उत्तर प्रदेश पुलिस में कॉन्स्टेबल के 60,244 पदों पर भर्ती के लिए परीक्षा हो रही है. इतनी वैकेंसियों के लिए 48.2 लाख से ज्यादा उम्मीदवार हैं. इस हिसाब से देखा जाए तो एक पद के लिए 80 उम्मीदवार मैदान में हैं. इससे पहले जनवरी 2019 में जब कॉन्स्टेबल की भर्ती की परीक्षा हुई थी, तब 49,568 पदों के लिए 19.38 लाख उम्मीदवार थे. यानी, तब 1 पद के लिए 39 उम्मीदवार मैदान में थे.
एक ओर कॉन्स्टेबल की भर्ती के लिए इतने ज्यादा उम्मीदवार परीक्षा दे रहे हैं, दूसरी ओर योगी सरकार का दावा है कि यूपी में बेरोजगारी दर देश की तुलना में कम है.
पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में बेरोजगारी दर 3.2% है, जबकि उत्तर प्रदेश में ये दर 2.4% है. बेरोजगारी दर से पता चलता है कि लेबर फोर्स में शामिल कितने लोग बेरोजगार हैं. सर्वे के आंकड़ों की मानें तो पांच साल में यूपी में बेरोजगारी दर घटकर आधी हो गई है. 2018-19 में यूपी में बेरोजगारी दर 5.7% थी, जो 2022-23 में घटकर 2.4% पर आ गई.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कई बार यूपी में बेरोजगारी दर कम होने का जिक्र कर चुके हैं. उनका दावा है कि यूपी में बेरोजगारी के हालात काबू में हैं.
बहरहाल, कॉन्स्टेबल 60 हजार पदों के लिए 48 लाख से ज्यादा उम्मीदवार हैं. यानी, 80 में से किसी 1 उम्मीदवार को ही चुना जाएगा. सवाल उठता है कि क्या बाकी भर्तियों में भी ऐसे ही हालात हैं?
भर्ती परीक्षाओं में कितने उम्मीदवार?
2019 में योगी सरकार ने 69 हजार शिक्षकों की भर्ती के लिए परीक्षा करवाई थी. इस परीक्षा में 4.10 लाख युवाओं ने फॉर्म भरा था. इसमें से 1.47 लाख पास हुए थे, जबकि नौकरियां 69 हजार को ही मिली थीं. यानी, लगभग 6 उम्मीदवार में से 1 को नौकरी मिल गई थी. इस परीक्षा में उम्मीदवारों की संख्या इसलिए भी कम थी, क्योंकि इसमें वही शामिल हो सकते थे जिन्होंने TET की परीक्षा पास की हो.
2018 में ग्राम विकास अधिकारी के 1,918 पदों के लिए करीब 14 लाख लोगों ने आवेदन दिया था. इस हिसाब से 728 उम्मीदवारों में से 1 को नौकरी मिली थी.
माना जाता है कि अगर किसी वैकेंसी के लिए 10वीं पास तक की योग्यता मांगी जाती है, तो उसमें सबसे ज्यादा उम्मीदवार आते हैं. वहीं, अगर किसी नौकरी के लिए 12वीं या ग्रेजुएशन मांगा जाता है तो उम्मीदवारों की संख्या कम हो जाती है. जबकि, अगर किसी नौकरी में टेक्निकल डिग्री मांग ली जाती है तो ये संख्या और भी कम हो जाती है.
योगी सरकार दावा करती है कि स्किल डेवलपमेंट के जरिए युवाओं को हुनरमंद बनाकर MSME और प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां दी जा रहीं हैं. यही कारण है कि योगी सरकार का दावा है कि भले ही सात साल में साढ़े 6 लाख से ज्यादा लोगों को सरकारी नौकरी दी गई हो, लेकिन प्राइवेट और MSME सेक्टर में 2 करोड़ से ज्यादा रोजगार युवाओं को मिले हैं.
दावा किया जाता है कि 2007 से 2012 में मायावती की सरकार में 91 हजार सरकारी नौकरियां ही दी गई थीं. जबकि, 2012 से 2017 के बीच जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, तब करीब दो लाख लोगों को सरकारी नौकरियां मिली थीं. वहीं, योगी सरकार के सात साल में 6.5 लाख से ज्यादा को सरकारी नौकरियां मिली हैं.
