ईरान में जब भी मौजूदा हालात, विरोध प्रदर्शन या इस्लामी क्रांति का जिक्र होता है, तो एक चीज बार-बार चर्चा में आती है-देश का राष्ट्रीय झंडा. हरा, सफेद और लाल रंगों वाला यह झंडा दिखने में भले साधारण लगे, लेकिन इसके हर हिस्से में ईरान के इतिहास, आस्था और राजनीतिक बदलावों की गहरी छाप मौजूद है.
ईरान का मौजूदा राष्ट्रीय झंडा 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद 29 जुलाई 1980 को आधिकारिक तौर पर अपनाया गया था. यह वही क्रांति थी, जिसने ईरान की राजशाही व्यवस्था को खत्म कर एक इस्लामी गणराज्य की नींव रखी.
तीन रंग, तीन बड़े संदेश
ईरान का झंडा तीन समानांतर क्षैतिज पट्टियों से बना है. ऊपर हरा रंग, बीच में सफेद और नीचे लाल रंग। इन रंगों को ‘पैन-ईरानी रंग’ कहा जाता है और हर रंग का अपना अलग अर्थ है.
हरा रंग इस्लाम, जीवन, विकास और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है. सफेद रंग शांति, स्वतंत्रता और पवित्रता को दर्शाता है, जबकि लाल रंग साहस, संघर्ष और उन शहीदों के बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने देश और क्रांति के लिए अपनी जान दी.
बीच में बना खास इस्लामी प्रतीक
झंडे की सफेद पट्टी के ठीक बीच में एक लाल रंग का प्रतीक बना होता है, जिसे ईरान का राष्ट्रीय चिह्न कहा जाता है. पहली नज़र में यह ट्यूलिप के फूल जैसा दिखता है, लेकिन असल में यह 'अल्लाह' शब्द की शैलीबद्ध आकृति है. इसमें चार अर्धचंद्र और बीच में एक तलवार शामिल है.
इस प्रतीक को इस्लाम के पांच स्तंभों, ईश्वर की एकता और शहादत की भावना से जोड़ा जाता है. ईरानी परंपरा में यह भी मान्यता है कि शहीद की कब्र पर लाल ट्यूलिप उगती है, इसलिए यह चिन्ह बलिदान और क्रांति दोनों का संकेत देता है.
22 बार लिखा गया ‘अल्लाहु अकबर’
ईरान के झंडे की सबसे अनोखी और चर्चित बात है उस पर लिखी गई कूफिक लिपि. हरे रंग की पट्टी के निचले किनारे और लाल पट्टी के ऊपरी किनारे पर सफेद रंग में ‘अल्लाहु अकबर’ लिखा गया है.
यह वाक्य हरे हिस्से में 11 बार और लाल हिस्से में 11 बार दोहराया गया है. कुल 22 बार लिखे जाने के पीछे एक खास वजह है. 1979 की इस्लामी क्रांति ईरानी कैलेंडर के बहमन महीने की 22 तारीख को सफल हुई थी. इस तरह झंडे पर लिखा हर शब्द उस ऐतिहासिक दिन की याद दिलाता है.
क्या है कूफिक लिपि
कूफिक लिपि अरबी लिपि की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित कैलिग्राफी शैली मानी जाती है, जिसे अक्सर अरबी सुलेख की 'मां' कहा जाता है. इसका नाम इराक के प्राचीन शहर कूफा से पड़ा, जहाँ 7वीं शताब्दी में इसका विकास हुआ. इस्लाम के शुरुआती दौर में कुरान की प्रतियां लिखने के लिए कूफिक लिपि का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया गया और 8वीं से 12वीं शताब्दी तक यह प्रमुख लिपि बनी रही. इसकी पहचान सीधी, कोणीय और ज्यामितीय रेखाओं से होती है घुमाव बहुत कम, अक्षर चौड़े और क्षैतिज प्रवाह वाले.
क्रांति से पहले झंडा कुछ और था
1979 से पहले भी ईरान के झंडे में यही तीन रंग थे, लेकिन बीच में ‘शेर और सूरज’ का प्रतीक हुआ करता था. वह प्रतीक ईरान की राजशाही और प्राचीन फारसी पहचान का संकेत माना जाता था. इस्लामी क्रांति के बाद उसे हटाकर मौजूदा इस्लामी चिह्न अपनाया गया.
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