प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 236 करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड के पूर्व प्रमोटर संदीप गुप्ता को गिरफ्तार किया है. यह गिरफ्तारी गुरुग्राम जोनल ऑफिस द्वारा की गई. संदीप गुप्ता कंपनी के सस्पेंडेड मैनेजिंग डायरेक्टर भी रह चुके हैं. जांच एजेंसी के मुताबिक यह मामला कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को भारी नुकसान पहुंचाने से जुड़ा है. ED ने यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम यानी PMLA, 2002 के तहत की है.
गुरुग्राम की स्पेशल कोर्ट में पेशी
गिरफ्तारी के बाद संदीप गुप्ता को गुरुग्राम की स्पेशल कोर्ट में पेश किया गया. कोर्ट ने ED को आगे की पूछताछ के लिए 8 दिन की कस्टडी मंजूर की है. एजेंसी का कहना है कि पूछताछ के दौरान कई अहम वित्तीय लेन-देन और शेल कंपनियों की भूमिका की जांच की जाएगी. ED को शक है कि यह पूरा नेटवर्क योजनाबद्ध तरीके से तैयार किया गया था. कस्टडी के दौरान दस्तावेजों और डिजिटल सबूतों की गहन जांच की जाएगी.
CBI की FIR से मनी लॉन्ड्रिंग जांच तक
इस मामले की मनी लॉन्ड्रिंग जांच की शुरुआत CBI द्वारा दर्ज FIR के आधार पर हुई. CBI ने IPC और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया था. आरोप है कि 2015 से 2018 के बीच संदीप गुप्ता और अन्य आरोपियों ने आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और आपराधिक कदाचार को अंजाम दिया. इस दौरान बैंकों को करीब 236 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. वहीं आरोपियों को गलत तरीके से भारी फायदा पहुंचाया गया.
फर्जी बिक्री से टर्नओवर बढ़ाने का खेल
ED की जांच में सामने आया कि रिचा इंडस्ट्रीज ने फर्जी बिक्री दिखाकर कंपनी का टर्नओवर कृत्रिम रूप से बढ़ाया. बिना किसी वास्तविक माल की आपूर्ति के बिक्री दर्ज की गई. इससे बैंकों और निवेशकों को कंपनी की वित्तीय स्थिति मजबूत दिखाई गई. जांच एजेंसी का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया जानबूझकर की गई. इसका मकसद बैंकों से ज्यादा कर्ज हासिल करना था.
करोड़ों की फर्जी कपड़ा बिक्री का खुलासा
ED के अनुसार कंपनी ने 7.42 करोड़ रुपये की कपास फैब्रिक की फर्जी बिक्री दिखाई. यह बिक्री उन शेल कंपनियों को दर्शाई गई, जो एंट्री ऑपरेटर्स द्वारा चलाई जा रही थीं. इन कंपनियों का वास्तविक कारोबार से कोई लेना-देना नहीं था. जांच में पाया गया कि इन ट्रांजैक्शनों के लिए फर्जी इनवॉइस और लेजर एंट्री बनाई गईं. भुगतान कभी हुआ ही नहीं, लेकिन कागजों में सब कुछ सही दिखाया गया.
सोलर प्रोजेक्ट के नाम पर 8.50 करोड़ की हेराफेरी
जांच में 8.50 करोड़ रुपये की फर्जी सोलर सेल्स का भी पता चला. ये लेन-देन भी शेल कंपनियों के जरिए दिखाए गए थे. ED के मुताबिक इन कंपनियों की कोई वास्तविक सोलर गतिविधि नहीं थी. फिर भी बहीखातों में बड़े पैमाने पर बिक्री दर्शाई गई. इससे कंपनी की बैलेंस शीट मजबूत दिखाई गई और बैंकों को गुमराह किया गया.
नकली खरीद और ZLD प्लांट का फर्जीवाड़ा
रिचा इंडस्ट्रीज ने 9.23 करोड़ रुपये के ZLD प्लांट और मशीनरी की फर्जी खरीद भी दिखाई. ये खरीद एक ऐसी कंपनी से दर्शाई गई, जो न तो ऑपरेशनल थी और न ही उसके GST प्रोफाइल से ऐसा कारोबार मेल खाता था. ED का कहना है कि यह पूरा लेन-देन सिर्फ कागजों पर था. इसका उद्देश्य कंपनी के खर्च और एसेट्स को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना था.
कंपनियों के जरिए फंड डायवर्जन
ED की जांच में बड़े पैमाने पर फंड डायवर्जन का खुलासा हुआ. वित्त वर्ष 2015-16 से 2017-18 के बीच करीब 16.40 करोड़ रुपये ग्रुप कंपनियों में ट्रांसफर किए गए. यह रकम लोन रिपेमेंट के नाम पर भेजी गई. लेकिन असल में यह पैसा प्रमोटर से जुड़ी कंपनियों में पहुंचाया गया. इससे रिचा इंडस्ट्रीज की वित्तीय स्थिति और कमजोर हो गई.