देखा जाए तो योगी सरकार में सबसे ज्यादा सरकारी नौकरियां, संविदा के आधार पर सरकारी नौकरियां और स्किल के आधार पर प्राइवेट नौकरियां देने का दावा है, लेकिन इसकी आलोचना भी काफी होती रही है. उसकी वजह ये है कि सरकार में सभी भर्तियां देरी से हुईं. अखिलेश सरकार के आखिरी दो साल में जितनी भर्तियां कैंसिल हुई थीं, उनमें योगी सरकार में और देरी हुई, जिसकी वजह से युवाओं में नाराजगी रही. कई परीक्षाओं के पेपर लीक हुए और इसका सियासी नुकसान 2024 के चुनाव में उठाना पड़ा.
सरकारी नौकरी की इतनी मांग क्यों?
यूपी के पूर्वी डीजीपी एके जैन कहते हैं कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद एक इंश्योरेंस हो जाता है. परिवार भी चाहता है कि सरकारी नौकरी मिल जाए. पुलिस के लिए नौजवानों में सेंट्रल पैरामिलिट्री फोर्स के लिए बहुत अट्रैक्शन होता है. बहुत से ऐसे ग्रामीण इलाके हैं, जहां से पढ़े-लिखे युवा पुलिस में भर्ती होना चाहते हैं. वो कहते हैं कि वर्दी का भी एक ग्लैमर है, जिस कारण युवा पुलिस में भर्ती होने की इच्छा रखते हैं.
एक जैन के मुताबिक, आज के समय में ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, इंजीनियर तक कॉन्स्टेबल और सब-इंस्पेक्टर की भर्ती के लिए अप्लाई कर रहे हैं, जबकि ये लोग पहले से ही कहीं न कहीं जॉब कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि पिछले 7 साल में पुलिस में 1.32 लाख से ज्यादा भर्तियां हो चुकी हैं. सबसे ज्यादा भर्तियां एसआई के पद पर हुई है.
क्यों नहीं मिलती नौकरियां?
पूर्व आईएएस अफसर अरविंद कुमार सिंह बताते हैं कि हमारे देश में पॉलिटेक्निक और आईटीआई जैसी प्रोफेशनल स्टडीज का विकास बहुत देर से हुआ. अगर हम पश्चिमी देशों से तुलना करें, तो वहां ज्यादातर लोग प्रोफेशनल स्टडीज की तरफ जाते हैं. हमारे यहां बीए, एमए करके नौकरी मांगते हैं, इसलिए नौकरी मिलती नहीं है.
सिंह कहते हैं कि सरकारी नौकरियां बहुत ज्यादा नहीं हैं, प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां हैं, लेकिन उसके लिए जो योग्यता चाहिए, वो युवा पूरी नहीं कर पा रहे हैं.
वो बताते हैं कि दक्षिण भारत की तुलना में हिंदी भाषी राज्यों सरकारी नौकरी का ज्यादा क्रेज है. दक्षिण भारत में बहुत पहले से लोग टेक्निकल एजुकेशन का कोर्स कर रहे हैं और विदेश में सेटल हो रहे हैं. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. यहां का युवा अब भी सिपाही, दरोगा या सरकारी नौकरी की तलाश में है.
वो कहते हैं कि पहले लोग चाहते थे कि किसी भी तरह सरकारी नौकरी मिल जाए. चाहे थर्ड क्लास हो या फोर्थ क्लास. सरकारी नौकरी मिल जाएगी तो सिक्योरिटी हो जाएगी. बीमारी हो तो इलाज की सुविधा मिलेगी. छुट्टी मिलेगी. रिटायरमेंट के बाद पेंशन मिलेगी.
अरविंद सिंह कहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा प्राइवेट संस्थान खुलने चाहिए. वो कहते हैं कि बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहर आईटी हब बन गए हैं. इन शहरों में यूपीएससी एग्जाम का भी इतना क्रेज नहीं है. वहां के लोग सरकारी के बजाय प्राइवेट कंपनी पर ज्यादा ध्यान देते हैं. अगर आज लखनऊ आईटी हब बन जाए, तो यहां भी ऐसा ही हो जाएगा.
कुमार अभिषेक / संतोष शर्मा