ऑस्कर विनर म्यूजिक कम्पोजर एआर रहमान आज भले ही बॉलीवुड के सबसे बड़े और कामयाब म्यूजिक कंपोजर्स में से एक हों, लेकिन उन्हें हिंदी फिल्मों में खुद को कम्फर्टेबल करने में पूरे सात साल लग गए. इस बारे में उन्होंने बात की. रहमान का मानना है कि पहले उन्हें बॉलीवुड में अपना-सा महसूस नहीं होता था. उन्होंने ये भी बताया कि पिछले आठ सालों में उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कम काम क्यों मिला और इसके पीछे की वजहों पर भी सोचा.
रहमान का बड़ा खुलासा
एआर रहमान ने हिंट दिया कि शायद ऐसा उनके अलग धर्म और भाषा की वजह से हो सकता है. म्यूजिक कम्पोजर ने बताया कि अब उनके पास हिंदी वर्ग से कम काम आता है. लेकिन वो इसकी परवाह नहीं करते.
BBC एशियन नेटवर्क से रहमान ने कहा कि- असल में रोजा, बॉम्बे और दिल से के दौरान भी मैं खुद को आउटसाइडर ही मानता था, लेकिन ताल एक ऐसा एल्बम बना जो हर घर तक पहुंच गया. यूं कहें कि वो लोगों की रसोई तक में बजने लगा. आज भी नॉर्थ इंडिया में लोगों के खून में ताल बसी हुई है, क्योंकि इसमें थोड़ा पंजाबी है, थोड़ा हिंदी है और थोड़ा पहाड़ी म्यूजिक है. रहमान ने बताया कि उस समय तक उन्हें लगता था कि वो हिंदी सिनेमा का हिस्सा नहीं हैं, क्योंकि वे हिंदी बोल ही नहीं पाते थे.
कम्पोजर ने कहा कि- एक तमिल इंसान के लिए हिंदी बोलना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि हमारी अपनी भाषा से गहरा जुड़ाव होता है. तब सुभाष घई ने मुझसे कहा- मुझे तुम्हारा म्यूजिक बहुत पसंद है, लेकिन अगर तुम्हें यहां लंबे समय तक रहना है तो हिंदी सीखनी होगी. मैंने सोचा, क्यों न एक कदम और आगे बढ़कर उर्दू सीख ली जाए, क्योंकि 60 और 70 के दशक के हिंदी म्यूजिक की जड़ उर्दू ही है.
इसके बाद उन्होंने अरबी भाषा भी सीखी, क्योंकि उसका उच्चारण उर्दू से काफी मिलता-जुलता है. रहमान ने कहा कि- फिर मैं पंजाबी की ओर गया, और इसमें सुखविंदर सिंह का बड़ा असर रहा. जब वो मेरी दुनिया में आए. मैंने पूछा था- क्या कोई ऐसा सिंगर है जो पंजाबी में गा भी सके और लिख भी सके? तब मेरे दोस्त बृज भूषण ने सुखविंदर सिंह का नाम सुझाया.
भाषा-धर्म की वजह से महसूस किया अलग
जब उनसे पूछा गया कि क्या हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तमिल समुदाय या महाराष्ट्र से बाहर के लोगों के साथ भेदभाव होता है, तो रहमान ने कहा- शायद मुझे कभी इसका एहसास नहीं हुआ, या फिर इसे छुपा लिया गया हो. लेकिन मैंने ऐसा कुछ सीधे तौर पर महसूस नहीं किया. हो सकता है पिछले आठ सालों में पावर शिफ्ट हुआ हो और अब क्रिएटिव लोग नहीं, बल्कि दूसरे लोग फैसले ले रहे हों.
'ये थोड़ा साम्प्रदायिक भी हो सकता है, लेकिन ये सीधे मेरे सामने नहीं आता. मुझे बस कानों-कान खबर मिलती है कि आपको बुक किया गया था, लेकिन म्यूजिक कंपनी ने अपने पांच कंपोजर्स को रख लिया. मैं कहता हूं- ठीक है, इससे मुझे परिवार के साथ वक्त बिताने का ज्यादा समय मिल जाता है. मैं काम के पीछे नहीं भागता. मैं चाहता हूं कि काम खुद मेरे पास आए, मेरी ईमानदारी से. जो मैं डिजर्व करता हूं, वही मुझे मिलता है.'
एआर रहमान ने बॉलीवुड में डेब्यू मणि रत्नम की 1991 की फिल्म रोजा से किया था. इसके बाद उन्होंने मणि रत्नम के साथ तीन फिल्मों की एक सीरीज की- रोजा, बॉम्बे (1995) और दिल से (1998). इसके अलावा उन्होंने 1995 में राम गोपाल वर्मा की रोमांटिक कॉमेडी रंगीला में भी म्यूजिक दिया, जो मणि रत्नम की फिल्मों से बिल्कुल अलग थी. लेकिन रहमान का कहना है कि 1999 में सुभाष घई की फिल्म ताल के बाद ही उन्हें लगा कि वो अब हिंदी सिनेमा में बाहरी नहीं रहे.
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