य हो सकता है, तो हिमाचल में क्यों नहीं.
जम्मू-कश्मीर में ए-ग्रेड सेब पर एमएसपी 60 रुपये, बी-ग्रेड पर 44 रुपये और सी-ग्रेड पर 23 रुपये तय है, लेकिन हिमाचल में ऐसा कोई सिस्टम ही नहीं है. सरकारी एजेंसियां जैम और जूस बनाने के लिए 10 रुपये प्रति किलो की दर से सी-ग्रेड सेब खरीदती हैं, जबकि एक किलो सेब की खेती की लागत 40 से 50 रुपये आती है.
किसानों की नाराजगी की एक वजह फर्टिलाइजर की कीमतों का बढ़ना भी है. पहले सरकार अपने आउटलेट से कम कीमतों पर फर्टिलाइजर देती थी, लेकिन दो साल से ये भी बंद है. किसानों का कहना है कि पहले एक किलो फर्टिलाइजर 250 से 300 रुपये में मिल जाता था, लेकिन अब मार्केट में इसकी कीमत डेढ़ से दो हजार के बीच हो गई है.
राजनीति में कितना असर डालते हैं सेब के किसान?
हिमाचल में करीब 10 लाख परिवार खेती से जुड़े हुए हैं. इनमें से 2 लाख परिवार ऐसे हैं जो सेब की खेती करते हैं.
हिमाचल प्रदेश के लगभग 50 फीसदी इलाके पर सेब की खेती होती है. हर साल 5.5 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है. सेब की खेती से हर साल 5 से 6 हजार करोड़ रुपये का रेवेन्यू मिलता है. इतना ही नहीं, राज्य की जीडीपी में सेब का योगदान 13 फीसदी से भी ज्यादा है.
जिस तरह से राज्य की आर्थिक सेहत पर सेब के किसान इतना असर डालते हैं, उतना ही यहां की राजनीति पर भी. करीब 20 से 25 विधानसभा सीटों को सेब की खेती करने वाले किसान प्रभावित करते हैं.
शिमला, किन्नौर, सोलन के अलावा मंडी और सिरमौर जिले के कुछ इलाकों में सेब की खेती होती है. पिछले साल हिमाचल में तीन विधानसभा सीटों- फतेहपुर, अर्की और जुब्बाल-कोटखाई और मंडी लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए थे. इन सारी सीटों पर कांग्रेस की जीत हुई थी. इसके बाद कांग्रेस ने बीजेपी पर सेब की खेती करने वाले किसानों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया था. कांग्रेस ने वादा किया था कि अगर उनकी सरकार आती है तो किसानों की सारी मांगे मानी जाएगी.
जब गिर गई थी बीजेपी सरकार
सेब की खेती करने वाले किसान हिमाचल की राजनीति पर कितना गहर असर डालते हैं, इसका अंदाजा 90 के दशक में हुए आंदोलन से भी लगाया जा सकता है. तब किसानों की नाराजगी बीजेपी पर भारी पड़ गई थी और उसकी सरकार गिर गई थी.
1990 में हिमाचल में सेब आंदोलन हुआ था. उस समय राज्य में बीजेपी की सरकार थी और शांता कुमार मुख्यमंत्री थे. किसान चाहते थे कि सरकार सेब की एमएसपी तय करे.
22 जुलाई 1990 को कोटगढ़ में सैकड़ों की संख्या में किसान इकट्ठे हो गए. इन्हें शांत कराने के लिए पुलिस ने फायरिंग की. इस गोलीबारी में तीन किसान- गोविंद सिंह, हीरा सिंह और तारा चंद की मौत हो गई.
इस कारण बीजेपी को लेकर भयंकर असंतोष पैदा हो गया. 1993 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी बुरी तरह हार गई. शांता कुमार ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था और दोनों ही जगह से हार गए थे. कांग्रेस ने 68 में से 60 सीटों पर जीत हासिल की. वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री बने. सरकार में आते ही कांग्रेस ने सेब की खेती करने वाले किसानों की मांगें मान ली.
Priyank Dwivedi