अपहरण, फिरौती और हत्या... वारदात के 9 साल बाद अपराधी को मिली आजीवन कारावास की सजा

महाराष्ट्र के ठाणे जिले की एक अदालत ने साल 2016 में हुए एक मर्डर केस में 30 वर्षीय अपराधी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ए एन सिरसीकर ने आरोपी अजय लालबहादुर विश्वकर्मा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया था.

Advertisement
मर्डर केस में 30 वर्षीय अपराधी को आजीवन कारावास की सजा (प्रतीकात्मक तस्वीर) मर्डर केस में 30 वर्षीय अपराधी को आजीवन कारावास की सजा (प्रतीकात्मक तस्वीर)

aajtak.in

  • ठाणे,
  • 22 मार्च 2025,
  • अपडेटेड 2:04 PM IST

महाराष्ट्र के ठाणे जिले की एक अदालत ने साल 2016 में हुए एक मर्डर केस में 30 वर्षीय अपराधी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ए एन सिरसीकर ने आरोपी अजय लालबहादुर विश्वकर्मा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया था. इसके बाद उसे आजीवन कारावास और पांच साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई है. दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी.

Advertisement

अदालत ने इस केस में सह-आरोपी संजय फिरतलाल गौतम को उसके खिलाफ निर्णायक सबूतों की कमी का हवाला देते हुए बरी कर दिया. गुरुवार को पारित आदेश की एक प्रति शनिवार को उपलब्ध कराई गई. अतिरिक्त सरकारी वकील रेखा हिवराले ने बताया कि 27 जुलाई, 2016 को पीड़ित जय प्रजापति अपने पिता को यह बताने के बाद लापता हो गया कि वह भयंदर रेलवे स्टेशन पर है. इसके बाद उसके पिता का फिरौती के संदेश मिले.

उन्होंने कहा कि जय प्रजापति के मोबाइल फोन से संदेश भेजे गए थे, जिसमें उसकी रिहाई के लिए 15 लाख रुपए की मांग की गई थी. हालांकि, उसके परिवार और पुलिस के प्रयासों के बावजूद पीड़ित का पता नहीं लगाया जा सका. कुछ समय बाद उसका शव मैंग्रोव में मोटरसाइकिल के कवर में लिपटा हुआ मिला था. अभियोजन पक्ष ने कहा कि फोरेंसिक जांच और डिजिटल साक्ष्यों के जरिए पुलिस ने आरोपी अजय विश्वकर्मा को गिरफ्तार किया.

Advertisement

सरकारी वकील ने कहा कि मुकदमे के दौरान पीड़ित के परिजनों और चिकित्सा अधिकारियों सहित कम से कम 16 अभियोजन पक्ष के गवाहों की जांच की गई. अदालत ने कहा कि मुख्य अभियोजन पक्ष के गवाहों ने छह साल की देरी के बाद गवाही दी, जिससे कुछ विसंगतियां हुईं. हालांकि, न्यायाधीश ने कहा कि छोटी-मोटी विसंगतियों से साक्ष्य की विश्वसनीयता कम नहीं होनी चाहिए. अभियोजन पक्ष फिरौती की मांग को साबित करने में विफल रहा.

हालांकि, अभियोजन ने सफलतापूर्वक यह साबित कर दिया कि अजय विश्वकर्मा के पास व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण जय प्रजापति की हत्या करने का मकसद था. आरोपी के कहने पर मृतक के शव की बरामदगी और गवाह के सामने स्वीकारोक्ति ने दोषसिद्धि सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला 'दुर्लभतम से दुर्लभतम' श्रेणी में नहीं आता है, जिसके लिए मृत्युदंड की सजा दी जानी चाहिए.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement