उत्तराखंड: पहाड़ पर क्यों नहीं चढ़ पाती साइकिल, कुमाऊं में ही चुनाव लड़ना चाहती है सपा

उत्तराखंड के दो दशक के इतिहास में चार विधानसभा चुनाव में हर बार समाजवादी पार्टी ने कोशिश की, लेकिन पार्टी एक बार भी अपना खाता भी नहीं खोल सकी. ऐसे में 2022 के उत्तराखंड चुनाव में सपा ने कुमाऊं के मैदानी क्षेत्र वाली सीटों पर किस्मत आजमाने का फैसला किया है जबकि गढ़वाल इलाके की सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ दिया है. 

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अखिलेश यादव अखिलेश यादव

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 06 जनवरी 2022,
  • अपडेटेड 2:17 PM IST
  • उत्तराखंड में सपा का ग्राफ लगातार गिर रहा है
  • सपा का अभी तक कोई विधायक नहीं बन सका
  • रामपुर तिराहा कांड का दाग सपा के दामन पर

उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड के सियासी पहाड़ियों पर समाजवादी पार्टी की साइकिल कभी चढ़ नहीं सकी. दो दशक में चार विधानसभा चुनाव में हर बार समाजवादी पार्टी ने कोशिश की, लेकिन पार्टी एक बार भी अपना खाता भी नहीं खोल सकी. ऐसे में 2022 के उत्तराखंड चुनाव में सपा ने कुमाऊं के मैदानी क्षेत्र वाली सीटों पर किस्मत आजमाने का फैसला किया है जबकि गढ़वाल इलाके की सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ दिया है. 

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उत्तराखंड में भी सपा बदले हुए तेवर के साथ चुनाव में उतर रही है. सपा ने यूपी की तरह उत्तराखंड के चुनावों के लिए नई हवा है नई सपा है का नारा दिया है. उत्तराखंड क्रांति दल डेमोक्रेटिक का सपा में विलय हो गया है, जिसके चलते कुमाऊं मंडल की सभी 29 सीटों पर सपा खुद चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. 

कुमाऊं के हरिद्वार, देहरादून और उधम सिंह नगर की सभी सीटों पर सपा अपने प्रत्याशी मैदान में उतारेगी. वहीं, गढ़वाल मंडल की शेष सीटों पर सपा समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन की संभावना भी तलाश रही है. कुमाऊं क्षेत्र का बड़ा हिस्सा मैदान है और यूपी से लगा हुआ है, जिसके चलते उसे उम्मीद है कि इस बार उसका खाता खुल सकता है. इसके बाद भी एक सवाल है कि सपा की साइकिल उत्तराखंड के पहाड़ों पर क्यों नहीं चढ़ पाती है.  

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उत्तराखंड के 21 साल के सियासी इतिहास में सपा का कोई खास जनाधार नहीं है. राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा  ने हरिद्वार से जीत दर्ज की थी, जिसमें राजेंद्र बॉडी सपा कोटे से सांसद बने. यह पहला चुनाव था जिसमें समाजवादी पार्टी ने उत्तरप्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड में जीत दर्ज कराई थी. लेकिन, उसके बाद ना तो लोकसभा चुनाव और ना ही किसी विधानसभा चुनाव में सपा  का खाता खुल पाया. 

हालांकि, उत्तराखंड के पहले और 2002 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर सपा की जीत का अंतर मामूली रहा. लेकिन 21 सालों में आज तक एक भी विधायक सपा का विधानसभा तक नहीं पहुंचा. 2002 में समाजवादी पार्टी को 7.89 फीसदी के करीब वोट मिले थे. इन चुनाव में सपा ने 56 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन इसके बाद से लगातार पार्टी का सियासी ग्राफ नहीं ही गिरा है. 

