अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बात की होती, तो भारत-अमेरिका ट्रेड डील पूरी हो सकती थी. भारत के विदेश मंत्रालय ने इस दावे को सटीक नहीं बताया और समझौते के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई. इसी के बाद यह सवाल उठा कि आखिर राष्ट्राध्यक्ष आपस में फोन पर कैसे बात करते हैं.
अक्सर जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह सुनने को मिलता है कि प्रधानमंत्री ने फोन नहीं किया या राष्ट्रपति की कॉल नहीं आई, तो आम लोगों के मन में यह तस्वीर बन जाती है कि शायद नेता सीधे फोन उठाकर एक-दूसरे से बात कर लेते होंगे, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. दो राष्ट्राध्यक्षों या प्रधानमंत्रियों के बीच बातचीत किसी आम मोबाइल कॉल जैसी नहीं होती, बल्कि यह एक पूरी तरह सुरक्षित, पूर्व-नियोजित और संस्थागत प्रक्रिया होती है, जिसमें कई स्तरों पर तैयारी की जाती है.आइए आसान भाषा में समझते हैं
अचानक नहीं होती बातचीत
बीबीसी ने इस बारे में एक पूरी रिपोर्ट की. उसके मुताबिक,दुनिया के शीर्ष नेता कभी भी यूं ही फोन मिलाकर बात नहीं करते. आइये समझते हैं ये पूरा प्रोसेस कैसे होता है. यह 'हैलो, क्या मैं राष्ट्रपति से बात कर सकता हूं?' जैसा मामला नहीं होता. किसी भी कॉल से पहले दोनों देशों के विदेश मंत्रालय, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA), प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) या व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी आपस में संपर्क करते हैं.
सबसे पहले यह तय किया जाता है कि बातचीत की जरूरत क्यों है, किन मुद्दों पर चर्चा होगी और कॉल कितनी देर चलेगी. जब तक इन बातों पर सहमति नहीं बनती, तब तक कॉल तय ही नहीं होती.
स्टाफ-टू-स्टाफ समन्वय की अहम भूमिका
अगर दो देशों के रिश्ते नियमित और मजबूत हों, तो प्रक्रिया थोड़ी सरल हो सकती है. ऐसे मामलों में एक देश का सिचुएशन रूम सीधे दूसरे देश के समकक्ष कार्यालय को सूचना दे देता है कि राष्ट्राध्यक्ष बातचीत करना चाहते हैं.जहां संपर्क कम होता है, वहां अक्सर राजदूत औपचारिक अनुरोध करते हैं. वे प्रस्तावित एजेंडा बताते हैं और दोनों नेताओं के व्यस्त कार्यक्रम को देखते हुए समय तय कराया जाता है. यानी नेता की बातचीत से पहले पर्दे के पीछे पूरी टीम काम करती है.
हमेशा सुरक्षित लाइन पर होती है कॉल
राष्ट्राध्यक्ष कभी भी सामान्य मोबाइल या लैंडलाइन से बात नहीं करते. इसके लिए एन्क्रिप्टेड और हाई-सिक्योरिटी कम्युनिकेशन सिस्टम इस्तेमाल किए जाते हैं.अमेरिका में ऐसी कॉल्स अक्सर White House Situation Room के जरिए कनेक्ट होती हैं, जबकि भारत में यह जिम्मेदारी PMO और विदेश मंत्रालय की सुरक्षित व्यवस्था निभाती है. कई बार सुरक्षित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग भी होती है, लेकिन फोन कॉल अधिक प्रचलित है.
कॉल से पहले पूरी ब्रीफिंग
जब दो नेता बात करते हैं, तो वे बिना तैयारी के फोन नहीं उठाते. कॉल से पहले उन्हें विस्तृत ब्रीफिंग दी जाती है.अमेरिका में राष्ट्रपति को National Security Council (NSC) की ओर से डोज़ियर दिया जाता है, जिसमें सामने वाले नेता की पृष्ठभूमि, बातचीत के मुख्य बिंदु और संवेदनशील मुद्दों पर रणनीति शामिल होती है.अगर बातचीत सिर्फ शिष्टाचार के लिए हो, तो ब्रीफिंग सीमित रहती है, लेकिन अगर विषय व्यापार, सुरक्षा या युद्ध जैसे गंभीर मुद्दों से जुड़ा हो, तो अतिरिक्त ब्रीफिंग दी जाती है और अधिकारी कॉल को सुन भी सकते हैं.
भाषा और दुभाषिए क्यों जरूरी हैं
भले ही कई नेता अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाएं जानते हों, लेकिन आधिकारिक बातचीत अक्सर मातृभाषा में की जाती है. इसका कारण है शब्दों के सही अर्थ और भाव को सुरक्षित रखना.ऐसी कॉल्स में प्रोफेशनल दुभाषिए मौजूद रहते हैं. गलत अनुवाद या संबोधन पूरी बातचीत को नुकसान पहुंचा सकता है.
क्या नेता अकेले बात करते हैं?
अक्सर नहीं. खासकर संवेदनशील मुद्दों पर होने वाली बातचीत में वरिष्ठ सलाहकार, सुरक्षा अधिकारी या तकनीकी स्टाफ कॉल को मॉनिटर करते हैं. इससे बातचीत का सही रिकॉर्ड रहता है और किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश कम होती है.
हॉटलाइन: फोन नहीं, आपात संचार प्रणाली
कई लोग 'रेड फोन' या हॉटलाइन का जिक्र करते हैं, लेकिन यह कोई साधारण टेलीफोन नहीं होता। उदाहरण के तौर पर अमेरिका-रूस हॉटलाइन एक सिक्योर टेक्स्ट और डेटा सिस्टम है, जिसे सिर्फ आपात स्थितियों जैसे युद्ध या परमाणु संकटमें इस्तेमाल किया जाता है. सामान्य कूटनीतिक बातचीत इसके जरिए नहीं होती.
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