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हजारों साल पुराना है रक्षाबंधन का इतिहास, इसलिए है खास

प्रियंका शर्मा
  • 25 अगस्त 2018,
  • अपडेटेड 8:05 AM IST
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रक्षाबंधन का त्‍योहार भावनाओं से जुड़ा है. इस दिन बहनें, भाई की कलाई पर राखी नहीं बल्कि विश्‍वास-प्रेम-स्‍नेह का धागा बांधती हैं. वहीं इस त्योहार का इतिहास से भी गहरा नाता है.

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आपको जानकर हैरानी होगी कि रक्षाबंधन कुछ समय नहीं बल्कि हजारों साल पुराना त्‍योहार है.

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इस त्‍योहार को मनाने की परंपरा कब से आरंभ हुई इसकी कोई निश्चित तिथि तो नहीं है पर हां इसकी शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है.

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रक्षाबंधन की कथा महाभारत से भी जुड़ती है. जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं, तब भगवान कृष्ण ने उनकी और उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी.

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कृष्ण और द्रौपदी से संबंधित प्रसंग में कहा गया है कि जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था, तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई. द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी थी. यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था. कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया था.


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कहा जाता है कि रानी कुंती ने अपने पोते अभिमन्‍यु के हाथ पर रक्षा सूत्र बांधा था. उन्‍हें ये सूत्र उसी रक्षा के लिए महाभारत की लड़ाई के दौरान बांधा था.

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मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर आक्रमण करने की सूचना मिली. रानी उस समय लड़ने में असमर्थ थी, इसलिए उन्होंने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना की. हुमायूं ने राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह के विरुद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ाई लड़ी. हुमायूं ने कर्मावती व उनके राज्य की रक्षा की.

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राखी के बारे में भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ, तब दानव हावी होते नजर आने लगे. भगवान इंद्र घबराकर बृहस्पति के पास गए. वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी. उन्होंने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया. संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था.

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स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता है. दानवेंद्र राजा बलि का अहंकार चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और ब्राह्मण के वेश में राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए. भगवान ने बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि की मांग की. भगवान ने तीन पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नाप लिया और राजा बलि को रसातल में भेज दिया. बलि ने अपनी भक्ति के बल पर भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया. भगवान को वापस लाने के लिए नारद ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया. लक्ष्मीजी ने राजा बलि को राखी बांध अपना भाई बनाया और पति को अपने साथ ले आईं. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी.

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एक अन्य प्रसंग में कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पोरस (पुरू) को राखी बांधकर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन ले लिया. पोरस ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान किया और सिकंदर पर जानलेवा हमला नहीं किया.

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