गिरता गया सपा का ग्राफ 

2007 के विधानसभा चुनाव में सपा 42 सीटों पर लड़ी और वोट खिसकर 6.5 के करीब आ गया. 2012 आते-आते सपा का ये ग्राफ गिरता गया और 1.5 फ़ीसदी पर आ गया और सिर्फ 32 सीटों पर चुनाव लड़ सके. 2017 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में हुए सपा के घमासान का असर उत्तराखंड में इस कदर देखने को मिला कि सपा 18 सीटों पर ही चुनाव लड़ पाई और वोट प्रतिशत ना के बराबर रह गया. 

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सपा के उत्तराखंड में लगातार गिरते सियासी ग्राफ और पार्टी का खाता न खुलने की कई वजह भी हैं, जिनमें लीडरशिप की कमी से लेकर पार्टी के जातीय और धार्मिक समीकरण तक सपा के पक्ष में नहीं है. इसके अलावा रामपुर कांड ऐसा सपा के दामन पर दाग है, जो अभी तक धुल नहीं सका. उत्तराखंड के लोग अभी तक रामपुर कांड को भूले नहीं है. 

लीडरशिप की कमी 

उत्तराखंड में सपा की साइकिल पहाड़ न चढ़ने की वजह लीडरशिप की कमी भी रही है. उत्तर प्रदेश की तरह उत्तराखंड में सपा का न तो संगठन है और न ही मजबूती लीडरशिप है. उत्तराखंड में ऐसी कोई लीडरशिप सपा ने खड़ी नहीं की, जो पार्टी को स्थिति में मजबूत कर सके. इसके अलावा लगातार पार्टी ने यह भी कोशिश नहीं की कि अपने जनाधार को किस तरह वापस लाया जाए. 

रामपुर कांड का दाग 

उत्तराखंड में सपा के मजबूत न होने की रामपुर तिराहे कांड अहम है. राज्य आंदोलन संघर्ष समिति के अपील पर अक्टूबर 1994 में उत्तराखंड पृथक राज्य की मांग को लेकर आंदोलनकारी उत्तराखंड से दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे. राज्य की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने देने जा रहे थे. यूपी में मुलायम सिंह यादव की अगुवाई में सरकार थी और  यह तय कर लिया गया था कि आंदोलनकारियों को आगे नहीं जाने देना है. पहले नारसन बार्डर पर नाकाबंदी हुई, लेकिन यहां पर आंदोलनकारियों के आगे प्रशासन बेबस हो गया.

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गढ़वाल और कुमाऊ के आंदोलनकारी के काफिला मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पहुंचा तो पुलिस प्रशासन ने उन पर गोली चला दी. इस दौरान सात आंदोलनकारियों की मौत हो गई. इसके अलावा तमाम आंदोलनकारी, महिलाएं और बच्चे जख्मी हो गए थे और उन्हें गंभीर चोटे आई थी. यह घटना ने सपा के प्रति उत्तराखंड के लोगों के दिलों में दूरियां पैदा कर दी थी. सपा पर लगे रामपुर कांज कलंक को अभी तक नेता धो नहीं पाई है. यही वजह है कि सपा उत्तराखंड में अपना सियासी आधार नहीं जमा सकी.
 

जातीय-धार्मिक समीकरण

उत्तराखंड में सपा के सियासी आधार मजबूत न होने के पीछे यहां का जातीय और धार्मिक समीकर भी है. सपा का यूपी में परंपरागत वोटर यादव और मुस्लिम माना जाता है. उत्तराखंड में यादव समाज का कोई खास आधार नहीं है जबकि मुस्लिम 13 फीसदी है. हालांकि, मुस्लिम दो तीन मैदानी जिलों में ही सीमित हैं और पहाड़ों में आबादी न के बराबर है. 

उत्तराखंड में मुस्लिम वोटर कांग्रेस के साथ है, जिसके चलते सपा अपना सियासी आधार मजबूत नहीं कर सकी. इसके बावजूद सपा सूबे में किस्मत आजमाती रही है और एक बार फिर से चुनावी मैदान में ताल ठोक रही हैं. इस बार कुमाऊ के मैदान से चुनाव लड़कर पहाड़ पर चढ़ने की कवायद में है, लेकिन क्या उसे राजनीतिक कामयाबी मिल सकेगी? 

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