दर्शिनी मट्टू के हत्यारे ने कानून की पढ़ाई के लिए मांगी पैरोल

प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी संतोष सिंह की पैरोल याचिका पर हाईकोर्ट ने उससे अपनी पढ़ाई का पूरा ब्यौरा देने को कहा है. संतोष ने एलएलएम के पेपर देने के लिए 19 मई से एक सप्ताह की पैरोल मांगी है. 22 मई से उसकी एलएलएम परीक्षा होनी है.

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इससे पहले भी संतोष पैरोल ले चुका है इससे पहले भी संतोष पैरोल ले चुका है

परवेज़ सागर / पूनम शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2018,
  • अपडेटेड 3:10 PM IST

प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी संतोष सिंह की पैरोल याचिका पर हाईकोर्ट ने उससे अपनी पढ़ाई का पूरा ब्यौरा देने को कहा है. संतोष ने एलएलएम के पेपर देने के लिए 19 मई से एक सप्ताह की पैरोल मांगी है. 22 मई से उसकी एलएलएम परीक्षा होनी है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने संतोष से अपने जवाब में यह बताने के लिए कहा है कि उसने कौन सा कोर्स किस वर्ष में किया है. हाईकोर्ट ने उसे यह बताने को भी कहा है कि उसकी पढ़ाई कब तक पूरी होगी.

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जस्टिस मुक्ता गुप्ता की बेंच में सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग काउंसिल राहुल मेहरा ने कहा कि संतोष सिंह 2012 से दो साल के एलएलएम पाठ्यक्रम की पढ़ाई कर रहा है और उसे यह पूरा करने में कितना समय और लगेगा.

संतोष एलएलएम की परीक्षा देने के साथ बिहार में अपने एक रिश्तेदार की शादी में शामिल होने के लिए भी पैरोल मांग रहा है. उसने पहले भी इसी आधार पर पैरोल मांगी थी. दिल्ली पुलिस के वकील का कहना था कि उसके रिश्तेदार की कितनी बार शादी होगी. आजकल कैदियों का पैरोल के लिए किसी कोर्स में शामिल होने का चलन बढ़ता जा रहा है.

लेकिम संतोष के वकील ने कोर्ट को कहा कि संतोष दो हिस्सों में एलएलएम कर रहा है. इससे पहले मिली पैरोल में अवधि खत्म होने पर उसने सरेंडर कर दिया था. दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि किसी को पढ़ाई करने से नहीं रोका जा सकता. लेकिन याचिकाकर्ता को बताना होगा कि उसका एलएलएम कब तक चलता रहेगा. जब घटना हुई थी, तब उसकी एलएलबी पूरी हो चुकी थी और वह उस समय भी कानून में किसी और पाठ्यक्रम की पढ़ाई कर रहा था.

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पूर्व आईपीएस के बेटे संतोष पर जनवरी 1996 में प्रियदर्शिनी मट्टू से दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या करने का दोष साबित हुआ था.दिल्ली की निचली अदालत ने उसे इस मामले में साल 1999 में बरी कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में तब्दील कर दिया है.

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