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किले में बंद था ये दिव्य वृक्ष, मोदी ने दर्शन कर किया बड़ा ऐलान

मोहित पारीक
  • 16 दिसंबर 2018,
  • अपडेटेड 6:56 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) का दौरा किया. यहां एक रैली को संबोधित करने के साथ ही उन्होंने बड़ा ऐलान भी किया. इस दौरान उन्होंने ऐतिहासिक अक्षयवट को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोलने का फैसला किया. साथ ही उन्होंने खुद वहां जाकर अक्षयवट के दर्शन किए.

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उन्होंने कहा, 'आज मैं आप सभी को एक खुशखबरी देने आया हूं, इस बार अर्धकुंभ में सभी श्रद्धालु अक्षय वट के दर्शन कर सकेंगे. कई पीढ़ियों से ये अक्षयवट किले में बंद था. लेकिन इस बार यहां आने वाला हर श्रद्धालु स्नान करने के बाद अक्षयवट के दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त कर सकेगा.'

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इस दौरान मोदी ने नए एयरपोर्ट कॉम्पलेक्स का शिलान्यास किया और कई विकास प्रोजेक्ट की भी शुरुआत की. वहीं मोदी ने गंगा किनारे पूजा भी की.

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आइए जानते हैं आखिर यह अक्षय वट क्यों महत्वपूर्ण है. इसका पौराणिक इतिहास बताया जाता है. यह अक्षय वट प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर आज भी है और कई हजारों साल पुराना बताया जाता है. पहले यह किले में सेना की सुरक्षा में था, जिसे कुंभ में आम आदमी के लिए खोल दिया जाएगा.

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कहा जाता है कि हिंदुओं के अलावा जैन और बौद्ध भी इसे पवित्र मानते हैं. कहा जाता है बुद्ध ने कैलाश पर्वत के निकट प्रयाग के अक्षय वट का एक बीज बोया था. जैन धर्म मानने वाले लोगों का मानना है कि उनके तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की थी.

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पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रयाग में स्नान के बाद जब तक अक्षय वट का पूजन एवं दर्शन नहीं हो, तब तक लाभ नहीं मिलता है. मुगल सम्राट अकबर के किले के अंदर बने पातालपुरी मंदिर में स्थित अक्षय वट सबसे पुराना मंदिर बताया जाता है. कहा जाता है कि जब धरती जलमग्न हो गई थी, तो भी यह अक्षय वट डूबा नहीं था.

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वहीं कुछ कथाओं में कहा गया है कि भगवान राम और सीता ने वन जाते समय इस वट वृक्ष के नीचे तीन रात तक निवास किया था. अक्षय वट वृक्ष के नीचे से ही अदृश्य सरस्वती नदी भी बहती है. संगम स्नान के बाद अक्षय वट का दर्शन और पूजन यहां वंशवृद्धि से लेकर धन-धान्य की संपूर्णता तक की मनौती पूर्ण होती है.

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