उत्तर प्रदेश के छठे चरण के चुनाव में सभी की निगाहें गोरखपुर की चिल्लूपार सीट पर है, जो पूर्वांचल में ब्राह्मणों के कद्दावर नेता हरिशंकर तिवारी का गढ़ माना जाता है. 1985 से लेकर 2007 तक हरिशंकर तिवारी का कब्जा रहा है और अब उनके बेटे विनय शंकर तिवारी विधायक हैं. योगी आदित्यनाथ और हरिशंकर तिवारी की सियासी अदावत के चलते चिल्लूपार सीट पर बीजेपी अपना वर्चस्व स्थापित करने की कवायद में है तो तिवारी परिवार अपना सियासी रुतबा बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है.
चिल्लूपार सीट पर इस बार तीन ब्राह्मण नेताओं के बीच सियासी जंग हो रही है. हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर बसपा के हाथी से उतरकर सपा की साइकिल पर सवार होकर मैदान में उतरे हैं तो बीजेपी से पूर्व मंत्री राजेश त्रिपाठी, कांग्रेस से सोनिया शुक्ला और बसपा से राजेंद्र सिंह पहलवान ताल ठोक रहे हैं. ऐसे में तीन ब्राह्मण नेताओं की लड़ाई में बसपा से उतरे ठाकुर समुदाय से राजेंद्र सिंह ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है. ऐसे में देखना होगा कि विनय शंकर तिवारी कैसे अपने पिता की सियासी विरासत बचा पाते हैं?
तीन ब्राह्मण प्रत्याशियों के उतरने से दिलचस्प लड़ाई
चिल्लूपार सीट पर बीजेपी, सपा, कांग्रेस और बसपा प्रत्याशी मजबूती से चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि, इससे पहले तक यहां पर मुख्य लड़ाई में बसपा रहती थी. सपा और बीजेपी दूसरे या तीसरे नंबर की लड़ाई लड़ती थीं. इस बार ऐसा नहीं है और ब्राह्मण मतों के बिखराव से चिल्लूपार की लड़ाई संघर्षपूर्ण हो गई है. हरिशंकर तिवारी 22 सालों तक विधायक रहे हैं. यह वो दौर था जिसमें हरिशंकर जिस भी पार्टी से मैदान में उतरते, उसी से जीतकर विधानसभा पहुंच जाते थे.
साल 2007 के विधानसभा चुनाव से चिल्लूपार सीट के सियासी समीकरण बदल गए. बसपा दलित वोटबैंक के दम पर यहां की राजनीति हावी हो गई. दिग्गज हरिशंकर तिवारी राजनीति के नए खिलाड़ी बसपा प्रत्याशी राजेश त्रिपाठी से चुनाव हार गए. राजेश त्रिपाठी मायावती सरकार में मंत्री बने. हरिशंकर तिवारी 2012 के चुनाव में फिर कूदे, लेकिन जनता का भरोसा नहीं जीत पाए और दोबारा बसपा के राजेश त्रिपाठी के हाथों में सियासी मात खानी बनी. इस हार के बाद हरिशंकर तिवारी ने राजनीति से संन्यास ले लिया.
विनय शंकर ने संभाली पिता की विरासत
हरिशंकर तिवारी की सियासी विरासत उनके बेटे विनय शंकर तिवारी संभाल रहे हैं. विनय तिवारी ने 2017 में बसपा के टिकट पर चिल्लूपार सीट से उतरे और अपने पिता की हार का हिसाब राजेश त्रिपाठी से बराबर किया. हालांकि, राजेश त्रिपाठी ने बसपा छोड़कर बीजेपी से चुनावी मैदान में थे. इस बार फिर दोनों नेताओं का मुकाबला है, लेकिन विनय शंकर तिवारी सपा से हैं तो राजेश बीजेपी से ही हैं. बसपा ने इस बार ठाकुर कैंडिडेट राजेंद्र सिंह पहलवान को उतारकर ब्राह्मण व दलित बहुल सीट का मुकाबला दिलचस्प बना दिया है.
चिल्लूपार विधानसभा सीट पर 2007, 2012 और 2017 के चुनाव नतीजे को देखें तो साफ है कि बसपा से टिकट पाने वाले प्रत्याशी ने ही जीत दर्ज की. इसका सबसे बड़ा कारण है कि ब्राह्मणों के साथ दलित समुदाय के वोटों का कॉम्बिनेशन जीत का मंत्र बना. इस बार के चुनाव में सपा, कांग्रेस, बीजेपी ने ब्राह्मण कार्ड खेला है तो बसपा ने ठाकुर दांव चला है. सपा ने विनय तिवारी के जरिए यादव, मुस्लिम और ब्राह्मण कॉम्बिनेशन बनाने की कवायद की है. राजेश त्रिपाठी पर दांव लगाकर बीजेपी ब्राह्मण-ठाकुर समीकरण के जरिए जीत का मंत्र तलाश रही है तो बसपा दलित-ठाकुर वोटबैंक के जरिए अपने जीत के सिलसिले को बरकरार रखना चाहती है.
दलित-ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में
चिल्लूपार विधानसभा सीट पर ब्राह्मण समुदाय का वर्चस्व रहा है. यहां पर करीब 80 हजार ब्राह्मण मतदाता हैं, जिसके दम पर ब्राह्मण नेता जीत दर्ज करते आ रहे हैं. चिल्लूपार सीट के सियासी समीकरण देखें तो सबसे ज्यादा दलित एक लाख 15 हजार हैं, ब्राह्मण 80 हजार, यादव 40 हजार, मुस्लिम 30 हजार, निषाद 25 हजार, मौर्य/कुशवाहा 20 हजार, वैश्य 25 हजारक्षत्रिय 20 हजार, भूमिहार 20 हजार और सैंथवार/कुर्मी 22 हजार हैं. ऐसे में चिल्लूपार में जो भी उम्मीदवार ब्राह्मणों और दलितों का वोट पाता है ,वह आसानी से चुनाव जीत जाता है.
चिल्लूपार सीट पर सपा, बीजेपी और कांग्रेस से तीन ब्राह्मण कैंडिडिटे हैं. ऐसे में ब्राह्मण वोटों में बंटवारा हुआ तो बीजेपी को यहां पर फायदा हो सकता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मण यहां पर हरिशंकर तिवारी और उनके परिवार के साथ रहते हैं. राजेश त्रिपाठी की भी अपनी सियासी पकड़ ब्राह्मण समुदाय पर है, लेकिन तिवारी जैसी नहीं. ऐसे में यहां पर चुनावी जंग काफी तगड़ी मानी जा रही है. विनय शंकर सपा की साइकिल पर सवार होकर क्या विधानसभा 2022 में पहुंच पाएंगे या फिर बीजेपी कमल खिलाने में कामयाब रहेगी?
कुबूल अहमद