कौन है अजय देवगन की मैदान का रियल हीरो, जिसने कैंसर होने पर भी देश के लिए जीता गोल्ड

फिल्म मैदान में अजय देवगन इंडियन फुटबॉल कोच सैय्यद अब्दुल रहीम की भूमिका में नजर आएंगे. जानें कौन थे सैय्यद अब्दुल रहीम? किस तरह उनकी कहानी लोगों के लिए प्रेरणादायी है.

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अजय देवगन और सैय्यद अब्दुल रहीम अजय देवगन और सैय्यद अब्दुल रहीम

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 7:31 AM IST

फिल्म तानाजी के बाद अजय देवगन अपनी फिल्म मैदान को लेकर सुर्खियों में हैं. इस फिल्म में अजय देवगन इंडियन फुटबॉल कोच सैय्यद अब्दुल रहीम की भूमिका में नजर आएंगे. रहीम की कहानी कई मायनों में खास है शायद यही कारण है कि उनकी मौत के 56 सालों बाद उनकी बायोपिक बनने जा रही है.

कौन थे सैय्यद अब्दुल रहीम?

17 अगस्त, 1909 को हैदराबाद में पैदा हुए रहीम पेशे से टीचर थे और उनमें लोगों को मोटिवेट करने की शानदार क्वॉलिटी थी. उनकी इस काबिलियत को देखते हुए, 1943 में उन्हें हैदराबाद सिटी पुलिस की फुटबॉल टीम के साथ बतौर कोच और सेक्रेटरी जोड़ दिया गया था. इसके बाद हैदराबाद टीम ने लगातार पांच रोवर्स कप जीते. इसके अलावा हैदराबाद टीम पांच बार डुरंड कप के फाइनल में पहुंची, जिसमें से तीन बार विजेता रही. 6-7 साल उस टीम के साथ काम करने के बाद ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने उन्हें 1950 में इंडियन फुटबॉल टीम का कोच और मैनेजर बना दिया गया था.

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1951 में पहले एशियन गेम्स दिल्ली में खेले गए. इसमें इंडियन फुटबॉल टीम ने गोल्ड मेडल जीता. इसके बाद  1956 में मेलबर्न ओलंपिक में भारत ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था जो भारत के अब तक के फुटबॉल इतिहास की बेहतरीन उपलब्धि में गिना जाता है. मेलबर्न ओलंपिक के कुछ ही समय बाद से रहीम की तबीयत खराब रहने लगी. थोड़े टाइम बाद पता चला कि उन्हें लंग कैंसर है.

इसके बाद साल 1962 में एशियन गेम्स इंडोनेशिया में हो रहे थे. कैंसर से जंग जारी रखते हुए इस टूर्नामेंट में खेलने के लिए रहीम ने एक बार फिर अपनी टीम इकट्ठी की. भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन जारी रखते हुए सैय्यद के नेतृत्व में फाइनल तक का सफर तय किया. फाइनल में इंडिया को एशिया की सबसे मजबूत टीम साउथ कोरिया से भिड़ना था. लेकिन दो डिफेंडर चोटिल थे और गोलकीपर फ्लू से जूझ रहा था.

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ऐसे में साउथ कोरियो का हराना दूर की कौड़ी लग रही थी. वही रहीम की तबीयत भी बिगड़ती ही जा रही थी लेकिन अपने कोच की हिम्मत को देखते हुए तीनों खिलाड़ियों ने खेलने का फैसला किया था. सैय्यद ने इस मैच से पहले टीम से अपने लिए गोल्ड के तौर पर गिफ्ट मांगा और सितंबर 1962 में एशियन गेम्स में भारत ने सनसनीखेज जीत दर्ज की थी. इसके एक साल बाद यानि 1963 को सैय्यद अब्दुल रहीम ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था.

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