कंट्रोल हासिल करने का आरोप
जांच के मुताबिक, 2018-19 में रिचा इंडस्ट्रीज के फंड का इस्तेमाल रिचा कृष्णा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड में नियंत्रण हासिल करने के लिए किया गया. यह सब उस समय हुआ जब कंपनी CIRP प्रक्रिया में थी. रोहतक का एक अहम प्रोजेक्ट इस तरह डायवर्ट किया गया. ED का कहना है कि यह सीधे तौर पर लेनदारों के हितों के खिलाफ था.
कम कीमत पर शेयर ट्रांसफर
ED ने यह भी पाया कि रिचा इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के शेयर बहुत कम कीमत पर ट्रांसफर किए गए. इससे रिचा इंडस्ट्रीज को भारी नुकसान हुआ. यह लेन-देन प्रमोटर के हित में किया गया. जांच एजेंसी के अनुसार यह जानबूझकर की गई वित्तीय हेराफेरी थी. इसका उद्देश्य कंपनी की संपत्ति को बाहर निकालना था.
दिवालिया प्रक्रिया से पहले एसेट स्ट्रिपिंग
ED का आरोप है कि CIRP शुरू होने से ठीक पहले कंपनी की कीमती संपत्तियों को बाहर निकाला गया. इसके लिए कई शेल कंपनियां बनाई गईं. अलग-अलग समय पर एसेट ट्रांसफर किए गए. एजेंसी का कहना है कि यह एक सोची-समझी साजिश थी. ताकि दिवालिया प्रक्रिया में कंपनी के पास कुछ भी मूल्यवान न बचे.
NCLT के आदेश
रिचा इंडस्ट्रीज की CIRP प्रक्रिया दिसंबर 2018 में शुरू हुई थी. लेकिन कोई समाधान योजना सफल नहीं हो सकी. इसके बाद 11 जून 2025 को NCLT ने कंपनी को लिक्विडेट करने का आदेश दिया. एक लिक्विडेटर नियुक्त किया गया. अक्टूबर 2025 में ई-ऑक्शन के जरिए कंपनी को गोइंग कंसर्न के रूप में बेचा गया.
बैंकों को लगा 94 फीसदी का भारी हेयरकट
ई-ऑक्शन में कंपनी का रिजर्व प्राइस 96 करोड़ रुपये रखा गया था. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने कुल 696 करोड़ रुपये के दावे किए थे. लेकिन उन्हें सिर्फ 40.29 करोड़ रुपये की रिकवरी हो सकी. इसका मतलब बैंकों को करीब 94 फीसदी का हेयरकट झेलना पड़ा. ED के मुताबिक, यह नुकसान सीधे तौर पर कथित धोखाधड़ी का नतीजा है.
लेनदारों को प्रभावित करने की साजिश
ED को शक है कि संदीप गुप्ता और उनके परिवार ने लेनदारों को प्रभावित करने की साजिश रची. CIRP से ठीक पहले 232 करोड़ रुपये से ज्यादा की कॉर्पोरेट गारंटी जारी की गई. ये गारंटी छह ऐसी कंपनियों को दी गई, जो प्रमोटर के नियंत्रण में थीं. इन कंपनियों के पास CoC में 48.25 फीसदी वोटिंग राइट्स थे.
बेनामी कंपनी के जरिए CoC में दखल
जांच में यह भी सामने आया कि सारिगा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक शेल कंपनी बनाई गई। यह कंपनी एक पूर्व कर्मचारी के नाम पर थी, जो बेनामीदार के रूप में काम कर रहा था. इसका उद्देश्य CoC में वोटिंग राइट्स हासिल करना था. ED का कहना है कि इससे बड़े लेनदारों की भूमिका कमजोर हुई.
अवैध नियंत्रण और 40 करोड़ का नुकसान
ED का आरोप है कि CIRP के दौरान भी संदीप गुप्ता और उनका परिवार कंपनी पर परोक्ष नियंत्रण बनाए हुए थे. नियमों के खिलाफ समझौते किए गए और पारिश्रमिक लिया गया. मसूरी के एक बड़े प्रोजेक्ट को प्रमोटर नियंत्रित कंपनी को सब-कॉन्ट्रैक्ट दिया गया. इससे करीब 40 करोड़ रुपये की संपत्ति नष्ट हो गई. एजेंसी के मुताबिक यह पूरा मामला संगठित आर्थिक अपराध का उदाहरण है.
मुनीष पांडे